शनिवार, 31 मार्च 2018

व्यंग्य


दो गधों की सैर वार्ता
वे दो गधे थे और दोनों अब जान-पहचान से आगे बढ़ कर अच्छे दोस्त बन चुके थे दोनों दिन भर लादी लादते अपने-अपने मालिक की चाकरी करते और शाम को थोड़ा आराम करने के बाद जब उनके मालिक उन्हें घास चरने के लिए खुला छोड़ देते, तो वे अपने अपने जंजालों से पिंड छुड़ा कर घास भरे मैदानों की ओर सरपट भाग निकलते इस तरह उनकी चराई भी हो जाती सैर भी और कुछ देर आपस में बात-चीत कर लेने से उनका मन हल्का भी हो जाता था आज भी जब वे रोज़ की तरह मिले, तो रोज़ की औपचारिक की हाय-हैलो के बाद पहले वाले ने दूसरे से पूछा---“कैसे हो यार?”
---“ठीक ही हूँ” दूसरे ने रोज़ की तरह मुंह लटका कर जवाब दिया
---“इसका मतलब है कि तुम अभी भी दुखी चल रहे हो?”
---“हाँ यार, क्या बताऊं? सब कुछ कर के देख लिया, पर मेरी ज़िंदगी में कोई बदलाव आ ही नहीं रहा इस बीच ससुरे कितने घूरों के दिन बहुर गए, पर मेरी ज़िंदगी तो वैसी की वैसी ही है, बल्कि दिन पर दिन और खराब होती जा रही है
---“तो भाग क्यों नहीं जाते? बहुत मालिक मिल जायेंगे वैसे भी, आज कल मार्किट में गधों की कमी चल रही है मालिकों की नहीं
---“यार, भाग तो जाऊं पर...अच्छा यह बताओ कि यह दुनिया किस चीज़ पर टिकी हुयी है?”
पहले वाला चौंका---“क्या मतलब?”
---“बताओ न, यह दुनिया किस चीज़ पर टिकी हुयी है?”
---“पता नहीं यार, पर इस मसले को लेकर बड़ा कन्फ्यूजन है कोई कहता है कि दुनिया गाय की सींग पर टिकी हुयी है कोई कहता है कि कछुए की पीठ पर कोई कहता है कि दुनिया शेषनाग के फन पर टिकी हुयी है और कुछ वैज्ञानिक टाईप के लोग कहते हैं कि दुनिया गुरुत्वाकर्षण के बल पर टिकी हुयी है
---“यह तो बड़ी-बड़ी किताबी बातें हैं...पर मेरा व्यवहारिक ज्ञान तो यह कहता है कि यह दुनिया केवल और केवल उम्मीद पर टिकी हुयी है और यह दुनिया ही क्यों? हर जीती-जागती चीज़ उम्मीद पर ही टिकी हुयी है मैं भी टिका हुआ हूँ और सच-सच बताना, तुम भी तो किसी न किसी उम्मीद पर ही टिके हुए हो? इतना सब कुछ सहने के बावजूद
---“हाँ यार, बात तो तुम पते की कह रहे हो़। अगर उम्मीद न होती, तो एडिसन बल्ब जलाने के काम में यूं जी-जानसे नहीं जुटता उम्मीद न होती, तो कोलंबस अमेरिका की खोज नहीं करता दुनिया मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश में इस तरह दर-दर नहीं भटकती उम्मीद है, तो दुनिया है उम्मीद है, तो ज़िंदगी है उम्मीद नहीं, तो कुछ भी नहीं सब गुड़ गोबर लोग तो उम्मीद टूट जाने के बाद कभी कभी इतने निराश हो जाते हैं कि आत्महत्या तक कर लेते हैं
---“वे कायर होते है...इसीलिये तो मैं जान-बूझ कर इस मालिक की नौकरी नहीं छोड़ रहा क्योंकि मान लो मैंने मालिक बदल दिया, तो इस बात की क्या गारंटी कि वह इस वाले मालिक से अच्छा ही होगा न मारेगा, न पीटेगा, न ज्यादा लादी लादेगा और भर पेट खाना भी देगा देखो न, लोगबाग़ कितनी उम्मीदों से सरकार बदलते हैं बड़ी बड़ी उम्मीदें लगा कर नयी सरकार का बाहें फैला कर स्वागत करते हैं पर अगर वही नयी सरकार भी जब पुरानी वाली की तरह या उससे भी ज्यादा ख़राब साबित होने लगती है, तो कितना कष्ट होता है फिर अगले पांच सालों तक रोने और आसूं पीने के अलावा कोई कुछ नहीं कर सकता
---“हाँ यार, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो अपने अच्छे समय, अच्छे दिनों और दिन बहुरने की उम्मीद में लोग बाग़ कड़ुई से कड़ुई दवाइयां भी खा लेते है पर जब वह उम्मीदें पूरी नहीं होती हैं, तो दिल टूटा जाता है जैसे कि उस बन्दे का टूट गया था
---“किस बन्दे का?’’
