गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

कहानी--मौसम

[अपनी कहानियों और नाटकों के लिए 1980 और 90 के दशक में चर्चित रहे कथाकार और रंगकर्मी अरविंद कुमार ने एक लंबे अंतराल के बाद चुप्पी तोड़ी है। उनका एक कहानी संग्रह "रात के खिलाफ' और नाटक "बोल री मछली कितना पानी' काफी पहले प्रकाशित हुआ था। इन दिनों मेरठ में रहते हैं।---"द पब्लिक एजेंडा"]
पहाड़ों का मौसम भी बड़ा अजीब होता है. ठीक ज़िंदगी की तरह. अभी धूप, अभी बादल और अभी बरसात. कुछ देर पहले तक आप पसीने से तर बतर हो रहे होंगे, पर अचानक ही तेज़ बर्फीली हवाएं चलने लगेंगी. और आप ठिठुरने कांपने लगेंगे. शाम को आप देखेंगे कि मौसम एकदम खुला और साफ़ है, पर सुबह चरों तरफ सफ़ेद-सफ़ेद बर्फ के फाहे गिरते हुए नज़र आयेंगे.
हमने भी जब सफ़र शुरू किया था तो आसमान बिलकुल साफ और चमकती धूप से लबरेज़ था, पर देखते ही देखते मौसम ने करवट ले ली. आसमान का रंग बदल गया. और हवा के तेज़ झोंको के साथ पानी गिरने लगा. ड्राईवर बहुत एक्सपर्ट था. वैसे भी पहाड़ी सर्पीले और अंधे मोड़ों से भरे रास्तों के ड्राईवर प्रायः एक्सपर्ट ही होते हैं. काफी देर तक तो वह तूफानी हवाओं और घनी बौछारों को चीरता रहा. पर जब मौसम जिद्द में आकर एकदम अड़ गया, तो उसने बेकार में खतरा मोल लेना उचित नहीं समझा.
कपकोट पहुँच कर उसने गाडी रोक दी. और आगे के बारे में ज़रूरी दरियाफ्त करके ऐलान किया---दोस्तों, आगे रास्ते पर चट्टानें आ गिरी हैं. इसलिए कल सुबह तक ही हम आगे बढ़ पाएंगे. वह भी अगर आज रात को आसमान खुल गया तो.
हम लोग ख़राब मौसम और पहाडी रास्तों को कोसते हुए, भींगते-भागते, अपने-अपने सामानों के साथ स्टैंड के पास वाली दुकान की ओर चल पड़े. दुकान क्या, वह करीब-करीब एक धर्मशाल सी थी. आगे बरामदे में कैंटीन. पीछे कुछ छोटे-बड़े कमरे. उसके बाद बड़ा सा एक आँगन. और फिर लकड़ी का एक बड़ा सा टाल. शायद वहां कैंटीन और धर्मशाला के साथ-साथ सूखी लकड़ियों का भी बिजनेस चलता था.
कमरे कम थे और मुसाफिर अधिक. असमंजस में पड़ा मैनेजर बंटवारे के लिए कोई कारगर तरीका तलाश कर उस पर अमल करे इसके पहले ही वह उसके करीब पहुँच गयी---हम लोगों को एक अलग कमरा चाहिए. आप पैसों की चिंता बिलकुल मत कीजियेगा.
मेरे साथ बाकी लोगों ने भी चौंक कर देखा कि उसने हम दोनों में बाकायदा मुझे शामिल कर लिया था. मैनेजर ने पहले उसको देखा, फिर मुझे और फिस्स से हंस पड़ा---अरे मेम साब, हम क्या बुद्धू है कि साब और मेमसाब को एक नहीं दो अलग-अलग कमरा देगा? आप चले जाइये उस्स कमरे में...और उसने दाहिने तरफ के कोने वाले कमरे की तरफ इशारा कर दिया.
