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आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--दो

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आज हम एक संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। चारो तरफ तीव्र हलचल, उठा-पटक, बहस-मुबाहिसा, संघर्ष और धुव्रीकरण का माहौल है। अभी कल तक जो था, वह आज नहीं है और आज जो है कि वह कल निश्चित ही नहीं रहेगा। घटनाएं इतनी तेजी से घट रही हैं, दृश्य-परिदृश्य इतनी तेजी से बदलता जा रहा है कि आने वाले कल के बारे में अनुमान करना कतई मुश्किल हो गया है। कंप्यूटर, अत्याधुनिक, तक्नालाजी , मुक्त बाजार, आयातित पश्चिमी पूँजी व संस्कृति और अब यह आर्थिक मंदी का भँवर और गोल और गहरा होता जा रहा है। मूल्य और मान्यताएं रोज-ब-रोज बदलती जा रही है। समय के इस नाजुक मोड़ पर कहाँ खड़े है हम ? कहाँ खड़ी हैं हमारी महिलाएं ? भारतीय नारी ? इसकी जाँच पड़ताल करने और इस संदर्भ में निणर्यात्मक बहुत कुछ ठोस करने की जरूरत आन पड़ी हैं। क्योंकि जब तक इस आधी आबादी से जुड़ी समस्याओं व त्रासदियों को हल नहीं कर लिया जाता, समाज की शक्लो सूरत को कतई नहीं बदला जा सकता। इधर-उधर से पैबंद लगाकर इसे सुधारने की लाख कोशिशें क्यों न कर ली जायें। अपने चारों तरफ आज हम निगाहें दौड़ाते हैं, तो पाते है कि हमारे यहाँ महिलाएं आज भी कमोबोश मध्ययुगीन सोव व संस्कृति तथ...