शनिवार, 18 जुलाई 2015

कहानी

प्यार, पुलिया और प्रमोशन (समापन किश्त)
आज शाम को जब वह रोज़ की तरह आफ़िस से थक-हार कर घर पहुँचा, तो देखा कि वहां मुहल्ले वालों का मजमा लगा हुआ है। और रीना ने रो-रो कर पूरे घर को ही नहीं अड़ोस-पड़ोस को भी अपने सिर पर उठा रखा है। उसे देखते ही वह बिफर पड़ी---“देखा, तुम्हारी छूट का नतीज़ा।...कलमुंही चेहरे पर कालिख पोत कर भाग गयी।...उसी रामसुमेरवा के लौंडे के साथ।...बड़ी गर्मी सवार हो गयी थी।...मैं बार-बार कहती थी कि जल्दी से उसके हाँथ पीले कर दो।...लौंडिया के लक्षण ठीक नहीं हैं।...ज़रूर कोई गुल खिलाएगी।...पर तुमने मेरी एक न सुनी।...अब झेलो बदनामी।...नाते-रिश्तेदार और बिरादरी वाले सब तुम्हारे मुँह पर थूक रहे हैं।...अरे खड़े-खड़े मुँह क्या देख रहे हो।...फ़ौरन थाने जाकर रपट लिखाओ।...अबहीं जादे दूर नहीं गये होंगे।...हरामी सब।

चीख-चीख कर वह अचानक ही ज़ोर-ज़ोर से छाती पीटने लगी। और देखते ही देखते एक कटे हुए पेड़ की तरह धड़ाम से गश खाकर गिर पड़ी। छोटकू अम्मा-अम्मा कह कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा---“तब से ऐसे ही कर रही है। बाबूजी कुछ कीजिए।”...किसी तरह पानी के छींटे मार-मार कर वह रीना को होश में लाया। और चारपाई पर लिटा कर पंखा झलने लगा। चूल्‍हे में पड़ी दोपहर की अधजली लकड़ियाँ राख में मुंह छुपा कर सुस्त पडी थीं। और रात की बुझी हुयी कालिख पुती लालटेन कोने में सहमी सिसक रही थी। और पूरे घर में मातम छाया हुआ था। श्याम अपने आवारा, बेरोज़गार और गुंडा दोस्तों के साथ बंटी की तलाश में ज़मीन-आसमान एक कर रहा था। उसने रीना को समझाया। सांत्वना दी। पानी में नींबू-नमक और चीनी घोल कर पिलाया। मुहल्ले वालों को हाँथ जोड़ कर अपने-अपने घर जाने का आग्रह किया। और छोटकू को माँ की देखभाल करते रहने की हिदायत देकर तीर की तरह घर से बाहर निकल गया। बाहर तो वैसे वह हर शाम को निकलता है। पर थोड़ा सुस्ता कर चाय पीने के बाद। नाश्ता-पानी उसे साहब की कोठी पर मिल जाता है। और देर हो जाने पर कभी-कभार खाना भी।
      घर से निकला तो वह थाने के लिए ही था। पर कुछ कदम चलने के बाद से ही उसका इरादा हिचकोले खाने लगा।...‘थाने वाले क्या करेंगे? क्या मेरी या मोहल्ले वालों की बात मान कर फ़ौरन रिपोर्ट लिख लेंगे?...और रिपोर्ट लिख भी लेंगे तो क्या वाकई कोई कारगर कार्यवाही करेंगे?...पता नहीं, वह घाघ दरोगा अबकी बार कितने रुपयों की माँग करे?...लेकिन रिपोर्ट में मैं लिखवाऊंगा क्या?'
      उसे याद आया कि इससे पहले भी श्याम के केस में उसे थाने के कई चक्कर लगाने पड़े थे। हज़ारों रुपये यूँ ही पानी की तरह बह गये थे। उस समय भी शर्म और संकोच से उसने साहब को बीच में नहीं डाला था। डालता भी कैसे? सच्चाई जानने के बाद क्या वे वाकई श्याम को बचाते? और अगर बचा भी लेते तो क्या मौका आने पर उसके ज़ुआरी बेटे की नौकरी के लिए अपनी सिफारिश करते? श्याम मोंटू के साथ ज़ुआ खेलते हुए पकड़ा गया था। ‘मोंटू स्साला!’ वह बुदबुदाया और उसकी मुट्ठियाँ कस गयीं।  
      अचानक ही उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगा...‘श्याम पर शुरू से ही पाबंदी क्यों नहीं लगाई?...उसे आवारा दोस्तों की सोहबत छोड़ने के लिए कभी डांटा-फटकारा मारा-पीटा क्यों नहीं?...शांति पर भी इतना भरोसा क्यों किया?...उस पर भी कभी कोई लगाम क्यों नहीं कसी?...उसके बदले-बदले हाव-भाव और आज़ाद हो कर उड़ने के लिए बेताब निकलते हुए परों को देख कर भी उसने अनदेखा क्यों किया?...उस दिन...ठीक उसी दिन शांति का गला क्यों नहीं काट दिया, जब उसकी खिलखिलाहट पिछवाड़े के अंधेरे खंड से निकल कर पहली बार उसके कानों को चीरती हुई चली गयी थी?