---“अरे उसी बन्दे का, जिसने ईनाम की उम्मीद में जाड़े की पूरी रात ठन्डे पानी में नंगे बदन खड़े हो कर गुज़ार दिया था पर हुआ क्या? बाद में बादशाह सलामत ने उसे बेवक़ूफ़ तो बना ही दिया
---“अच्छा वो? लेकिन यार, बीरबल ने तो बाद में अपनी खिचड़ी वाले प्रयोग से बादशाह की आँखें खोल दी थीं और तब बादशाह सलामत ने माफी मंगाते हुए उस बन्दे को घोषित किया हुआ ईनाम दे दिया था
---“पर आज कल बीरबल जैसे लोग कहाँ हैं? आज कल तो हर तरफ अंध भक्त, प्रवक्ता और प्रचारक भरे पड़े है आजकल तर्कों से नहीं, कुतर्कों से आम जनता को समझाया जा रहा है
---“हैं यार, तर्क वाले लोग भी हैं पर अभी वे सब नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बने हुए हैं?”
---“खैर छोड़ो तुमने क्या सोचा है? ऐसे ही चुपचाप मालिक के लात-डंडे खा कर दिन रात रोते रहोगे या कि ज़िंदगी बदलने के लिए कुछ करोगे भी?”
---“करूंगा पर अभी नहीं मैं अभी कुछ दिनों तक और इंतज़ार करूंगा
---“किस चीज़ का? क्या तुमको अभी भी उम्मीद है कि तुम्हारा मालिक कुछ दिनों बाद बदल जायेगा?”
---“नहीं यार, यह बात नहीं है मैंने तुमको बताया था न? अपनी उस उम्मीद के बारे में
---“क्या बताया था?”
---“भूल गए? मैंने बताया था न कि मेरा मालिक जब भी अपनी बेटी से नाराज़ होता है, तो उसको मारते-पीटते हुए हमेशा धमकाता है कि अगर वह नहीं सुधरी, तो वह उसकी शादी किसी गधे से कर देगा और मुझे उम्मीद है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो एक न एक दिन मैं उस घर का दामाद ज़रूर बन जाऊँगा खैर मेरी छोड़ो, अपनी सुनाओ
---“मैं तो सोच रहा हूँ कि घोड़ा बन जाऊं
---“घोड़ा? पर वह कैसे?”
