शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

आख़िर इन विवादों की मंशा क्या है?----तीन

यह व्यक्तिगत नहीं विचारों की लड़ाई है
कुछ लोग जन्म से ही अति-स्वछन्द होते हैं। सोच,समझ और विचारों में पूरी तरह से अराजक। ऐसे लोग नहीं चाहते की कभी कोई उनको टोके-टाके। उनके क्रिया-कलापों की आलोचना करे। ऐसे लोग मूलतः यथास्थितिवादी होते हैं।और देश व समाज के विकास में बाधक। वे नही चाहते कि कोई उनको रोके-टोके या उनकी ज़िंदगी और परिवेश को बदलने की कोशिश करे। पर ऐसे लोग अपनी तमाम सारी बौद्धिक संपन्नता के यह नहीं जानते कि प्रतिक्रियावादी जनविरोधी ताकतें हमेशा ऐसे लोगों को न सिर्फ़ पुचकारती सहलाती रहती हैं, बल्कि उनकी निरीह शराफत को आसानी से अपने हितों के लिए इस्तेमाल भी कर लेतीं हैं। वर्गों में बँटे समाज में निरंतर चलनेवाले वर्ग-संघर्सों आप चाह कर भी तटस्थ नहीं रह सकते।आपको यह तय करना ही पड़ता है कि "बंधु आप आखिर किसकी ओर हैं"? वैसे भी व्यक्ति की तटस्थता या चुप्पी अंततः उसको जनता के दुश्मनों के ही पक्ष में ले जा कर खड़ा कर देती है। तमाम कलावादी या भाववादी लोग अपने जाने-अनजाने में समाज की प्रतिगामी ताकतों को ही बल प्रदान करतें हैं। यह एक सच्चाई है।
ऐसे अति-स्वछन्द और तथाकथित तटस्थ लोग सैधांतिक रूप से तो हमेशा साहित्य,कला और सृजन को राजनितिक विचारधारा खास करके जनपक्षीय-जनवादी विचारधारा से मुक्त रखने की वकालत करते हैं, पर वयवहार में निरंतर शासक वर्गीय विचारों व मूल्यों को ही स्थापित करने में लगे रहतें हैं।ये ख़ुद को एलिट और महान समझतें हें, पॉँच सितारा गोष्ठियों-सेमिनारों में रमे रहतें है,सरकारी सम्मानों या पुरस्कारों को पाने के जुगाड़ में रात दिन मरे जाते हें, खेमेबाजी में व्यस्त रहते है और अपनी दरबारी मानसिकता के कारण सिर्फ़ जनता ही नहीं उसके पक्षधर लेखकों,समीक्षकों और लोगों को भी हमेशा तुच्छ, अछूत व मीडिआकर समझ कर साहित्य-संस्कृति, कला और अपनी अति-स्वछन्द व उच्चवर्गीय दुनिया (खेमे) से दूर हाशिये पर ही रखना चाहते हें। सच तो यह है कि ऐसे लोगों को ये साहित्यकार बिल्कुल नहीं मानते,जो व्यापक व संघर्षशील जनता के दुःख दर्द की बातें करते हें और उनकी जद्दो-जहद या उनके संघर्षों के हिमायती होते हें। अब अगर कभी ऐसे एलिट लोगों को खुदा-न खास्ते इसी तरह के किसी व्यक्ति के साथ और वो भी उसके अनुशासन में रह कर काम करना पड़े, तो उन पर क्या-क्या गुज़रेगी ? उनके लिए स्तिथियाँ कितनी असहज और विकट हो जायेंगी ? कितना बंधा-बंधा और पीड़ित महसूस करेंगें ये ? इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है
वर्धा हिन्दी विश्वविद्यालय में विभूति नारायण राय को लेकर मचने वाले हो-हल्ले को इसी रोशनी में देखने और समझने की जरूरत है। हालाँकि भाई लोगों ने इसे एक घटिया व्यक्तिगत लड़ाई की शक्लो-सूरत दे कर माहौल में काफी गंध फैला रखी है, पर वह दरअसल विचारों की लड़ाई है। वहां पर इस समय एक बिगड़ी हुई व्यवस्था को सही ढर्रे पर लाने की कोशिशें की जा रही हें। इसीलिए पुरानी व्यवस्था के तमाम समर्थक असहज हो उठे हें।
कौन नहीं जनता कि विभूति नारायण राय क्या हें ? हिंदी के यशस्वी कथाकार और विचारक। हिंदी की दुनिया उनको बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखती है। क्योंकि सोच,विचार,लेखन और जीवन में ये एक प्रगतीशील और जनपक्षीय व्यक्तित्व हें। दंगों के दौरान पुलिस की सांप्रदायिक भूमिका को बेनकाब करता उनका उपन्यास ''शहर में कर्फ्यू ''को पढ़ कर यह साफ़ हो जाता है कि विभूति नारायण किस कदर मानवीय व न्याय के हिमायती हें। यही नहीं, उन्होने एक समय अयोध्‍या में विश्‍व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल को डंडे भी लगवाये थे। बंगला की मशहूर लेखिका महाश्‍वेता देवी ने भी उनके बारे में अपनी एक सकारात्मक टिप्पणी में लिखा है कि वे एक बेबाक व यथार्थवादी साहित्यकार हें। अब ऐसे व्यक्ति का काम के प्रति समर्पण व सख्त रवैया तमाम अनुशासनहीन व अराजक लोगों को कैसे पसंद आ सकता है ?
आज जो कुछ भी हो-हल्ला वहां हो रहा है, उसके पीछे वे लोग हें जो पुरानी व्यवस्था के कल पुर्जे थे। ये सारे लोग आज विभूतिनारायण, उनके विचारो और उनकी कार्यशैली से यकायक असहज हो उठे हें। उन्हें डर है कि कहीं उनके उपर भी सख्ती का डंडा न बरसने लगे. इसके अलावा उनकी चिंता यह भी है कि अगर कहीं वर्धा के हिन्दी विश्वविद्यालय की व्यवस्था वाकई सुधर गयी, तो न सिर्फ़ इनके हाँथ से सत्ता की सारी मलाई निकल जायेगी, बल्कि पूरे देश में विभूति के नाम का डंका भी बजाने लगेगा। इन बातों से ये इतना परेशान हो उठे है कि तर्कहीन व बे-बुनियाद आरोप लगाने लगे हैं। और मर्यादा की सारी हदों को पार करके व्यक्तिगत आक्षेपों व गाली-गलौज पर उतर आए हैं। पर अंततः ख़ुद ही बेनकाब हो रहे हैं।
आज बस इतना ही। शेष अगली बार।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