गोधुली बेला थी। वह अभी-अभी आफ़िस से लौटा था। बेटी की खनखनाती हँसी ने उसे चौंकाया ही नहीं स्तब्ध भी कर दिया था। उसे जोरों का करेंट लगा था। और यकायक ही अनेकों नागफनियाँ उसके शरीर से लिपट गयी थीं। एक चंचल हिरनी की तरह हँसती-कुलांचे मारती हुयी वह जब घर में घुसी, तो वह लगभग चीख पड़ा था---“खंड में कौन था तेरे साथ?...और वहाँ अंधेरे में क्या कर रही थी? पर तभी उसकी निगाह उसकी मुट्ठी में छिपे मोबाईल फोन पर पड़ी---“यह कहाँ से आया तेरे पास?
           पर न तो वह डरी थी। न ही घबराई। उसने बड़ी निश्च्छलता से जवाब दिया था---“बंटी का है, बाबूजी। उसने रखने के लिए दिया है। कल ले जाएगा।” उसने पूछना चाहा कि वह यहाँ क्यों आया था? और उसने यह तुझे ही क्यों दिया है? पर जवान-सियान बेटी की मासूमियत से इस तरह थुक्कम-फ़ज़ीहत करना उसे मुनासिब नहीं लगा था। ‘जवान लड़की है। दिन भर घर बाहर का काम करती है। हो गयी होगी बंटी से जान-पहचान। दोस्ती। इसमें बुराई क्या है?’ रीना के लाख उकसाने के बावज़ूद उसने अपनी आँखों को बंद करके ज़ुबान को तालू से चिपका लिया था। 
      शांति इसी तरह बेहिचक अंधेरे खंड में आती-जाती रही। बंटी शाम सवेरे घर के चक्कर काटता रहा। रीना अक्सर बड़बड़ाती और उलाहने देती रही। पर शांति की तरफ से वह हमेशा निश्चिंत बना रहा। न तो कभी बंटी को टोका-टाका और न धमकाया। और न ही कभी रामसुमेर ड्राईवर के पास जाकर उसकी कोई शिकायत की। और अगर शिकायत करता भी, तो किस बात की करता? अगर कहीं वह पलट कर यह कह देता कि मेरे लौंडे की शिकायत करने के बजाय, तू अपनी लौंडिया को काबू में रख। तब? अब थाने जाकर वह किसकी और किस बात की रिपोर्ट लिखवाएगा? बहला-फुसला कर शांति को भगाने की रिपोर्ट? या जबरन अगवा कर के फिरौती माँगने की?...शांति को अपनी मर्ज़ी से, अपनी पसंद के लड़के से शादी करनी थी, तो कर लेती।...लेकिन कम से कम उसे बता तो देती।...लेकिन अगर वह बता भी देती तो क्या वह गैर बिरादरी और वो भी एक छोटी जाति के बंटी के साथ खुशी-खुशी उसका लगन करने के लिए तैयार हो जाता?...और अगर वह तैयार हो भी जाता, तो क्या रीना, श्याम और सारे नाते-रिश्तेदार भी तैयार हो जाते? बिरादरी तैयार होती?...न होते ससुरे! लेकिन बेटी तो खुश रहती। उसका घर तो अच्छे से बस जाता।...अब तो न माया मिली, न राम। 
      शान्ति गयी तो गयी, पूरे परिवार की इज़्ज़त भी मिट्टी में मिल गयी।...लेकिन वह इस बात की रिपोर्ट लिखवाएगा कैसे?...जाति-बिरादरी के नाम पर तो साहब भी उखड़ जायेंगे। कहीं उन्होंने इसी बात को इशू बना लिया तो?...तब तो उसके सारे किए धरे पर पानी फिर जायेगा। उसने सोचा---‘शांति तो अपनी मर्ज़ी से गयी है।...कोई दूध पीती बच्ची तो है नहीं।...अपना भला बुरा सब सोच-समझ कर ही तो घर से निकली होगी।...बंटी भी बालिग है।...क्या पता दोनों की निभ ही जाए।...और उनका घर वाकई अच्छे से बस जाए।...ऐसे में थाना और कचहरी के चक्कर कटवा कर उनकी छीछालेदर करवाने से फ़ायदा?...अगर उनकी अच्छे से निभ गयी, तो ठीक। और नहीं निभी, तो खुद ही कहीं कुंए में जाकर डूब मरेगी।...या फिर पछतावे के आसूं बहाते हुए वापस आ जायेगी। तब की तब देखी जायेगी।...रीना को वह सम्हाल लेगा। श्याम को भी समझा-बुझा कर शांत कर देगा।...आन-बान और शान की लड़ाई का खेल तो बड़े लोग खेलते हैं। हम गरीबों की तो सारी लड़ाई वजूद की लड़ाई होती है।...पर वह सिर्फ बुरा और अनिष्ट के बारे में ही क्यों सोच रहा है?...सब कुछ ठीक-ठाक और अच्छा भी तो हो सकता है।...क्यों न हम सब मिल-मिलाकर इसे एक अच्छा और मजबूत रिश्ता बना दें?...क्यों न साहब को बीच में डाल कर शान्ति और बंटी के इस कदम को प्यार का एक खूबसूरत रूप दे दें?’ 
