आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--तीन
आज भी हकीकत यही है कि दंगे हों तो कहर महिलाओं पर टूटता है। जातीय संघर्ष हो तो महिलाओं को भुगतना पड़ता हैं। आतंकवादियों का जुल्म बरसता है तो महिलाओं पर। पुलिस और सेना भी जब वहशी होती हैं तो भुगतती हैं महिलाएं। प्रेम प्रसंगों में भी प्रताड़ित महिलाएं ही होती है। यही नहीं, जब भारतीय संस्कृति के स्वयभू ठेकेदार अपनी तथाकथित संस्कृति की रक्षा में नैतिक पुलिस बन कर हिंसक होते हैं, तो सब से ज्यादे शिकार महिलायें ही होतीं हैं। चाहे वह हिन्दू धर्म हो या मुस्लिम, ईसाई हो या कि सिख धर्म, या चाहे कोई भी जाति हो या वर्ण हर जगह महिलाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। सारे नियम कानून और ढेरों पाबंदियाँ महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं। पुरूष हर जगह उनसे ऊपर और आजाद होता है। दूसरी तरफ बाजार में जब खुलापन आता है, तो भी धड़ल्ले से महिलाएं और उनका शरीर ही बेचा और खरीदा जाता है। गरज यह कि सामंती मध्ययुगीन संस्कृति का बोलबाला हो या पश्चिमी अत्याधुनिक भोगवादी संस्कृति का वर्चस्व, शिकार महिलाओं को ही बनाया जाता हैं। चाहे दबाकर जोर जबर्दस्ती से या फिर फुसलाकर और चकाचैंध से भरी जिंदगी का लालच देकर। और हमारे देश में सा...