आखिर इन विवादों की मंशा क्या है?---दो

प्रेमचंद नहीं तो फ़िर कौन ?

रत्न कुमार संम्भारिया द्वारा प्रेमचंद की कहानी पूस की रात की चीड़-फाड़ और उसकी कमियों की तरफ़ इशारा करने का प्रयास सफल हो सकता था,यदि उन्होंने स्वस्थ नज़रिया, भाषा और शैली का इस्तेमाल किया होता.पर अपने निहायत ही अवैज्ञानिक व पूर्वाग्रहों से ग्रस्त समझ और प्रयासों के कारण वे न सिर्फ़ बुरी तरह से असफल हुए हैं, बल्कि बड़ी जल्दी ही अपनी बचकानी और बीमार मानसिकता को उजागर भी कर दिया है. वैसे भी, अक्सर अवैज्ञानिक स्थापनाओं के लिए विज्ञानं और सबूतों का ही सहारा लिया जाता है. यह हम रोज़ देखते हैं. भूत-पिशाचा या आत्मा-परमात्मा को सही साबित करने के लिए विज्ञान या परा-विज्ञान का ही इस्तेमाल किया जाता है. सवाल यह नहीं है कि प्रेमचंद को मौसम की जानकारी थी या नहीं. उनको किसानी आती थी या नहीं. या फ़िर वे गांधीवादी थे या नहीं. वे जेल गए थे कि नहीं. देखने और समझने वाली बात केवल यह है कि वे किसके लेखक थे ? उनहोंने अपनी कथा कहानियो में किसका दुःख दर्द उकेरा था ? और देश या समाज के प्रति उनका नज़रिया क्या था ? वे अपनी रचनाओं में जनता की तरफ़ थे या जनता के दुश्मनों की ओर ?
दरअसल, रत्न कुमार जी को अभी प्रेमचंद और उनके समग्र साहित्य को ठीक से पढ़ने और समझने की जरूरतहै.(यह वैसे भी, किसी भी नए लेखक या समीक्षक को अपनी समझ या दृष्टि को विकसित एवं वैज्ञानिक बनाने केलिए बहुत ज़रूरी है.) तभी तो उनको यह पता चल पायेगा कि आख़िर प्रेमचंद अन्य लेखकों से अलग या श्रेष्ठ क्यों हैं ?और आज भी जब भी हिन्दी की जनपक्षधर-यथार्थवादी कहानियो की बात होती है तो कफ़न, पूस की रात, सवासेर गेहूं और गोदान आदि की ही मिसाल गर्व से क्यों दी जाती है ? अब इन कहानियो में खोज खोज कर गलतियाँ ढूँढना और इनको या फ़िर प्रेमचंद को एक गल़त समझ का कहानीकार बताना ख़ुद समीक्षक की सोच-समझ पर ही सवालिया निशान लगा देता है.