      उसने अपने आप को समझाया। तैयार किया। और अचानक ही वह अपने आप को हल्का महसूस करने लगा। उसने तसल्ली भरी एक लंबी सांस ली। उठा। और तेज़-तेज़ कदमों से कोठी की तरफ़ चल पड़ा। कोठी में घुसते ही उसने देखा कि मेमसाहब तालाब की मछलियों को दाना डाल रही हैं। उसे देखते ही वे चिल्लाईं---“यह तुम्हारे आने का टाइम है? देखो तो ज़रा, क्या टाईम हो रहा है? देख रही हूँ कि अब तुम्हारे ऊपर भी चर्बी चढ़ने लगी है। काम नहीं करना है, तो साफ़-साफ़ बोल दो। साहब किसी और को बुला लेंगे। तुम क्या समझते हो? अगर तुम नहीं आओगे, तो मेरा काम ही नहीं होगा। आज दुलारी और रामसुमेर ने तुम्हारा सारा काम सुलटा दिया है। अब तुम गाड़ियों को साफ़ करो। फूलों को पानी दो। और किचेन में जाकर दुलारी की हेल्प करो।”  
      इससे पहले कि वह कुछ बोले या देर से आने के लिए माफी मांगे, शाम की सैर के लिए निकल रहे साहब की निगाह उस पर पड़ गयी---“अरे आओ भाई, आओ। मैं तो तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।...अरे सुनती हो, पहले इसका मुंह मीठा कराओ। इसका प्रमोशन हो गया है। अब यह हमारे आफिस का बाबू बन गया है। बाबू। अभी अभी शाम को आर्डर आया है। बधाई हो...मैडम, इसका मुंह तो मीठा कराओ।”  
      इसके बाद साहब ने और क्या क्या कहा? मेम साहब ने क्या कहा? रामसुमेर ने उसके पास आकर क्या कुछ कहने की कोशिश की। और दुलारी ने हंस कर उससे क्या कहा? उसे कुछ भी सुनायी नहीं पड़ा। वह बस चुपचाप किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो कर साहब का मुंह देखता रहा। उसकी समझ में यह बिलकुल नहीं आ रहा था कि वह साहब से क्या कहे? मुस्कुरा कर उनको धन्यवाद दे, हंस कर खुशी ज़ाहिर करे या फिर फूट-फूट कर रोने लगे। (समाप्त)   
---अरविन्द कुमार  
[यह कहानी "कथा क्रम" के "अप्रैल-जून 2015" के अंक में प्रकाशित हुआ है]    

         
 

रविवार, 12 जुलाई 2015

कहानी

प्यार, पुलिया और प्रमोशन (भाग-एक)

वह तेज़ कदमों से भाग रहा था। भागते-भागते कभी वह रुकता। पीछे मुड़ कर देखता। कुछ सोचता। और फिर भागने लगता। कभी तेज़। कभी धीरे। कभी बहुत धीरे। और फिर अचनाक ही बहुत तेज़। इसी तरह भागते, रूकते, पीछे मुड़ कर देखते, सोचते और फिर भागते हुए वह अब मुख्य सड़क पर आ गया था। सड़क पर रोज़ की तरह चल-पहल थी। शोर था। भीड़ थी। तेज़ कारें। मोटर साइकिल। स्कूटर। रिक्शे। और पैदल। एक दूसरे से बेख़बर। अपनी अपनी धुन में मगन। सभी हमेशा की तरह अपने-अपने गंतव्य की ओर भाग रहे थे। वह भी उस भागती हुयी भीड़ में शामिल हो गया।
उसके दिमाग में इस समय भारी उथल-पुथल मची हुयी थी। बहुत सारी बातें। ढेरों सवाल। सवालों के धूल भरे बवंडर उसे बुरी तरह से मथ रहे थे। उसे एक-एक कदम उठाना भारी, बहुत मुश्किल पड़ रहा था। चलते चलते उसने सिर उठा कर आसमान की तरफ देखा। ‘उफ़, काफी देर हो गयी है।’ वह बुदबुदाया—‘आज तो मेम साहब चिल्ला चिल्ला कर जान ले लेंगी। और गुस्से में न तो चाय देंगी और न ही नाश्ता। पूरा पेर कर रख देंगी।’ अचानक ही साहब की कोठी एक अजगर के रूप में तब्दील हो गयी। और मुंह फाड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगी। उसने बड़ी मुश्किल से अपने कदमों को ज़मीन पर जमाया। और मजबूती से खड़ा हो गया। इस समय वह अपने आप को बहुत ही थका, कमज़ोर और शिथिल महसूस कर रहा था। बूढ़ा। बेबस। और बेजान।
उसे अचानक खाट पर पड़ी बीमार रीना की याद आ गयी। उसे चिंता हुयी। और वह परेशान हो गया। रीना की याद आते ही शांति का ख्याल भी आकर उसे बुरी तरह से कोंचने लगा--‘पता नहीं, इस समय वह कैसी और किस हाल में होगी? कहीं नादानी में किसी हादसे का शिकार न हो जाये...आजकल किसी का क्या भरोसा?’ उसने सोचा। दोस्तों के साथ मिलकर सामूहिक बलात्कार करने या दलालों द्वारा मासूम लड़कियों को बहला-फुसला कर बाज़ार में ले जा कर बेचने की ढेरों खबरें अचानक ही उसके दिमाग़ में कौंध गयीं। वह अंदर तक काँप उठा। और उसके कदम थरथराने लगे।
‘तो क्या पहले थाने चला जाये? कुछ लोगों को जुटा कर रिपोर्ट लिखवाई जाये या साहब को बीच में डाल कर पूरे मामले को शांति पूर्वक सुलझा लिया जाये।...पर अगर साहब ने बीच में पड़ने से मना कर दिया तो?...कहीं ऐसा न हो कि शांति के चक्कर में श्याम वाला काम भी ख़राब हो जाये?...तो क्या वह सब कुछ यूं ही भूल जाये? रीना के दर्द भरे आँसू। बंटी की छोटी जाति। शांति द्वारा मुंह पर पोती गयी कालिख। बिरादरी और इलाके में हुई परिवार की बेइज़्ज़ती।...क्या वह इन सब पर मिट्टी डाल दे? और इसे नियति का खेल मानकर चुप-चाप बैठ जाये? रोज की तरह कोठी पर जाये? मन लगा कर अपनी ड्यूटी बज़ाये?