वह अपना सामान उठा कर जब कमरे की तरफ जाने लगी, तो मैनेजर ने बड़े संकोच के साथ मुझे अपने पास बुलाया---अगर आप बुरा न मानें तो कुछ और लोगों को आपके साथ...? पर इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, वह तेज़ी से पलट पडी.---नहीं, बिलकुल नहीं...
कमरे में आकर मैंने अपनी सारी झिझक उसके सामने रख दी---आप...आप इसमें इत्मीनान से रहिये. मैं किसी और कमरे में चला जाता हूँ. पर ज़वाब देने के बजाय उसने मुझे घूर कर देखा---क्यों डर लग रहा है मुझसे? और मुस्करा कर मेरा गीला होल्डाल खोल कर फ़ैलाने लगी. और अचरज के फंदों में फंसा हुआ मैं कभी उसे और कभी बाहर बेतहाशा गिरते पानी को देखने लगा.
****
गीले कपड़े बदल कर मैं बरामदे में चाय की दुकान पर आ गया. और सिगरेट सुलगा कर उसके बारे में सोचने लगा...इतने थोड़े समय की जान-पहचान और इतनी आत्मीयता.? मेरे ऊपर इतना भरोसा?...कहीं इसके पीछे कोई चाल तो नहीं?...कहीं यह कोई चालू चालाक औरत तो नहीं?...कौन जाने? क्या पता, मुझे अपने जाल में फंसा कर बाद में पैसे ऐंठने लगे?...आजकल किसी का क्या ठिकाना?...पर चेहरे से तो सीधी-सादी और शरीफ लगती है. आँखें बड़ी निश्छल और निष्कपट हैं...माथे की गोल कत्थई बिंदी भी कहीं से क्रिमिनल नहीं लगती...पर पता नहीं, मासूमियत कहीं सिर्फ दिखावा ना हो...
उसके खुले और बेतकल्लुफ हरकतों ने एक तरफ तो मेरे दिमाग को झकझोर कर रख दिया था, पर दूसरी तरफ मुझे उसका साथ अच्छा और भला भी लग रहा था. जी कर रहा था कि उससे बातें करू. ढेर सारी बातें. लेकिन मैंने अपने आप को गंभीर बनाये रखने में ही भलाई समझी...सावधानी हटी नहीं कि दुर्घटना घटी.
अब यह तो याद नहीं कि वह किस स्टॉप पर चढी थी. पर जब वह चढ़ी, तो पूरे बस में एक हलचल सी भर गयी. मुसाफिरों में एक अजीब तरह की फुसफुसाहट शुरू हो गयी. मैंने भी उसे कई-कई बार मुड़ कर देखा. निगाहें मिलाईं. और शरीफ निगाहों से उसे देख कर मुस्कराया भी. वह कुछ देर तक तो अपना छाता, झोला और ब्रीफकेस लिए खडी रही. पर जैसे ही मेरी बगल वाली सीट खाली हुयी, वह करीब आकर बैठ गयी. निःसंकोच. खुशबू का एक दिलकश झोंका मेरे नथुनों में घुसा. और मैं शराफत से खिड़की की तरफ सरक गया.
मेरे हांथों में “एक चादर मैली सी“ जब उसने यूं ही बंद देखी, तो माँग ली. सबसे पहले उसने कवर को देखा. फिर पीछे छपे नोट को. फिर भीतर लिखा मेरा नाम पढ़ा. और पन्ने पलटने लगी. बीच-बीच में उसने मुझे एकाध बार देखा भी. मुझे पढने की कोशिश भी की. पर मैं गंभीर बना भागती बस के बाहर पीछे छूट रहे दृश्यों को देखता रहा. पहाड़, घाटियाँ और घने हरे-भरे जंगल. आसमान, क्यारियां नुमा खेत, चोटियों से टकराते-उलझते बादल और सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे घर लौटती औरतें और लड़कियां.
