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प्यार, पुलिया और प्रमोशन (भाग-एक) वह तेज़ कदमों से भाग रहा था। भागते-भागते कभी वह रुकता। पीछे मुड़ कर देखता। कुछ सोचता। और फिर भागने लगता। कभी तेज़। कभी धीरे। कभी बहुत धीरे। और फिर अचनाक ही बहुत तेज़। इसी तरह भागते , रूकते , पीछे मुड़ कर देखते , सोचते और फिर भागते हुए वह अब मुख्य सड़क पर आ गया था। सड़क पर रोज़ की तरह चल-पहल थी। शोर था। भीड़ थी। तेज़ कारें। मोटर साइकिल। स्कूटर। रिक्शे। और पैदल। एक दूसरे से बेख़बर। अपनी अपनी धुन में मगन। सभी हमेशा की तरह अपने-अपने गंतव्य की ओर भाग रहे थे। वह भी उस भागती हुयी भीड़ में शामिल हो गया। उसके दिमाग में इस समय भारी उथल-पुथल मची हुयी थी। बहुत सारी बातें। ढेरों सवाल। सवालों के धूल भरे बवंडर उसे बुरी तरह से मथ रहे थे। उसे एक-एक कदम उठाना भारी, बहुत मुश्किल पड़ रहा था। चलते चलते उसने सिर उठा कर आसमान की तरफ देखा। ‘उफ़, काफी देर हो गयी है।’ वह बुदबुदाया—‘आज तो मेम साहब चिल्ला चिल्ला कर जान ले लेंगी। और गुस्से में न तो चाय देंगी और न ही नाश्ता। पूरा पेर कर रख देंगी।’ अचानक ही साहब की कोठी एक अजगर के रूप में तब्दील हो गयी। और मुंह फाड़कर उसे अपनी...

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उमस के बावजूद पिछले कई दिनों से यूं ही पानी, धूप और उमस का कठिन और भ ा री क्रम चल रहा था. बाहर तेज ़ बरसात हो रही थी. वे अपने कमरे के कोने में बिछी चारपाई पर लेटे हुए थे. चित. छत को निहारते हुए. चुपचाप. निस्पंद. लगभग मुर्दों की तरह. वह लगातार सिगरेट पी रहा था. और वह उसके धुएं में लिपटी किसी अंधेरे शून्य में तैर रही थी. उन दोनों के भीतर शायद एक भ ा री कोलाहल मचा हुआ था. वहॅां कोई बड़ी उथल-पुथल चल रही थी. वे चुप थे, पर अन्दर ही अन्दर अपनी-अपनी उलझनों को सुलझाने की पुरजोर कोशिश करते हुए अपने आप से जूझ रहे थे. -----सो गए क्या? -----नहीं तो. -----क्या सोच रहे हो? -----कुछ भी तो नहीं. एक लम्बी साँस के साथ उसने ढेर सारा धुआं उगल दिया. सिगरेट की र ा ख को काफी समय से झाड ़ा नहीं गया था. इसलिए उस के अगले सिरे पर राख की एक लम्बी लड़ी बन गयी थी. उसको गिराने के लिए उसने सिगरेट को धीरे से दीवार से छुआया. र ा ख चारपाई पर गिरी. और चादर पर बिखर गयी. इस समय चारपाई को दीवार से स टा कर रखा गया था. पांच सौ अस्सी रुपये महीने के किराये का उनका पूरा कमरा यानि कि मक ा न मालिक का बेकार पड़ा गैराज ...

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चूहे बच्ची और पत्नी की घटना को वहम मान कर उन्होंने टाल दिया था। पर जब उनके साथ भी लगातार तीसरी बार वही सब कुछ हुआ, तो उनका माथा ठनका। इस बार भी उसी तरह। उसी जैसा। इस बार तो नींद खुलने के बाद भी सब कुछ सही सही जानने के उद्देश्य से उन्होंने अपने हाँथ-पैर को ढीला छोड़ दिया था। खुर-खुर करता हुआ वह उनके पैर के अंगूठे पर जा चढ़ा। उसके बड़े-बड़े पैने नाखूनों की चुभन उन्होंने साफ़-साफ़ महसूस की। दो उँगलियों के बीच की मुलायम जगह पर उसने अपने नथुने से सही स्थान निश्चित किया। और अपने नुकीले दांत गड़ा कर धीरे-धीरे चमड़ी कुतरने लगा। कुतुर-कुतुर...कुतुर-कुतुर। धीरे-धीरे गोश्त तक। गुदगुदी के साथ जब एक तेज़ दर्द उनकी नसों में चढ़ने लगा, तो तिलमिला कर उन्होंने अपना पैर झटक दिया। वह उछला। और यह जा, वह जा। इसके बाद अब उसकी पहचान के लिए उसे खोजना बेकार था। वह चूहा ही था। अब इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। तो क्या? वे फिर आ गए? और अब इस रूप में? उनके माथे पर बल पड़ गए। उनकी भृकुटियाँ तन गयीं। और डर की एक सिहरन उनकी नसों में करेंट की तरह दौड़ गयी। इनकी तादात क्या होगी? वे सोचने लगे।   पिता की कृपा पर पल...