साहब उसके लिए एक भगवान की तरह थे। वह अरसे से श्रद्धा पूर्वक उनकी तपस्या कर रहा था। उसे पक्का भरोसा था कि साहब उससे और उसकी अटूट लगन, निष्ठा और भक्ति से एक न एक दिन अवश्य प्रसन्न होंगे। और उसे उसका मनचाहा वरदान दे देंगे। इसीलिये तो, आज तक उसने जो कुछ भी किया है, वह अपने ईश्वर को खुश करने की गरज से ही किया है। आफिस में उनके लिए पर्दा उठाते, उनको पानी पिलाते, खाली टाइम में उनके सिर की चम्पी करते, कान से मैल निकालते, फाईलों को इस दफ्तर से उस दफ्तर ले जाते, उनकी गाड़ी को अपने गमछे से साफ़ करते और कोठी पर बिना कोई चूं-चपड़ किये फूलों में पानी डालते, मछलियों को दाना खिलाते, कुत्तों को टहलाते, सब्जी लाते, खाना बनाने में दुलारी का हाँथ बटाते और अन्दर बाहर की साफ़-सफाई करते हुए अपना मनचाहा बरदान पाने का उसका सपना दिन पर दिन जवान हो रहा था।
लेकिन इस समय वह अपने सपने और घर की चिंता के बीच एक अज़ीब सी उहापोह में फँसा डूब-उतरा रहा था। और जितना ही वह सोचता दुविधा के दलदल में और गहरे तक फंसता चला जाता। साँप छछून्दर की गति की तरह उसे न तो कोठी पर जाने का मन कर रहा था। और न ही थाने पर जा कर रिपोर्ट लिखवाने का। और घर? आखिर वह किस मुंह से घर लौट कर जाए? सुस्ता कर ठंडे दिमाग़ से सोचने के लिए वह किनारे की पुलिया पर बैठ गया। और बीड़ी सुलगा कर अपने आप से गुत्थम-गुत्था होने लगा।
सूरज दूर पेड़ों के पीछे जाकर छुपने की तैयारी कर रहा था। शाम का धुन्धलका आसमान से उतर कर धीरे-धीरे चारों तरफ अपने पैर फैला रहा था। ऊपर आसमान में चिड़ियों की टोलियाँ शोर मचाते हुए अपने-अपने घोंसलों की तरफ लौट रहीं थीं। आज़ाद परिंदों की यह चहचहाहट आज उसे कर्कश और चिढ़ाने वाली लग रही थी। जाँघ के पास उसे कुछ चलता हुआ महसूस हुआ। एक लाल चींटा वहाँ बेफिक्री से रेंग रहा था। उसने उंगलियों से उसे पकड़ा और मसल कर दूर फेंक दिया। अचानक ही एक काला कुत्ता उसके पास आकर दुम हिलाने लगा। और कोई दिन होता तो वह उसे पुचकारता। सहलाता। पर आज उसने उसे बुरी तरह से दुत्कार कर भगा दिया। कुत्ते ने भी शायद उसके चेहरे पर उठती-गिरती चिंता की लहरों को देखा। महसूस किया। और दुम हिलाते हुए खेतों की ओर चला गया। कुत्ते को देख कर उसे याद आया कि ऐसे ही कुछ आवारा कुत्तों के कारण उस दिन उसके पूरे शरीर में बारह-तेरह जगह टाँके लगे थे। और उसे पूरे दस दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था। और वह भी सिर्फ मेमसाहब और बिटिया के आंसुओं की वजह से।
अचानक ही वह पूरा वाकया उसकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह कौंध गया। रोज़ की तरह उस दिन शाम को जब वह कोठी पर पहुंचा, तो देखा कि वहां सबके चेहरे उदास, परेशान और लटके हुए हैं। थाना पुलिस की बातें हो रही हैं। साहब भी हैरान परशान हो कर इधर उधर फोन कर रहे हैं। पूछने पर पता चला कि साहब की नयी वाली बिलायती कुतिया “जूलिया” कहीं गुम हो गई है। या तो कोई उसे चुरा कर ले गया है या मौका पाकर गेट से निकल कर वह खुद ही कहीं भटक गयी है। और जब से वह गायब हुयी है तब से साहब की छोटी वाली बिटिया का रो-रो कर बुरा हाल है। और चूंकि बिटिया रो रही है, इसलिए मेमसाहब भी रो रही हैं। बस फिर क्या था? उनके आंसुओं को देख कर वह इतना द्रवित हो गया कि उसके अन्दर की सारी वफादारी अचानक ही जाग कर बाहर आ गयी। उसने साहब से कहा---“आप इन लोगों को सम्हालिए। और परेशान मत होइए। कुत्तों का सीजन चल रहा है। वह ज़रूर भटक कर कुत्तों के झुण्ड के साथ कहीं दूर निकल गयी होगी।”