---“सुना है कि सरकार बाहर से कोई ऐसी टेक्नालौजी इम्पोर्ट कर रही है कि जिससे गधों को खच्चर बनाये बगैर सीधे घोड़ा बनाया जा सकता है मैं तो भगवान से रोज़ प्रार्थना कर रहा हूँ कि जल्दी से वह टेकनालौजी आये और मुझे इस नरक से छुटकारा मिले
---“अरे वाह! यह तो बड़ा अच्छा है चलो, फिर मैं भी कुछ दिन और इंतज़ार करता हूँ और अगर इस बीच मालिक ने अपनी कथनी को करनी में नहीं बदला, तो फिर मैं भी तुम्हारे साथ चल कर घोड़ा बन जाऊंगा   
@अरविन्द कुमार 
मेरा यह व्यंग्य सुशील सिद्धार्थ के सम्पादन में प्रकाशित "व्यंग्य बत्तीसी" में संकलित है)                    

शनिवार, 18 जुलाई 2015

कहानी

प्यार, पुलिया और प्रमोशन (समापन किश्त)
आज शाम को जब वह रोज़ की तरह आफ़िस से थक-हार कर घर पहुँचा, तो देखा कि वहां मुहल्ले वालों का मजमा लगा हुआ है। और रीना ने रो-रो कर पूरे घर को ही नहीं अड़ोस-पड़ोस को भी अपने सिर पर उठा रखा है। उसे देखते ही वह बिफर पड़ी---“देखा, तुम्हारी छूट का नतीज़ा।...कलमुंही चेहरे पर कालिख पोत कर भाग गयी।...उसी रामसुमेरवा के लौंडे के साथ।...बड़ी गर्मी सवार हो गयी थी।...मैं बार-बार कहती थी कि जल्दी से उसके हाँथ पीले कर दो।...लौंडिया के लक्षण ठीक नहीं हैं।...ज़रूर कोई गुल खिलाएगी।...पर तुमने मेरी एक न सुनी।...अब झेलो बदनामी।...नाते-रिश्तेदार और बिरादरी वाले सब तुम्हारे मुँह पर थूक रहे हैं।...अरे खड़े-खड़े मुँह क्या देख रहे हो।...फ़ौरन थाने जाकर रपट लिखाओ।...अबहीं जादे दूर नहीं गये होंगे।...हरामी सब।

चीख-चीख कर वह अचानक ही ज़ोर-ज़ोर से छाती पीटने लगी। और देखते ही देखते एक कटे हुए पेड़ की तरह धड़ाम से गश खाकर गिर पड़ी। छोटकू अम्मा-अम्मा कह कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा---“तब से ऐसे ही कर रही है। बाबूजी कुछ कीजिए।”...किसी तरह पानी के छींटे मार-मार कर वह रीना को होश में लाया। और चारपाई पर लिटा कर पंखा झलने लगा। चूल्‍हे में पड़ी दोपहर की अधजली लकड़ियाँ राख में मुंह छुपा कर सुस्त पडी थीं। और रात की बुझी हुयी कालिख पुती लालटेन कोने में सहमी सिसक रही थी। और पूरे घर में मातम छाया हुआ था। श्याम अपने आवारा, बेरोज़गार और गुंडा दोस्तों के साथ बंटी की तलाश में ज़मीन-आसमान एक कर रहा था। उसने रीना को समझाया। सांत्वना दी। पानी में नींबू-नमक और चीनी घोल कर पिलाया। मुहल्ले वालों को हाँथ जोड़ कर अपने-अपने घर जाने का आग्रह किया। और छोटकू को माँ की देखभाल करते रहने की हिदायत देकर तीर की तरह घर से बाहर निकल गया। बाहर तो वैसे वह हर शाम को निकलता है। पर थोड़ा सुस्ता कर चाय पीने के बाद। नाश्ता-पानी उसे साहब की कोठी पर मिल जाता है। और देर हो जाने पर कभी-कभार खाना भी।
      घर से निकला तो वह थाने के लिए ही था। पर कुछ कदम चलने के बाद से ही उसका इरादा हिचकोले खाने लगा।...‘थाने वाले क्या करेंगे? क्या मेरी या मोहल्ले वालों की बात मान कर फ़ौरन रिपोर्ट लिख लेंगे?...और रिपोर्ट लिख भी लेंगे तो क्या वाकई कोई कारगर कार्यवाही करेंगे?...पता नहीं, वह घाघ दरोगा अबकी बार कितने रुपयों की माँग करे?...लेकिन रिपोर्ट में मैं लिखवाऊंगा क्या?'
