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आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--एक

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हिन्द ी क ी सुप्रसिद्ध लेखिक ा डॉक्टर प्रभ ा खेतान क ो हम उनक ी रचनाओ ं " आआ ॓ पेप े घर चले ं ", " पील ी आंध ी ", " छिन्नमस्त ा " , " अपरिचित उजाल े ", " उपनिवेश मे ं स्त्र ी " और विश्व विख्यात अस्तित्ववाद ी चिंतक व लेखक ज्या ं पाल सार्त्र पर लिख ी उनक ी पुस्तको ं स े जानते ं है ं । ल े किन प्रभ ा ज ी क ो सबस े ज्याद ा ख्यात ि फ्रांसीस ी रचनाकार सिमोन द बोउव ा क ी पुस्तक ‘ द ि सेकेंड सेक्स ’ क े अनुवाद ‘ स्त्र ी उपेक्षित ा ’ स े मिली। आज अंतर्राष्ट्रीय महिल ा दिवस क े अवसर पर मै ं इस ी पुस्तक क े लिए लिख ी गई उनक ी भूमिक ा क े अंश क ो यहा ँ प्रस्तुत कर रह ा हू ँ । 1949 मे ं लिख ी गई ' द सैकेण्ड सेक्स ' क े सन्दर्भ मे ं भारतीय स्त्रियो ं क ो लेकर 1989 मे ं लिख े गय े प्रभ ा खेतान क े विचारआज भ ी प्रसंगिक हैं। " हमें बड़ी उदारता से सामान्य स्त्री और उसके परिवेश के बारे में सोचना होगा। सीमोन ने उन्हीं क...

यह न्याय है या....

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यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। पर लगती बिल्कुल फिल्मों जैसी है। अशोक राय उर्फ़ अमित नाम के एक तेज-तर्रार और मेधावी लड़के के पास एक लडकी ट्यूशन पढ़ने जाती थी। पढाते-पढाते उस शिक्षक युवक की नीयत ख़राब हो जाती है। और एक दिन धोखे से प्रसाद में नशीला पदार्थ मिलाकर वह उस लडकी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना लेता है। इतना ही नहीं, अशोक राय अब उस लडकी को शादी का झाँसा देकर लगातार उस के साथ महीनों बलात्कार करता है। अपने परिचितों के साथ सोने के लिए उस पर दबाव बनाता है। और जब लडकी गर्भवती हो जाती है, तो उसको माला-डी की गोलियां देकर उसका एबार्शन करने की कोशिश भी करता है। इस ज़लालत और घिन भरी ज़िंदगी से तंग होकर वह लडकी एक दिन आत्महत्या कर लेती है। वर्ष २००३ में राय के खिलाफ दिल्ली के कृष्णा नगर थाने में आई पी सी की धारा ३७६ और ३०६ के तहत बलात्कार व आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया जाता है। निचली अदालत अशोक राय को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है। और वह जेल भेज दिया जाता है । सब को लगता है की चलो, पीड़ित लडकी को न्याय मिल गया। उसकी मृत-आत्मा को शान्ति मिल गयी। बलात्कार करने और आत्मह...

काहे की जय हो ?

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आज कल पूरा देश जय हो- जय हो की जय-जय कार में मदमस्त होकर पागलों की तरह झूम रहा है और ऑस्कर मिलने की खुशी में लोग-बाग़ फूल कर इतना कुप्पा हो रहे हैं कि सच की तरफ़ न तो ख़ुद देखना चाहतें हैं और न दूसरों को देखने-सुनने दे रहे हैं। जश्न मनाने का शोर भाई लोगों ने इतना कनफोरवा कर रखा है कि जब तक कोई कुछ सोच-समझ पाए, तब तक स्लमडॉग मिलिनिअर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपना बिजनेस कर के खूब सारा पैसा यहाँ से बटोर लें जायें। और उनका यह कम खूब असं कर रहे हैं उदार पूंजीवाद और वैश्वीकरण की समर्थक इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया। जी हाँ, यह है बाजारवाद का नया रूप जो अबकी ऑस्कर की शक्ल में हमारे यहाँ आया है। चाहे वह स्लम डॉग मिलिनिअर को हांथों- हाथ उठाने का मसला हो या इस्माईल पिंकी को पुरस्कृत करने की बात हो। इसमें कोई शक नहीं कि ए0 आर0 रहमान एक उच्चकोटि के संगीतकार हैं और गुलजार एक महान गीतकार। उनकी पहचान, प्रतिभा और कला किसी मठ, मंच व कुछ तथाकथित कला-पारखियों की स्वीकृति या प्रमाण-पत्र की मोहताज बिल्कुल नहीं है। उन्होंने दुनिया को अब तक एक से बढकर एक उत्कृष्ट फिल्मी और गैर फिल्मी रचनायें दी हैं। ...