सभी मुसाफिर अपने-अपने कमरों में दुबकने की तैयारी कर रहे थे. वह मेरे सूटकेस पर बैठी “एक चादर मैली सी” पढ़ रही थी. मुझे देखते ही मुस्कराई. किताब बंद करके रख दिया. और khadee हो गयी. मैंने सूटकेस से दो चादरें निकालीं. पहले अखबार बिछाया फिर उसके ऊपर से चादरें बिछा कर बिस्तर तैयार किया. उसे बैठने के लिए कहा. और खुद भी आराम से बैठ गया. बैग से कम्बल निकाल कर पावों पर डाला. सिगरेट सुलगाई. और उससे पूछा---आप कहाँ जा रहीं हैं?
---हल्द्वानी.
---उसके बाद?
---बरेली. और आप?
---मुरादाबाद.
---चलिए दूर तक साथ रहेगा.
---आप करती क्या हैं?
---पढ़ाती हूँ.
---कहाँ?
---ऊपर बदियाकोट के पास.
---रहने वाली कहाँ की हैं? बरेली या बदियाकोट?
---मैं आपको पहाडी लगती हूँ या मैदानी? उसने पूछा और खिलखिला पडी. मुझे भी हंसी आ गयी.
****
बिस्तर पर लेटे-लेटे मैं झपकी लेने लगा. पर उसने टोक दिया---आप सो रहे हैं. देखिये, सोइये मत. नहीं तो, मेरा तो कबाड़ा हो जायेगा.
---आप भी सो जाइये. ठंढ बहुत ज्यादे है.
झटके से मैंने कह तो दिया. पर तभी ख्याल आया कि यह सोयेगी कैसे?...कम्बल तो एक ही है...मैं वाकई सकपका गया. वह भी अचानक से उठी और बाहर चली गयी...मैंने सोचा...कहीं इसने मुझे गलत तो नहीं समझ लिया?...अगर इस समय जाकर उसने कमरा बदलने की बात कही तो बड़ी फजीहत हो जायेगी...
कुछ देर बाद वह दो कप चाय और कुछ टोस्ट्स लेकर अन्दर आयी. पर शायद इस बीच मुझे फिर से झपकी आ गयी थी.
---आपको तो बड़ी नींद आ रही है. उठिए. उसने मुझे हलके से हिलाया. उठिए चाय पीजिये. ठंढी हो जायेगी.
मैं उठ कर बैठ गया. देखा वह पूरी तरह से नार्मल थी. निश्चिन्त होकर सिगरेट सुलगाई. और चाय की चुस्कियों के साथ उसको देखने लगा. मेरे इस तरह से देखने से शायद वह असहज हो उठी. पूछा---क्या देख रहे हैं?
---आपकी आँखों में कानफीडेंस बहुत है.
---अच्छा?...और उसकी आँखे गोल होकर चमकने लगीं---चाय तो पीजिये...ठंढी हो रही है.
---मैं चाय ठंढी करके ही पीता हूँ.
अबकी उसकी आँखे हलके से थरथरायीं और मेरे चहरे पर आकर जम गयीं. मानों उसे कुछ याद आ गया हो. मुझे भी तो बरेली सुनकर झटके से वह सब कुछ याद आ गया था, जो आज तक जिन्न की तरह मेरा पीछा कर रहा है.
बहुत देर से सिगरेट की राख झाड़ी नहीं थी. वह टप्प से गिरी और बिखर गयी. उन तमाम बातों की तरह जो अक्सर खामोशी में हमारे भीतर उपजती हैं और चुप्पी की सख्त दीवारों से टकरा कर दम तोड़ देती हैं.
---आपने चाय के पैसे दे दिए क्या? मैंने पूछा.
---हाँ, क्यों? उसकी आँखें सिकुड़ कर छोटी हो गयीं.
---देखिये, यह गलत बात है. आपने पैसे क्यों दिए?