      उसे याद आया कि इससे पहले भी श्याम के केस में उसे थाने के कई चक्कर लगाने पड़े थे। हज़ारों रुपये यूँ ही पानी की तरह बह गये थे। उस समय भी शर्म और संकोच से उसने साहब को बीच में नहीं डाला था। डालता भी कैसे? सच्चाई जानने के बाद क्या वे वाकई श्याम को बचाते? और अगर बचा भी लेते तो क्या मौका आने पर उसके ज़ुआरी बेटे की नौकरी के लिए अपनी सिफारिश करते? श्याम मोंटू के साथ ज़ुआ खेलते हुए पकड़ा गया था। ‘मोंटू स्साला!’ वह बुदबुदाया और उसकी मुट्ठियाँ कस गयीं।  
      अचानक ही उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगा...‘श्याम पर शुरू से ही पाबंदी क्यों नहीं लगाई?...उसे आवारा दोस्तों की सोहबत छोड़ने के लिए कभी डांटा-फटकारा मारा-पीटा क्यों नहीं?...शांति पर भी इतना भरोसा क्यों किया?...उस पर भी कभी कोई लगाम क्यों नहीं कसी?...उसके बदले-बदले हाव-भाव और आज़ाद हो कर उड़ने के लिए बेताब निकलते हुए परों को देख कर भी उसने अनदेखा क्यों किया?...उस दिन...ठीक उसी दिन शांति का गला क्यों नहीं काट दिया, जब उसकी खिलखिलाहट पिछवाड़े के अंधेरे खंड से निकल कर पहली बार उसके कानों को चीरती हुई चली गयी थी?
गोधुली बेला थी। वह अभी-अभी आफ़िस से लौटा था। बेटी की खनखनाती हँसी ने उसे चौंकाया ही नहीं स्तब्ध भी कर दिया था। उसे जोरों का करेंट लगा था। और यकायक ही अनेकों नागफनियाँ उसके शरीर से लिपट गयी थीं। एक चंचल हिरनी की तरह हँसती-कुलांचे मारती हुयी वह जब घर में घुसी, तो वह लगभग चीख पड़ा था---“खंड में कौन था तेरे साथ?...और वहाँ अंधेरे में क्या कर रही थी? पर तभी उसकी निगाह उसकी मुट्ठी में छिपे मोबाईल फोन पर पड़ी---“यह कहाँ से आया तेरे पास?
           पर न तो वह डरी थी। न ही घबराई। उसने बड़ी निश्च्छलता से जवाब दिया था---“बंटी का है, बाबूजी। उसने रखने के लिए दिया है। कल ले जाएगा।” उसने पूछना चाहा कि वह यहाँ क्यों आया था? और उसने यह तुझे ही क्यों दिया है? पर जवान-सियान बेटी की मासूमियत से इस तरह थुक्कम-फ़ज़ीहत करना उसे मुनासिब नहीं लगा था। ‘जवान लड़की है। दिन भर घर बाहर का काम करती है। हो गयी होगी बंटी से जान-पहचान। दोस्ती। इसमें बुराई क्या है?’ रीना के लाख उकसाने के बावज़ूद उसने अपनी आँखों को बंद करके ज़ुबान को तालू से चिपका लिया था। 