साहब को उसकी इस नादानी भरी बात पर गुस्सा आ गया---“क्या बात करते हो? हम तो उसे हर बार सूई लगवाते हैं?” इस पर मेम साहब ने साहब को याद दिलाया कि इस बार तो अभी सूई लगी ही नहीं है।
फिर क्या था? उसके साथ रामसुमेर ड्राईवर और दुलारी “जूलिया को खोजने के अभियान में जुट गए। और जैसा कि उसका अंदाज़ा था, “जूलिया” पुलिया के नीचे मोहल्ले के पांच आवारा कुत्तों के बीच में फंसी हुयी थर-थर काँप रही थी। सीजन के कारण कुत्ते जोश में थे। और खूंखार हो रहे थे। रामसुमेर और दुलारी तो दूर खड़े सिर्फ हुल-हुल और हट-हट करते रहे। पर उसने न आव देखा न ताव। फटाक से कुत्तों के बीच घुस कर “जूलिया” को बचाने लगा। जोश से भरे हुए कुत्ते बिफर पड़े। और उन्होंने उस के ऊपर हमला बोल दिया। उसे जगह-जगह काटा। नोंचा। मांस निकाल दिया। पर बुरी तरह से घायल होने के बावजूद वह “जूलिया” को सही सलामत निकाल लाया। खून से लथफथ जब वह वापस कोठी पर पहुंचा, तो दर्द से बुरी तरह बिलबिला रहा था। पर साहब, मेम साहब और बिटिया रानी की आँखों से छलकने वाली शाबाशी और खुशी ने उसके सारे दर्द को फूंक कर एकदम से उड़ा दिया था। साहब ने अम्बुलेंस मंगवा कर उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाया था। और कृतज्ञता से उसका हाँथ पकड़ कर कहा था---“हम तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे।” और उसे पूरा विश्वास है कि वाकई साहब वह बात कभी भी नहीं भूलेंगे।
पुलिया से थोड़ा आगे चल कर सड़क दो रास्तों में बंटी हुई थी। बाँयी तरफ का रास्ता सीधे थाने की तरफ जाता था। रीना की चीखों के हिसाब से वह शांति की सकुशल वापसी और लुटी हुयी इज्जत और चेहरे पर पुती हुयी कालिख को साफ करने का सही रास्ता था। उसके सीने के घाव तभी भरेंगे जब शांति को घसीट कर घर लाया जायेगा। और बंटी को भर इच्छा मार-पीट कर जेल भेज दिया जायेगा। अब यह काम चाहे पुलिस करे या श्याम के आवारा-गुंडें दोस्त। रीना के लिए यह जीने-मरने की लड़ाई थी। जिसे वह हर हाल में जीतना चाहती थी। वह जीतेगी तभी जीएगी। नहीं तो हार और बदनामी का दंश लेकर वह अपनी कमज़ोर साँसों को ज्यादा दिनों तक नहीं खींच पायेगी।
दाहिनी तरफ का रास्ता खेतों और बगीचों के बीच से होकर कोठी की ओर जाता था। साहब की कोठी। जहाँ उसने अपने इकलौते सपने को अरसे से गिरवीं रख छोड़ा था। उसे पक्का विश्वास था कि इस बार वांट आते ही साहब श्याम को अपने दफ्तर में या कहीं और चपरासी की नौकरी ज़रूर दिलवा देंगे। और तब उस एक कृपा से उसका सब कुछ ठीक हो जायेगा। रीना का ईलाज़। शांति की शादी। घर की मरम्मत। उधार-कर्ज़ा। और छोटकू की पढ़ाई। पर लगता है कि शांति को उसके इस सपने पर कत्तई भरोसा नहीं था। तभी तो बंटी के साथ मिल कर उसने अपने लिए एक अलग से सपना बुन लिया था। उसे अपना सपना और अपना भविष्य परिवार के सपने और भविष्य से ज़्यादा ज़रूरी लगा था। तभी तो...। शांति की चिंता आकर उसे फिर से कचोटने लगी।
खेतों और बगीचों के पास से पुलिया के नीचे से होकर बहने वाला नाला गुज़रता था। उसने देखा कि वहाँ से रुक-रुक कर बीड़ी का धुआँ उठ रहा है। लोग-बाग रोज़ की तरह आज भी वहां दिशा-मैदान कर रहे थे। उसके जी में आया कि वह जोरों से चीखे। और एक पत्थर उठा कर उस तरफ उछाल दे। आज पता नहीं क्यों, उसे लोगों का इस तरह से खुले में बैठ कर निवृत होना बड़ा अजीब, घटिया और बुरा लग रहा था। उसे वाकई आज बहुत गुस्सा आ रहा था। हर एक के ऊपर। खुद अपने ऊपर भी। बैठे-बैठे वह अचानक ही बड़बड़ाने लगा...‘स्साला, कोल्हू का बैल बन गया हूँ...पूरे दिन ख़टता रहता हूँ...किसके लिए?...पर किसी को भी मेरी चिंता, मेरी परवाह नहीं है...जिसे देखो वही अपनी राह चल रहा है...लानत है, स्साली ऐसे ज़िंदगी पर!’ वह बुदबुदाया। और उदास हो गया। (क्रमशः)
