सोमवार, 22 अगस्त 2011

कुल मिला कर "आरक्षण" एक बकवास फ़िल्म है

वैसे तो आज कल की हिंदी फिल्मों पर चर्चा करना और उन पर कुछ भी लिखना अपना समय बर्बाद करना है, पर न चाहते हुए भी "आरक्षण" फ़िल्म पर टिप्पणी करने से मैं अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूँ। पर इसकी वज़ह यह कत्तई नहीं है कि मैंने इस फ़िल्म से सामाजिक सरोकार की कोई बड़ी उम्मीद लगा रखी थी या कि मैं यह सोच रहा था कि शायद यह फ़िल्म अपने माध्यम से आज के युवा मनों में आरक्षण को लेकर चलने वाली तमाम उथल-पुथल को कोई तर्कसंगत दिशा देगी और जातिवाद की बढ़ती हुयी खाई को सामाजिक एवं राजनीतिक तौर पर पाटने के लिए अपनी सीमाओं में ही सही कोई सांकेतिक बौद्धिक हल सुझाएगी। और समाज में आरक्षण को लेकर नए सिरे से कोई वैज्ञानिक या जनपक्षीय बहस छिड़ जायेगी। आज की फिल्मों से इस तरह की कोई भी उम्मीद रखना कोरी बचपना ही नहीं बहुत बड़ी मूर्खता भी है यह मैं अच्छी तरह से जानता-समझता हूँ। अब चाहे उस फ़िल्म का निर्देशक प्रकाश झा ही क्यों न हो?
वैसे
भी, अब आज के प्रकाश झा पुराने "फोर्सेज आफ्टर दी स्टार्म" या "सोनल" जैसी डोकुमेंत्री या फिर "दामुल" जैसी फ़िल्म बनाने वाले प्रकाश झा तो हैं नहीं। अब वे भी इस मुक्त बाज़ार की गति व दिशा को अच्छी तरह से समझने वाले और दर्शकों को महज उपभोक्ता मान कर उनकी जेब से पैसा उगाहने वाले एक धुरंधर व्यवसायी बन गए हैं।आम मुम्बईया फिल्मों के आम निर्देशकों की तरह। आज के प्रकाश झा ने भी यह कला खूब अच्छी तरह से सीख ली है कि सामाजिक सरोकार के अति संवेदनशील मुद्दों को फिल्मों की विषयवस्तु बनाकर और उसे ग्लैमर की चासनी में लपेट कर बाज़ार में कैसे परोसा जाता है ? कैसे उसकी मार्केटिंग की जाती है ? कैसे दर्शकों के बीच फ़िल्म को एक बहुत बड़ी सनसनी के तौर पर प्रचारित किया जाता है? और कैसे उनको इस से तरह उद्वेलित और उकसाया जाता है कि वे हर हाल में फ़िल्म को देखने के लिए लालायित हो जाएँ?
आरक्षण के साथ तो उनहोंने हद ही कर दी। मीडिया के साथ मिलकर और अमिताभ बच्चन की छवि पर सवार होकर उन्होंने समाज में न सिर्फ एक ख्वामखाह की सनसनी खड़ी करने की कोशिश की, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक हर उन बिन्दुओं को भी इस तरह से उकसाने और भड़काने की कोशिश की जिससे जगह जगह "आरक्षण" का विरोध होने लगा और फ़िल्म को प्रतिबंधित किया जाने लगा। और प्रकाश झा बिलकुल यही चाहते थे। उनको पता है कि इस समाज में जो प्रतिबंधित होता है वह खूब बिकता है। अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जाकर उनकी यह फ़िल्म पूरे देश में प्रदर्शित हो पाई।पर न तो कही कोई हलचल हुयी और न ही कोई उथल पुथल।
जब दर्शकों ने फ़िल्म को देखा तो सब टाएँ-टाएँ फिस्स हो गया। नाम बड़े और दर्शन छोटे। फ़िल्म में नाम को छोड़ कर कहीं से भी आरक्षण का कोई मुद्दा नहीं था। न पक्ष में और ना ही विपक्ष में। और फ़िल्म की जो वास्तविक कथावस्तु थी और शिक्षा जगत में व्याप्त जिस समस्या पर वह गढ़ी-बुनी गयी थी उसका भी यथार्थ से कहीं भी दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। पूरी की पूरी कोरी कल्पना। यही नहीं, मुझे तो इस फ़िल्म में कही भी किसी भी फ्रेम में निर्देशकीय कला कौशल बिलकुल नज़र नहीं आया। न भावना, न संवेदना। सब कुछ एकदम ढीला-ढाला, लचर और बेजान। मेहनत और दृष्टि की घोर कमी। लग ही नहीं रहा था कि हम एक मंझे हुए निर्देशक की कोई फ़िल्म देख रहे हैं। पूरी फ़िल्म में अमिताभ बच्चन को छोड़ कर और किसी को भी उभरने और अपने चरित्र को स्थापित करने का मौका ही नहीं दिया गया है। और अमिताभ बच्चन भी फ़िल्म में बहुत ही लाउड और यथार्थवादी पत्र के रूप में चित्रित किये गए हैं। काश प्रकाश झा ने मार्केटिंग की बजाय कथ्य,पटकथा और निर्देशन पर अधिक ध्यान दिया होता।
कुल मिला कर यह फ़िल्म एक औसत दर्जे की आम मुम्बईया फ़िल्म है , जिसको देखना समय और पैसे की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है।