      शांति इसी तरह बेहिचक अंधेरे खंड में आती-जाती रही। बंटी शाम सवेरे घर के चक्कर काटता रहा। रीना अक्सर बड़बड़ाती और उलाहने देती रही। पर शांति की तरफ से वह हमेशा निश्चिंत बना रहा। न तो कभी बंटी को टोका-टाका और न धमकाया। और न ही कभी रामसुमेर ड्राईवर के पास जाकर उसकी कोई शिकायत की। और अगर शिकायत करता भी, तो किस बात की करता? अगर कहीं वह पलट कर यह कह देता कि मेरे लौंडे की शिकायत करने के बजाय, तू अपनी लौंडिया को काबू में रख। तब? अब थाने जाकर वह किसकी और किस बात की रिपोर्ट लिखवाएगा? बहला-फुसला कर शांति को भगाने की रिपोर्ट? या जबरन अगवा कर के फिरौती माँगने की?...शांति को अपनी मर्ज़ी से, अपनी पसंद के लड़के से शादी करनी थी, तो कर लेती।...लेकिन कम से कम उसे बता तो देती।...लेकिन अगर वह बता भी देती तो क्या वह गैर बिरादरी और वो भी एक छोटी जाति के बंटी के साथ खुशी-खुशी उसका लगन करने के लिए तैयार हो जाता?...और अगर वह तैयार हो भी जाता, तो क्या रीना, श्याम और सारे नाते-रिश्तेदार भी तैयार हो जाते? बिरादरी तैयार होती?...न होते ससुरे! लेकिन बेटी तो खुश रहती। उसका घर तो अच्छे से बस जाता।...अब तो न माया मिली, न राम। 
      शान्ति गयी तो गयी, पूरे परिवार की इज़्ज़त भी मिट्टी में मिल गयी।...लेकिन वह इस बात की रिपोर्ट लिखवाएगा कैसे?...जाति-बिरादरी के नाम पर तो साहब भी उखड़ जायेंगे। कहीं उन्होंने इसी बात को इशू बना लिया तो?...तब तो उसके सारे किए धरे पर पानी फिर जायेगा। उसने सोचा---‘शांति तो अपनी मर्ज़ी से गयी है।...कोई दूध पीती बच्ची तो है नहीं।...अपना भला बुरा सब सोच-समझ कर ही तो घर से निकली होगी।...बंटी भी बालिग है।...क्या पता दोनों की निभ ही जाए।...और उनका घर वाकई अच्छे से बस जाए।...ऐसे में थाना और कचहरी के चक्कर कटवा कर उनकी छीछालेदर करवाने से फ़ायदा?...अगर उनकी अच्छे से निभ गयी, तो ठीक। और नहीं निभी, तो खुद ही कहीं कुंए में जाकर डूब मरेगी।...या फिर पछतावे के आसूं बहाते हुए वापस आ जायेगी। तब की तब देखी जायेगी।...रीना को वह सम्हाल लेगा। श्याम को भी समझा-बुझा कर शांत कर देगा।...आन-बान और शान की लड़ाई का खेल तो बड़े लोग खेलते हैं। हम गरीबों की तो सारी लड़ाई वजूद की लड़ाई होती है।...पर वह सिर्फ बुरा और अनिष्ट के बारे में ही क्यों सोच रहा है?...सब कुछ ठीक-ठाक और अच्छा भी तो हो सकता है।...क्यों न हम सब मिल-मिलाकर इसे एक अच्छा और मजबूत रिश्ता बना दें?...क्यों न साहब को बीच में डाल कर शान्ति और बंटी के इस कदम को प्यार का एक खूबसूरत रूप दे दें?’ 