---अरविन्द कुमार 

[यह कहानी "कथा क्रम" के "अप्रैल-जून 2015" अंक में प्रकाशित हुयी है]    


शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कहानी

उमस के बावजूद
पिछले कई दिनों से यूं ही पानी, धूप और उमस का कठिन और भरी क्रम चल रहा था. बाहर तेज बरसात हो रही थी. वे अपने कमरे के कोने में बिछी चारपाई पर लेटे हुए थे. चित. छत को निहारते हुए. चुपचाप. निस्पंद. लगभग मुर्दों की तरह. वह लगातार सिगरेट पी रहा था. और वह उसके धुएं में लिपटी किसी अंधेरे शून्य में तैर रही थी. उन दोनों के भीतर शायद एक भरी कोलाहल मचा हुआ था. वहॅां कोई बड़ी उथल-पुथल चल रही थी. वे चुप थे, पर अन्दर ही अन्दर अपनी-अपनी उलझनों को सुलझाने की पुरजोर कोशिश करते हुए अपने आप से जूझ रहे थे.
-----सो गए क्या?
-----नहीं तो.
-----क्या सोच रहे हो?
-----कुछ भी तो नहीं.
एक लम्बी साँस के साथ उसने ढेर सारा धुआं उगल दिया. सिगरेट की रख को काफी समय से झाड़ा नहीं गया था. इसलिए उस के अगले सिरे पर राख की एक लम्बी लड़ी बन गयी थी. उसको गिराने के लिए उसने सिगरेट को धीरे से दीवार से छुआया. रख चारपाई पर गिरी. और चादर पर बिखर गयी. इस समय चारपाई को दीवार से सटा कर रखा गया था. पांच सौ अस्सी रुपये महीने के किराये का उनका पूरा कमरा यानि कि मकन मालिक का बेकार पड़ा गैराज टप-टप कर चू रहा था. सिर्फ चारपाई और स्टोव के पास का हिस्सा ही सूखा और छूंछा बचा था. बरसात के हर क्रूर मौसम में ऐसा ही होता है.
-----बोलो ना, क्या सोच रहे हो? क्या बात है?
-----कुछ नहीं. कोई बात नहीं है.
-----काफी पपरेशान लग रहे हो. बोलो ना क्या बात है?
-----कुछ नहीं यार,...बोला ना!!
न चाहते हुए भी शब्दों के साथ आवाज़ की झुंझलाहट को वह रोक नहीं पाया. लेकिन अगले ही पल उसने अपने आप को सम्हाल लिया. उसको देख कर हलके से मुस्कराया. एक लम्बा कश लिया. सिगरेट को दीवार से रगड़ कर बुझाया. और बचे हुए टोटके को सहेज कर सिरहाने रख लिया. एक लम्बी सांस ली. और दीवार की तरफ मुंह करके लेट गया.
उसने उसके अन्दर उबलने वाली परेशानियों की गर्मी को महसूस किया. पर टोका-टोकी न करके वह भी अपने अन्दर उठ रहे अंधड़ों में फंसी-उलझी चुपचाप पड़ी रही. कुछ देर तक यूं ही प्रतीक्षा करने के बाद भी जब वह कुछ नहीं बोला तो उसने उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया. उसकी पीठ, जो उसे कभी काफी नर्म, मुलायम और एक खास तरह की खुशबू से भरी हुयी लगती थी, आज उसे खुरदुरी, बेजान और धुल-धूसरित सी प्रतीत हुई. ठीक पुरानी, सुस्त और थकी हु किसी वीरान सड़क की तरह. इधर वाकई कुछ दिनों से उसे लगने लगा है कि उसके बाल, उसका चेहरा, उसकी बातें, उसकी हरकतें और प्यार जताने का उसका तरीका भी अब पहले जैसा नहीं रहा. रंगहीन, बेजान और भावना विहीन हो गया है. उसकी आँखों के सुनहले डोरें भी अब गंदले और मटमैले हो गये हैं.
उधर उसे भी लगा कि उसका इस तरह पीठ पर उंगली फिरना अब पहले की तरह मादक नहीं रहा. उसका देखना, उसका छूना और बल खाती किसी नागिन की तरह उसका उससे लिपटना भी अब उसके अन्दर उतनी उत्तेजना नहीं भरता कि वह तड़प कर उसे बाँहों में भींच ले. चूमे उसे और बस चूमता ही चला जाये. कहाँ उड़ गयीं वे सारी भावनाएं? कहाँ गम हो गया वह प्यार का लहराता समुन्दर? क्यों सरे सपने इतनी ज़ल्दी रेतीले हो गए?
-----सुनो, अब उसने उसके कंधे पर हाथ रख.