जी हाँ, नुकसान पहुँचा सकता है मोबाइल फोन

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मोबाइल फोन आज हर आदमी की जरूरत बन गये हैं । बड़े-बूढे, जवान और बच्चे सभी इसका इस्तेमाल धड़ल्ले सेकर रहे हैं । एक अनुमान के अनुसार आज दुनिया भर में पचास करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल फोन के नियमितउपभोक्ता हैं। स्वाभाविक भी हैं इन्फार्मेशन तकनालोजी और दूर-संचार के इस दौर में यह आज की एक बड़ीआवश्यकता बन गयी हैं । इसके फायदे भी बहुत हैं। तुरत-फरत किसी को भी फोन करने सुनने की सुविधा। संदेशभेजने-पाने की सहूलियत। मनचाही आडियो-वीडियो रिकार्डिग। इन्टरनेट, सर्फिग और एफ0 एम0 रेडियो ! परहमें पता होना चाहिए की यह उच्च तकनीक वाला सुविधाजनक व उपयोगी मोबाइल फोन हमें काफी नुकसान भीपहुँचा सकता है। वैज्ञानिकों का मानना हैं कि मोबाइल फोन का अत्याधिक और लम्बे-लम्बे समय तक उपयोग स्वास्थय के लिए काफी हानिकारक हो सकता हैं । हाल ही में हुए कई शोधों से यह बात साबित हुई है कि कम उम्र के बच्चों और युवाओं द्वारा मोबाइल फोन के अंधाधुंध इस्तेमाल से उनको भविष्य में मिरगी, ह्रदय रोग, ब्रेन ट्यूमर, नपुंसकता, कैंसर और अल्झेमर जैसी कई खतरनाक बीमारियाँ हो सकती हैं। दरअसल, मोबाइल फोन से ''नॉन-आयोनाइजिंग'' विकिरण ...

यह सिर्फ़ ननों की व्यथा-कथा नहीं है

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इन दिनों सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा ने सिर्फ़ केरल को ही नहीं, कैथोलिक-चर्च की समूची दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। पुस्तक विवादस्पद एवं चर्चित हो कर हांथों-हाथ बिक रही है और इसके प्रकाशक को कुछ ही हफ्तों के अन्दर इस विस्फोटक आत्मकथा का (२५०० नयी प्रतियों के साथ) तीसरा संस्करण छापना पड़ गया है। लोगों में इस किताब को लेकर काफी उत्सुकता है। क्योंकि इस आत्मकथा में सिस्टर जेस्मी ने अपनी आपबीती के माध्यम से कैथोलिक चर्चों में चलने वाले अनेकों गोरख-धंधों, ननों के यौन-शोषण और पादरियों के बीच निरंतर चलने वाले सत्ता-संघर्ष सहित उन तमाम काले-अंधियारे पक्षों को बड़ी बेबाकी व बहादुरी से उजागर किया है, जिन पर चर्च के बाहर बात-चीत करना वर्जित ही नहीं पाप भी माना जाता है। दुनिया का हर धर्म वैसे भी किसी भी प्रकार के तर्क-वितर्क,बहस-मुबाहिसा और आरोप-प्रत्यारोप की इजाजत नहीं देता है। सिस्टर जेस्मी ने लिखा है कि केरल के चर्चों में ननों का सिर्फ़ यौन-शोषण ही नहीं किया जाता, उन्हें हर तरह से प्रताड़ित भी किया जाता है। पादरी न सिर्फ़ ननों को मन बहलाव व उपभोग की चीज़ समझ कर उनका यौन-शोषण करते हैं, बल्कि चर्च क...