      उसने अपने आप को समझाया। तैयार किया। और अचानक ही वह अपने आप को हल्का महसूस करने लगा। उसने तसल्ली भरी एक लंबी सांस ली। उठा। और तेज़-तेज़ कदमों से कोठी की तरफ़ चल पड़ा। कोठी में घुसते ही उसने देखा कि मेमसाहब तालाब की मछलियों को दाना डाल रही हैं। उसे देखते ही वे चिल्लाईं---“यह तुम्हारे आने का टाइम है? देखो तो ज़रा, क्या टाईम हो रहा है? देख रही हूँ कि अब तुम्हारे ऊपर भी चर्बी चढ़ने लगी है। काम नहीं करना है, तो साफ़-साफ़ बोल दो। साहब किसी और को बुला लेंगे। तुम क्या समझते हो? अगर तुम नहीं आओगे, तो मेरा काम ही नहीं होगा। आज दुलारी और रामसुमेर ने तुम्हारा सारा काम सुलटा दिया है। अब तुम गाड़ियों को साफ़ करो। फूलों को पानी दो। और किचेन में जाकर दुलारी की हेल्प करो।”  
      इससे पहले कि वह कुछ बोले या देर से आने के लिए माफी मांगे, शाम की सैर के लिए निकल रहे साहब की निगाह उस पर पड़ गयी---“अरे आओ भाई, आओ। मैं तो तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।...अरे सुनती हो, पहले इसका मुंह मीठा कराओ। इसका प्रमोशन हो गया है। अब यह हमारे आफिस का बाबू बन गया है। बाबू। अभी अभी शाम को आर्डर आया है। बधाई हो...मैडम, इसका मुंह तो मीठा कराओ।”  
      इसके बाद साहब ने और क्या क्या कहा? मेम साहब ने क्या कहा? रामसुमेर ने उसके पास आकर क्या कुछ कहने की कोशिश की। और दुलारी ने हंस कर उससे क्या कहा? उसे कुछ भी सुनायी नहीं पड़ा। वह बस चुपचाप किंकर्तव्यविमूढ़ सा हो कर साहब का मुंह देखता रहा। उसकी समझ में यह बिलकुल नहीं आ रहा था कि वह साहब से क्या कहे? मुस्कुरा कर उनको धन्यवाद दे, हंस कर खुशी ज़ाहिर करे या फिर फूट-फूट कर रोने लगे। (समाप्त)   
---अरविन्द कुमार  
[यह कहानी "कथा क्रम" के "अप्रैल-जून 2015" के अंक में प्रकाशित हुआ है]    

         
 

रविवार, 12 जुलाई 2015

कहानी

प्यार, पुलिया और प्रमोशन (भाग-एक)

वह तेज़ कदमों से भाग रहा था। भागते-भागते कभी वह रुकता। पीछे मुड़ कर देखता। कुछ सोचता। और फिर भागने लगता। कभी तेज़। कभी धीरे। कभी बहुत धीरे। और फिर अचनाक ही बहुत तेज़। इसी तरह भागते, रूकते, पीछे मुड़ कर देखते, सोचते और फिर भागते हुए वह अब मुख्य सड़क पर आ गया था। सड़क पर रोज़ की तरह चल-पहल थी। शोर था। भीड़ थी। तेज़ कारें। मोटर साइकिल। स्कूटर। रिक्शे। और पैदल। एक दूसरे से बेख़बर। अपनी अपनी धुन में मगन। सभी हमेशा की तरह अपने-अपने गंतव्य की ओर भाग रहे थे। वह भी उस भागती हुयी भीड़ में शामिल हो गया।
उसके दिमाग में इस समय भारी उथल-पुथल मची हुयी थी। बहुत सारी बातें। ढेरों सवाल। सवालों के धूल भरे बवंडर उसे बुरी तरह से मथ रहे थे। उसे एक-एक कदम उठाना भारी, बहुत मुश्किल पड़ रहा था। चलते चलते उसने सिर उठा कर आसमान की तरफ देखा। ‘उफ़, काफी देर हो गयी है।’ वह बुदबुदाया—‘आज तो मेम साहब चिल्ला चिल्ला कर जान ले लेंगी। और गुस्से में न तो चाय देंगी और न ही नाश्ता। पूरा पेर कर रख देंगी।’ अचानक ही साहब की कोठी एक अजगर के रूप में तब्दील हो गयी। और मुंह फाड़कर उसे अपनी ओर खींचने लगी। उसने बड़ी मुश्किल से अपने कदमों को ज़मीन पर जमाया। और मजबूती से खड़ा हो गया। इस समय वह अपने आप को बहुत ही थका, कमज़ोर और शिथिल महसूस कर रहा था। बूढ़ा। बेबस। और बेजान।