-----ओफ्फो, बोलो क्या बात है?
-----सब्जी लाना भूल गए ना? बोलो, अब इस समय क्या बनाऊँगी?
-----कुछ भी बना लो...
-----सवेरे टिफिन में क्या लेकर जाओगे? वह उसके बालों में प्यार से उँगलियाँ फिरने लगी-----मैंने जाते समय तुमसे कहा भी था.
-----पैसे नहीं थे.
-----लेकिन सुबह तो तुम्हारी जेब में पचास रुपये थे. मैंने देखा था.
-----हाँ थे. पर वे तो सुबह थे.
-----और शाम को क्या हुए? तुमने फिर दोस्तों के साथ बैठ कर चाय पी ली होगी. कितनी बार कहा है कि इस तरह फिजूलखर्ची मत किया करो...एक-एक पैसे कीमती होते हैं.
-----सुनोगी भी या...उसका स्वर फिर रूखा हो गया-----पचास रुपये फोटोस्टेट और रजिस्ट्री में खर्च हो गए.
-----फोटोस्टेट? रजिस्ट्री? क्यों?...वह वाकई चौंक पडी.
-----बिमन दा का फोन आया था....वह पलटा-----उनके यहाँ कोई जगह आयी है. उसी के लिए अप्लाई किया है....यहाँ का अब कोई भरोसा नहीं. सुना है, अगले कुछ महीनों में छॅंटनी होने वाली है.
-----क्यों?
-----कंपनी घटे में चल रही है. खर्चों को कम करना चाहते हैं.
-----तुमने शर्मा जी से बात नहीं की?
-----की थी...पर वे भी क्या करेंगे?...खुद उनकी गर्दन पर भी तलवार लटकी हुयी है...खैर छोड़ो, आज का तुम्हारा दिन कैसा रहा?
-----आज मैं जल्दी घर आ गयी थी.
-----क्यों?
-----तबीयत ठीक नहीं थी. सुबह से ही उल्टियाँ हो रही थीं. बाद में चक्कर आने लगा. इसलिए आधे दिन की छुट्टी ले ली.
-----फिर तो सहगल आधे दिन की तनख्वाह ज़रूर काट लेगा?
-----वो तो कटेगा ही. पर मेरी हालत वाकई बहुत ख़राब थी.
-----अच्छा सुनो, उसे पता है तुम्हारे बारे में?
-----अभी तक तो नहीं. पर अगर इसी तरह रोज़-रोज़ तबीयत ख़राब होती रही, तो उसको ज़रूर शक हो जायेगा...वैसे भी, कुछ दिनों बाद तो सब को पता लग ही जायेगा.
-----तब?
-----सहगल फ़ौरन नौकरी से निकल देगा...आगे तो खैर मैं खुद ही इस लायक नहीं रहूँगी कि दिन भर ख़ सकूं.
उसने एक गहरी सांस ली. और पहले की बची हुयी सिगरेट को निकल कर सुलगाने लगा. माचिस की डिबिया सीलन के कारण नर्म पड़ गयी थी. लिहाज़ा कई तीलियाँ टूट कर बेकार हो गयीं. आखिर में एक तीली गर्म सांसों से काफी सेंकने के बाद जाकर जली. कमरे में भक्क से उजास भर गया. पर फ़ौरन ही अंधेरे ने झपट कर उसे अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया. देखते ही देखते कमरे में अंधेरा और खामोशी छ गयी. वह चुपचाप सिगरेट पीने लगा. और वह फिर से अपनी अंधेरी गहरी सुरंग में उतरने लगी.
समय धीरे-धीरे दबे पांव सरकने लगा. रात गहरी और भरी होने लगी. बहर पानी का बरसना बंद हो गया था. और इसलिए अब फ़िर से पूरे कमरे में उमस पसर गयी थी. पसीने ने दोनों को तरबतर कर दिया था. सन्नाटा कोने में छिपे झींगुरों की तरह उनके भीतर भी ांय-चाय कर रहा था. दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक एक अजीब सी डरावनी आवाज़ पैदा कर रही थी. और वे बे हरकत अपने-आप से जूझते-निपटते चुप-चाप पड़े हुए थे.
काफी देर तक यूं ही निश्चल पड़े रहने के बाद उसने अपनी आँखें खोलीं. और उसकी तरफ ध्यान से देखा. लेकिन वह दूसरी तरफ मुंह करके लेटी हुयी थी.
-----सो गयी क्या, सुमि?
उसने उसे धीरे से छुआ. और अपनी तरफ घुमाने की कोशिश की. पर वह घूमी नहीं. उसने थोड़ी ताकत लगाकर उसे अपनी तरफ घुमाया. वह घूम तो गयी, पर आँखें बंद किये हुए चुप-चाप पडी रही.
-----सुमि, सुनो...सुमि? उसने उसके कंधे पर प्यार से अपना हाँथ रखा.
-----क्या है?...उसने आँखें खोल कर उसकी आँखों में पनपने वाले भाव को पकड़ना चाहा. पर वहां अपेक्षा से भिन्न कुछ और था. पर क्या? वह समझ नहीं पाई.
