बुधवार, 12 अगस्त 2009

आज बहुत दिन बाद फ़िर...

वाकई एक अरसा बीत गया। आज काफी दिनों के बाद आप सब से मुखतिब हो रहा हूँ।....तीस मार्च को पिता की अचानक मृत्यु ने मुझे इस कद्र तोड़ दिया था कि कुछ भी लिखने पढ़ने लायक नही रह गया था। गहरा आघात... स्तब्ध और पूर्णतया निशब्द। ...... ठीक होली के दिन वे अचानक बेहोश हो कर इस तरह से गिरे कि सत्रह दिन तक लगातार जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए अंततः हार ही गए। ....सघन चिकित्सा,चिकित्सकों की कई-कई टीम, रात दिन एक करके किसी भी कीमत पर पिता को बचा लेने की पुरजोर कोशिश।.....कभी लगता यह मल्टीप्ले ओर्गोन फेल्योर का मामला है, तो कभी सेप्तिसमेया का ।बातें करते हुए मौत के आगोश में इस तरह समा गए कि शायद सोने चले गए हों।....पर वाकई वे गहरी नीद में सो ही तो गए हैं।अब वो पुल्मोनारी एम्बोलिस्म के कारण हुआ हो या अचानक हुए कर्दिअक अरेस्ट के कारण या किसी दवा या इंजेक्शन के ओवर डोज के कारण। सच तो खुदा ही जानता है, पर हमने उनको खो दिया।हम चाह कर भी उनको बचा नही पाए। मृत्यु के सच के आगे हम सब असहाय और नीरीह बने छात्पता कर रह गए।......हम में से किसी को भी सपने में भी अंदाजा नहीं था कि वे अचानक इस तरह से चले जायेंगे। ....मेरे लिए तो यह एक बगुत बड़ा आघात था। .... माँ की कैंसर से हुयी मृत्यु ने मुझको अन्दर से कमज़ोर तो किया था। पर पिता कि इस अचानक मृत्यु ने तो मुझे एक दम से तोड़ कर ही रख दिया है। .....आज भी तेरह मार्च से लेकर तीस मार्च तक की एक एक घटना और आई सी यू के बेड नंबर सत्रह पर घटा वो एक-एक पल मेरे मन मस्तिष्क में इस कदर गहराई में ज्वालामुखी की तरह धधक रहा है कि अभी भी अक्सर रातों को गहरी नीद से छटपटा कर उठ बैठता हूँ। पसीने से तर बतर। .....बहरहाल ज़िंदगी तो कभी थमती नहीं। ...आपकी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी आपको जीने और आगे बढ़ने के लिए लगातार कोंचती रहती हैं। ....सो अब अन्तर-बाहर को मजबूत करके मै फ़िर से ज़िंदगी के साथ गतिशील होने की कोशिश कर रहा हूँ। पर यह सच है कि पिता ने इस तरह से अचानक जाकर मेरे जीवन में एक ऐसा शून्य उत्त्पन्न कर दिया है ,जिसको समय का एक लंबा अंतराल भी शायद ही कभी भर पाए। ...लेकिन मै तो माँ के बहुत करीब था। उनको बहुत प्यार करता था। लोग-बाग और यार-दोस्त मुझे मदर्स चाइल्ड कह-कह कर चिढाते थे। पिता से म्रेरे सम्बन्ध कभी भी सम नही थे। न तो वैचारिक स्तर पर और न ही व्यावहारिक स्तर पर। ....पर शायद...आज लगता है कि मन की गहराइयों में मै पिताजी को कहीं अधिक प्यार करता था।...वे शायद मेरे लिए एक ऐसे सुरक्षा कवच थे जो मुझे हर वक्त हर मुसीबत से बचाने के लिए तत्पर रहता था। ....पिता भी शायद मुझे बहुत प्यार करते थे। तभी तो माँ के न रहने पर वे हरवक्त के लिए हमारे ही पास रहने आ गए थे। पर हम दोनों कि ख़ुद की रची हुयी दीवारें या सीमायें ही ऐसी थी कि हम अंत तक एक दूसरे को "आई लव यूं" नही कह पाए। ...और आज अगर मै उनसे ऐसा कहता भी हूँ तो उससे फायदा? क्या दूर अनंत में जहाँ वे आज माँ के साथ चैन से रह रहे है मेरी काँपती और आंसुओं से भरी हुयी आवाज उन तक पहुँच पायेगी?...आज अपनी भावुकता से आप दोस्तों को दुखी करने का मेरा कोई इरादा नही है, पर शायद इससे मन का दुःख कुछ कम हो। ....