भाई मेरे, प्रेमचंद ने ये कहानियाँ तब लिखी थीं, जब हिन्दी कथा साहित्य में इस तरह की कहानियो का चलन था. कहानी उससे पहले मन-बहलाव की चीज़ हुआ करती थी. उसमे कल्पना , कला और शिल्प तो था, पर उसमें जीवित जनता बिल्कुल नहीं थी. प्रेमचंद ने पहली बार मजदूरों, किसानों, गरीब मध्यवर्गीय लोगों और महिलायों को कहानी में जगह दी. और सिर्फ़ जगह ही नहीं, उन्होंने उनके दुःख-दर्द को इस नज़रिए से प्रस्तुत भी किया कि पाठकों को लगे कि उनकी इन बद्तर स्थितियों के लिए वाकई जिम्मेदार तत्त्व कौन हैं ? और आख़िर इन मजलूमों कि स्थिति बदलेगी कैसे ? दूसरे शब्दों में कहें, तो प्रेमचंद ने ही सबसे पहले अपनी कहानियो में सामंतवाद और पूंजीवाद को व्यापक जनता के दुश्मन के तौर पर चित्रित किया था. और उनके प्रति पाठकों के मन में नफ़रत पैदाकी थी. यह एक बड़ी बात है.
वैसे. रत्न कुमार जी को अपनी विस्फोटक खोज के साथ-साथ लगे हांथों यह भी खुलासा कर देना चाहिए था कि आख़िर उनकी निगाह में प्रेमचंद से बड़ा कौन है ? या प्रेमचंद को उनके स्थान से विस्थापित करके वे उनके समकालीन या उनकी बाद की पीढी में से किसको वहाँ बिठाना चाहते हैं ? परन्तु ऐसा न हो पाने के कारण उनका पूरा प्रयास मात्र एक निषेधात्मक एवं अपमानजनक वक्तव्य बन कर रह गया है.और कुछ नहीं. आशा है, रत्न जीऔर तमाम सुधि पाठक गण मेरी बातों से जरूर सहमत होंगे.
....अपनी अगली टिप्पणी में मै विभूति नारायण राय वाले ज्वलंत विवाद पर अपनी बात रखने का प्रयास करूँगा. कृपया प्रतीक्षा कीजिये.