-----मैं सोच रहा हूँ कि...उसकी आवाज़ थरथराने लगी. और वह हकलाने-सा लगा-----कल तुम मेरे साथ डाक्टर सहनी की क्लिनिक पर चलना...उसने उसके बाजू को प्यार से पकड़ लिया. और कांपती हुयी आवाज़ में एक-एक शब्द तौलते हुए बुदबुदाने लगा-----सुमि, हमें अभी बच्चा नहीं चाहिए.
-----क्या? वह लगभग चीख पडी.
-----देखो सुमि,...मुझे समझने की कोशिश करो....हमारी ये हालत...तुम देख ही रही हो...वह फूल मुरझा जायेगा...तुम्हें पता है ना? अभी हम अपने चुने हुए रस्ते को ठीक से बना भी नहीं पाए हैं...और अभी से उस पर इस तरह चलना...अभी काफी वक्त लगेगा...कोई नहीं है साथ देने वाला...ना आगे ना पीछे....तुम्हें तो पता ही है कि घर वाले अभी तक जान के पीछे पड़े हुए हैं...पता नहीं कब और किस मोड़ पर ज़िंदगी हमसे रूठ जाये और अपने हाँथ खड़े कर ले...सोचो, कहीं वह मासूम हमारी बेड़ियाँ ना ब जाये...क्या-क्या सोचा था...कितने सपने देखे थे...पर प्यार और हकीकत में तना फर्क होगा...सपने में भी नहीं सोचा था...सुमि, मैं कतरा-कतरा जल रहा हूँ...अचानक ही वह कातर हो उठा. दयनीय. निरीह.
-----मैं भी तो झुलस रही हूँ...पर खुश हूँ कि तुम्हारे साथ हूँ. यही तो हम चाहते थे.
-----इसीलिये तो कहता हूँ कि...कल चल कर बच्चा गिरवा देंगे...इसी में भलाई है...
उसका कलेजा काँप उठा. पर वह चुपचाप पड़ी रही. जमी हुयी. मानों बर्फ की सिल्ली पर लेटी हुयी हो. स्थिर. शब्द-शून्य. मातृत्व के सरे सपने, सारी मधुर कामनाएं उसके आगे राख बन कर उड़ने लगीं. उसने अपने भीतर से फूट कर बहर बहने को तैयार आंसुओं को जबरन अन्दर ही रोक लिया. उसकी गले की नसें फूल कर मोटी हो गयीं.
-----ठीक है ना, सुमि?...मैं ठीक कह रहा हूँ ना?
-----पर...उसने अपने को संयत किया-----इसमें दो-तीन हज़ार रुपये लगेंगे....मैंने पता किया था...ऊपर से दवाइयों का खर्चा अलग...
-----तो फिर देसी तरीके से...गाँव में तो दाईयाँ...
-----पागल हो...उसमें काफी रिस्क होता है...जान का खतरा...चार महीने का है...
-----तो फिर...डाक्टर सहनी के यहाँ ही चलना...मैं शर्मा जी से उधर ले लूँगा.
-----उधार...उधार...उधार!!...आखिर हम कब तक उधर ले-लेकर कम चलते रहेंगे? अभी तो हमने अपनी ज़िंदगी शुरू की है...और अभी से क़र्ज़ का बोझ?...और फिर हम इतना उधर चुकायेंगे कैसे?...क्या उसके लिए फिर क़र्ज़ लेंगे?...हमें अपनी ज़िंदगी को संवारना है...उजाड़ना नहीं...अगर हम इसी तरह हताश और निराश होते रहे, तो कुछ दिनों बाद हमें भी लगने लगेगा कि इस तरह घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करने का हमारा फैसला गलत था...अगर हम हर जायेंगे तो उनकी जीत हो जायेगी...
-----देखो सुमि, मैं भी हारना नहीं, लड़ना चाहता हूँ...जीतना चाहता हूँ...पर इस समय भावनाओं में बहने का समय नहीं है...हमें अभी एक व्यावहारिक और सही निर्णय लेना होगा.
-----तभी तो मैं कह रही हूँ...मैं एबर्शन हरगिज नहीं करवऊंगी...मैंने यह अच्छी तरह से सोच लिया है...यह हमारे प्यार...हमारे अपने निर्णय...हमारे सपनो की दुनिया की ओर बढ़ने वाल पहले कदम की पहली निशानी है...मैं इसको कभी नष्ट नहीं करूंगी...चाहे कुछ भी हो जाये...जब तक सहगल को पता नहीं चल जाता और वह मुझको नौकरी से निकल नहीं देता, मैं उसके यहाँ काम करती रहूँगी...फिर घर पर बैठ कर लोगों के कपड़े सिलूँगी...स्वेटर बुनूँगी...छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाऊँगी...मैंने इस सिलसिले में मोहल्ले के दो-चार लोगों से बात भी कर ली है...लडूंगी अंतिम समय तक...पर हर नहीं मानूँगी...सब ठीक हो जायेगा. रास्ता हरने से नहीं लड़ने से निकलता है.
बोलते-बोलते वह उठ कर बैठ गयी. उसका चेहरा लाल सुर्ख हो गया था. और आँखें बड़ी, गोल और चमकदार. घुप्प अंधेरे के बावजूद वह इस समय दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत लग रही थी. 
---अरविन्द कुमार
(यह कहानी "परिकथा" के "जुलाई-अगस्त" अंक में प्रकाशित हुआ है)