---तो इसमें क्या हो गया?...आप दें या मैं दूं...बात एक ही है...
---बात एक कैसे है? मैं दूंगा तो मेरे पैसे खर्च होंगे. और आप देंगी तो आपके खर्च होंगे...कह कर मैं हंस पड़ा. पर वह नहीं हंसी. चाय की चुस्कियों के साथ चुपचाप मेरे चेहरे को पढ़ती रही.
---अच्छा एक बात बताइए, सच-सच...क्या जब भी कोई महिला अपनी मर्जी से पहलकदमी लेती है, तो आपके अहं को भी ठेस पहुँचती है? औरों की तरह?
---नहीं...नहीं...ऐसी बात नहीं है...मैंने तो यूं ही पूछ लिया था.
---यूं ही कुछ नहीं होता. हर बात...हर शब्द के पीछे एक सोच होती है...आपने भी सोचा होगा कि महिला होकर यह पैसे क्यों खर्च कर रही है?...पैसा कमाने का और पैसा खर्च करने का हक़ तो सिर्फ आप मर्दों का होता है...इसी कारण बहुत से लोग अपनी बीबियों को नौकरी नहीं करने देते...और अगर मजबूरी में करने भी देते हैं, तो ऊपर से सौ बंदिशें थोप देते हैं...यह मत पहनो...वह मत पहनो...इतनी देर कहाँ थी?...कौन आया था छोड़ने?...आज छुट्टी के दिन भी आफिस? उसका चेहरा तमतमा कर लाल हो गया.
मैं बिना कुछ कहे चाय सुड़कता रहा. दुकान का छोकरा आया. और कप प्लेटें उठा ले गया.
---देखिये मेरी बातों का बुरा मत मानियेगा...शायद मेरी चुप्पी ने उसे सामान्य कर दिया था---दरअसल, जब भी कोई मुझे सिर्फ एक महिला समझता है, तो मुझे बहुत बुरा लगता है...बचपन से ही दया, उपेक्षा, भेदभाव और ख्वामख्वाह की रोक-टोक झेलते-झेलते मैं ऊब चुकी हूँ...इसलिए घर-परिवार से इतनी दूर रह कर...अपनी मर्जी से...अपनी ज़िंदगी जी रही हूँ...
वह उदास हो गयी. मेरा मन भी कचोटने लगा. बहाना-बचाव के लिए मैंने सिगरेट के पैकेट को टटोला. पर वह खाली हो चुका था. नए पैकेट के लिए मैं उठ कर बाहर आ गया. बाहर पानी थम चुका था. पर बर्फीली हवाएं बदस्तूर चल रहीं थीं. अगल-बगल के कमरों का शोर थक-हार कर निढाल हो चुका था. कुछ देर तक वहीं रुक कर मैं ठंढ का लुत्फ़ उठता रहा. और जब लौटा तो देखा कि उसने स्वेटर पहन लिया है. और अपनी उदास आँखों से बैठी हुयी किताब के पन्नों को उलट-पुलट रही है.
---क्यों अभी तक नाराज़ है? मैंने उसे उदासी के घेरे से बाहर निकालने की कोशिश की.
---नहीं तो. आप कहाँ चले गए थे? वह मुस्कुराई. पर एक हल्की फीकी सी मुस्कान.
मैंने कम्बल उसके पैरों पर डाल दिया---ठण्ड काफी बढ़ गयी है. पैर ढँक लीजिये.
उसने कम्बल से अपने पैरों को लपेट लिया. और सिर झुका कर आँखों को बंद कर के चुपचाप बैठ गयी. असहज. अस्थिर. मानों उसके भीतर बहुत कुछ उमड़-घुमड़ रहा हो.
****
---आप सिगरेट बहु पीते है.
---हाँ, आदत सी पड़ गयी है. मैं हलके से मुस्कुराया.