ऐड्स के शोर में बढ़ रही हैं अन्य जानलेवा बीमारियाँ

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आज पुरी दुनिया में एच आई वी और ऐड्स को लेकर जिस तरह का भय व्याप्त है और इसकी रोकथाम व उन्मूलन के लिए जिस तरह के जोरदार अभियान चलाये जा रहे हैं , उससे कैंसर , हार्ट - डिजीज , टी बी और डायबिटीज़ जैसी खतरनाक बीमारियाँ लगातार उपेक्षित हो रही हैं । और बेलगाम होकर लोगों पर अपना जानलेवा कहर बरपा रही हैं। पूरी दुनिया के आँकडों की मानें तो हर साल ऐड्स से मरने वालों की संख्या जहाँ हजारों में होती है , वहीं दूसरी घातक बीमारियों की चपेट आकर लाखों लोग अकाल ही मौत के मुँह में समां जाते हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अगर ह्रदय रोग , कैंसर , मधुमेह और क्षय - रोग से बचने के लिए लोगों को जागरूक या इनके उन्मूलन के लिए कारगर उपाय नही किए गए , तो अगले दस वर्षो में इन बीमारियों से लगभग पौने चार करोड़ लोगों की मौत हो सकती है । इस रिपोर्ट के अनुसार तमाम विकसित देशों ने इन बीमारियों के खतरों के प्रति व्यापक जागरूकता फैलाकर और इनसे ...

कृष्णा सोबती जी, आपको जन्मदिन मुबारक हो !!

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आज हिन्दी की मशहूर साहित्यकार कृष्णा सोबती जी का ८४ वाँ जन्मदिन है। उनको इसकी बहुत-बहुत बधाई। 'मित्रों मरजानी', 'जिंदगीनामा', 'ऐ लडकी', 'सूरजमुखी अंधेरों के' और 'दिल ओ दानिश' जैसी रचनाओं के माध्यम से मानवीय रिश्तों और स्त्री के व्यक्तित्व की जटिलताओं को बड़ी ही कुशलता से चित्रित पाठकों की चेतना को विकसित करने वाली कृष्णा जी को हिन्दी साहित्य जगत बहुत ही आदर की दृष्टि से देखता है। उनके उपन्यास 'जिंदगीनामा' के लिए उनको १९८० में न सिर्फ़ साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बल्कि १९९६ में उनको साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान 'साहित्य अकादमी फेलोशिप' से भी नवाजा गया था। इसके अलावा उनके अनूठे साहित्यिक योगदान के लिए उनको शिरोमणि पुरस्कार, शलाका पुरस्कार और व्यास सम्मान से सुशोभित किया गया है। कृष्णा जी अपनी 'बोल्ड' और 'बिंदास' लेखनी के लिए जानी जाती है। उनके कथ्य और उसको प्रस्तुत करने की उनकी अनोखी शैली उन्हें तमाम साहित्यकारों की भीड़ से अलग करके एक ऊंचा स्थान प्रदान करती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में...

आज बाबा डार्विन की दो सौवीं सालगिरह है

आज से दो सौ साल पहले यानि कि12 फरवरी १८०९ को "विकासवाद" एवं "योग्यतम की उत्तरजीविता" के सिद्धांत के जनक चार्ल्स डार्विन का जन्म हुआ था। डार्विन की इन क्रांतिकारी स्थापनाओं ने न तब धर्म आधारित तमाम मान्यतायों या आस्थाओं को खंड-खंड किया था, बल्कि धर्म द्वारा संचालित राजसत्ता के समक्ष कई कठिन चुनौतियाँ भी खडी कर दी थीं। डार्विन को तब धर्म विरोधी और नास्तिक कह कर काफी आलोचना की गयी थी। हालाँकि डार्विन के सिद्धांत “योग्यतम की उत्तरजीविता ” का विचार कुछ विवादस्पद है और वो भी शायद इसलिए कि यह कहता है कि धरती पर अंततः वही बचेगा जो शक्तिशाली होगा। सामाजिक,आर्थिक व राजनितिक सन्दर्भों में लागू करते हैं, तो यह नस्लवाद, जातिवाद, पंथवाद यानि कि संक्षेप में कहें तो साम्राज्यवादी विचारों को बल देता हुआ प्रतीत होता है। और डार्विन साम्राज्यवाद के समर्थक लगते हैं। मार्क्स और एंजेल्स बहुत ही सटीक और परिमार्जित तरीके से डार्विन के इस प्रस्थापनाओं को सामाजिक व राजनितिक सन्दर्भों से जोड़ने का काम किया है । बहरहाल---- इसमें कोई शक नहीं कि आज का पूरा विज्ञानं जगत डार्विन और ...