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

आख़िर इन विवादों की मंशा क्या है ?---एक

आज कल कई पुराने पिटे पिटाये जिन्नों (मुद्दों) को नए-नए चोले पहना कर फ़िर से बोतल से निकाल दिया गया है. और साहित्य के कुछ नए पुराने पुरोधा फ़िर से अपने अपने तर्क-वितर्क लेकर बहस के अखाड़े में उतर आए हैं. बहस जारी है . और लोग बाग़ इन हम्मामों में नंगे हो रहे हैं. वैसे देखें तो इन बहसों का कोई ख़ास मतलब नही है,पर साहित्य और संस्कृति के सुधि जनों का यह फ़र्ज़ बनता है कि वे इसमे हस्तक्षेप अवश्य करें. नहीं तो, आने वाले दिनों में जन जीवन और समाज की तरह उन तमाम साहित्यिक मूल्यों और मानदंडों को भी विकृत कर दिया जाएगा,जिन पर न सिर्फ़ हमारा सहित्य,हमारी संस्कृति टिकी हुई है ,बल्कि जिनकी वजह से हमारा समाज भी जीवित व गतिशील है.
आज अभी मैं एक अनजान से समीक्षक रत्न कुमार सांभरिया द्वारा उठाये गए सवाल या उनके द्वारा कथा सम्राट प्रेमचंद पर की गयी गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी पर अपनी बात रखूँगा. वे पूस की रात कहानी की चीड़-फाड़ करते हुए कहने की कोशिश करते हैं कि प्रेमचंद को न तो यथार्थ की समझ थी और न ही उनको किसानों, किसानी, देश और समाज से कोई लगाव. अपनी पूरी विद्वत्ता के ज़रिये उन्होंने प्रेमचंद को नीचा और ख़ुद को महान व समझदार साबित करने का भरपूर प्रयास किया है. शब्द चाहे जैसे भी इस्तेमाल किए गए हों, पर वे कहना यही चाहते है कि प्रेमचंद एक साधारण लेखक थे. उनको खामख्वाह कथा सम्राट के सिंघासन पर बैठा दिया गया है? उनका यह लेख पाखी पत्रिका के दिसम्बर अंक में छपा है। और खूब चर्चा में है.
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि प्रेमचंद पर इस तरह से हमला किया गया हो. विशुद्ध कलावादी ,भाववादी और प्रतिक्रियावादी कई लेखक व समीक्षक पहले भी इस तरह के प्रयास कर चुके हैं. पर अपने आधारहीन तर्कों व अवैज्ञानिक समझ के कारण वे कभी सफल नही हो पाए. होते भी कैसे ? सच के आगे झूठ की बिसात ही क्या होती है ?और सच तो यह है कि प्रेमचंद सिर्फ़ एक लेखक ही नहीं जनता के लेखक थे. उन्होंने न सिर्फ़ कल्पना के आसमान पर उड़ती हुई हिन्दी कहानी को यथार्थ की ज़मीन पर उतारा था, बल्कि उसको प्रगतिशील और जन पक्षीय रंगत भी दी थी।यही नहीं,प्रेमचंद के अन्दर दृष्टि और विचारों की इतनी इमानदारी थी कि वे सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन के लिए चलने वाले जनांदोलनों में लेखकों की सक्रिय भागीदारी के भी थे. और अपने अन्तिम दिनों में स्वयं एक व्यापकआधार वाले साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन बनाना चाहते थे। उनके अन्तिम कुछ लेखों में इसको आसानी से देखा जा सकता है। प्रेमचंद की इन्ही सारी खूबियों के कारण उन्हें कथा सम्राट कहा जाता है. और इन्हीं वज़हों से ही तमाम प्रतिक्रियावादी उनसे चिढ़तें हैं. और जब तब लट्ठ लेकर उन पर पिल पडतें हैं. पर सोचने वाली बात यह है कि आखिर क्या कारण है कि आज इतने सालों के बाद भी प्रेमचंद प्रसांगिक हैं और उनका साहित्य पूरी दुनिया में आदरणीय बना हुआ है ? इस बीच न जाने कितने लेखक आए और समय की गर्त में कहीं गुम हो गए.
दरअसल ,यह प्रतिगामी और प्रगतिशील तथा जनपक्षीय और जनविरोधी विचारों की लड़ाई है. जो लोग कला कला के लिए हो, जनता के लिए बिल्कुल न हो के झंडाबरदार हैं और साहित्य व समाज से सोच समझ व विचारों को जबरन ख़त्म करना चाहते हैं, उनको प्रेमचंद सबसे बड़े दुश्मन नज़र आते हैं. लगता है, इधर जिस तरह से अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, इतिहास और पाठ्य पुस्तकों में जन विरोधी व प्रतिगामी ताकतों को घुसा कर इनको विकृत करने की कोशिशें हो रही हैं, उसी तरह से रतन कुमार सांभरिया जैसे लोग भी पीछे के रास्ते से साहित्य के गलियारे में चुपके से घुसना चाहते हैं. पर वे भूल जाते हैं कि साहित्यिक का क्षेत्र कोई नौकरी पाने या नामांकित होने की पीठ या संस्था तो है नहीं, जहाँ किसी की कृपा या जुगाड़ से जगह बना लिया जाय. यहाँ तो अन्तिम स्वीकृति तो सुधि पाठकों व जनता को देना होता है. और जनता तो तो उसी को स्वीकार करती है जो उसके दुःख दर्द को समझ कर उसे सही आवाज़ देता है. अभी तो वह फिलहाल प्रेमचंद को ही अपने सिर आंखों पर बिठाये हुए है.
आज इतना ही. शेष फ़िर कभी ----