---आपको पता है, यह स्वास्थ्य के लिए कितना नुकसान दायक है? ऐक्टिव और पैसिव दोनों तरह के स्मोकर्स के लिए...एक सिगरेट से एक ट्रिलियन फ्री रेडिकल्स बनते हैं...
---जानता हूँ...पर क्या करूं छूटती ही नहीं.
----किसी ने मना नहीं किया?
मैंने उसकी तरफ देखा. लगा, वह शरारत से मुस्कुराते हुए मुझे घूर रही है. क्या ज़वाब देता? एक बेतुका सा सावल...पर मेरे लिए कहीं गहरे तुक से जुड़ा हुआ. जानता था, जवाब का हर पहलू एक छलावा होगा. एक पलायन...पर सच से क्या कोई भाग सकता है? वह एक टक चुपचाप मेरे अन्दर की उथल-पुथल को बड़ी बारीकी से पढ़ रही थी. उसकी एक्स रे नुमा निगाहें भीतर गहरे तक धंस कर कुछ तलाश करने की कोशिश कर रही थीं. उफ़, कितना कठिन हो रहा था उन लम्हों को पार कर पाना.
अचानक मुझे लगा कि वीरा अतीत की काली गहराईयों से निकल कर...सारी बंदिशों को तोड़कर मेरे सामने आकर बैठ गयी है. वही रंग. वही रूप. देखने का वही अंदाज़. उसी तरह गोरे नाजुक हाँथ. पतली-पतली खूबसूरत आर्टिस्टिक उँगलियाँ. और दाहिने हाँथ की बीच वाली उंगली की जड़ पर एक काला बड़ा सा तिल...ठीक इसी तरह वीरा भी अक्सर टखने मोड़ कर बैठ जाती थी...पर क्या वीरा इस तरह इतने कांफीडेंस के साथ किसी अज़नबी के साथ बैठ सकती थी? उसका कमज़ोर व्यक्तित्व और घर-परिवार का दकियानूसी माहौल क्या उसे इस तरह अकेले ज़िंदगी का सफ़र तय करने देता?
दूर कहीं बिजली चमकी और बादलों की गडगडाहट ज़ेहन से लेकर तलुए तक सब कुछ झकझोरती हुयी चली गयी. क्या वह भी कुछ सोच रही है? क्या उसे भी यादों के अज़गर अपनी कुण्डली में लपेट रहे हैं? मैंने सोचा. पर वह पढ़ने में मशगूल थी. मैंने उसे देखा. उसने मुझे. हमारी आँखें मिलीं. वह मुस्कराई. और शायद मैं भी. और धीरे-धीरे मेरी पलकें मुंदने लगीं.
****
नींद खुलने के काफी देर बाद जाके ख्याल आया कि मैं एक मुसाफिर की हैसियत से, धर्मशाला के एक कमरे में एक अज़नबी महिला के साथ टिका हुआ हूँ. मैंने इधर-उधर देखा. वहां अंधेरे के सिवा और कुछ नज़र नहीं आ रहा था. मच्छर भिनभिना रहे थे. बाहर काफी हलचल थी. शायद कुछ लोग चाय-वाय पी रहे थे. वह भी बाहर गयी होगी. मैंने अंदाज़ा लगाया. जी में आया कि छोकरे को बुलाकर चिराग जलवा लूं. पर उठने की, बोलने की इच्छा बिलकुल नहीं हो रही थी.

उदास उदास मन और काटने को लम्बी काली रात. सिगरेट की तलब महसूस हुयी. मैंने पैकेट और दियासलाई को टटोला. पर तभी मेरे सख्त हांथों से कुछ नर्म नर्म उँगलियाँ टकरायीं. मैं चौंका. वह मेरे करीब पड़ी बेखबर सो रही थी.
---अरविन्द कुमार 
(यह कहानी "द पब्लिक एजेंडा" के 16-31 दिसंबर 2013 के अंक में पेज 62-64 पर प्रकाशित हुयी है.)