उसे अचानक खाट पर पड़ी बीमार रीना की याद आ गयी। उसे चिंता हुयी। और वह परेशान हो गया। रीना की याद आते ही शांति का ख्याल भी आकर उसे बुरी तरह से कोंचने लगा--‘पता नहीं, इस समय वह कैसी और किस हाल में होगी? कहीं नादानी में किसी हादसे का शिकार न हो जाये...आजकल किसी का क्या भरोसा?’ उसने सोचा। दोस्तों के साथ मिलकर सामूहिक बलात्कार करने या दलालों द्वारा मासूम लड़कियों को बहला-फुसला कर बाज़ार में ले जा कर बेचने की ढेरों खबरें अचानक ही उसके दिमाग़ में कौंध गयीं। वह अंदर तक काँप उठा। और उसके कदम थरथराने लगे।
‘तो क्या पहले थाने चला जाये? कुछ लोगों को जुटा कर रिपोर्ट लिखवाई जाये या साहब को बीच में डाल कर पूरे मामले को शांति पूर्वक सुलझा लिया जाये।...पर अगर साहब ने बीच में पड़ने से मना कर दिया तो?...कहीं ऐसा न हो कि शांति के चक्कर में श्याम वाला काम भी ख़राब हो जाये?...तो क्या वह सब कुछ यूं ही भूल जाये? रीना के दर्द भरे आँसू। बंटी की छोटी जाति। शांति द्वारा मुंह पर पोती गयी कालिख। बिरादरी और इलाके में हुई परिवार की बेइज़्ज़ती।...क्या वह इन सब पर मिट्टी डाल दे? और इसे नियति का खेल मानकर चुप-चाप बैठ जाये? रोज की तरह कोठी पर जाये? मन लगा कर अपनी ड्यूटी बज़ाये?
साहब उसके लिए एक भगवान की तरह थे। वह अरसे से श्रद्धा पूर्वक उनकी तपस्या कर रहा था। उसे पक्का भरोसा था कि साहब उससे और उसकी अटूट लगन, निष्ठा और भक्ति से एक न एक दिन अवश्य प्रसन्न होंगे। और उसे उसका मनचाहा वरदान दे देंगे। इसीलिये तो, आज तक उसने जो कुछ भी किया है, वह अपने ईश्वर को खुश करने की गरज से ही किया है। आफिस में उनके लिए पर्दा उठाते, उनको पानी पिलाते, खाली टाइम में उनके सिर की चम्पी करते, कान से मैल निकालते, फाईलों को इस दफ्तर से उस दफ्तर ले जाते, उनकी गाड़ी को अपने गमछे से साफ़ करते और कोठी पर बिना कोई चूं-चपड़ किये फूलों में पानी डालते, मछलियों को दाना खिलाते, कुत्तों को टहलाते, सब्जी लाते, खाना बनाने में दुलारी का हाँथ बटाते और अन्दर बाहर की साफ़-सफाई करते हुए अपना मनचाहा बरदान पाने का उसका सपना दिन पर दिन जवान हो रहा था।
लेकिन इस समय वह अपने सपने और घर की चिंता के बीच एक अज़ीब सी उहापोह में फँसा डूब-उतरा रहा था। और जितना ही वह सोचता दुविधा के दलदल में और गहरे तक फंसता चला जाता। साँप छछून्दर की गति की तरह उसे न तो कोठी पर जाने का मन कर रहा था। और न ही थाने पर जा कर रिपोर्ट लिखवाने का। और घर? आखिर वह किस मुंह से घर लौट कर जाए? सुस्ता कर ठंडे दिमाग़ से सोचने के लिए वह किनारे की पुलिया पर बैठ गया। और बीड़ी सुलगा कर अपने आप से गुत्थम-गुत्था होने लगा।
सूरज दूर पेड़ों के पीछे जाकर छुपने की तैयारी कर रहा था। शाम का धुन्धलका आसमान से उतर कर धीरे-धीरे चारों तरफ अपने पैर फैला रहा था। ऊपर आसमान में चिड़ियों की टोलियाँ शोर मचाते हुए अपने-अपने घोंसलों की तरफ लौट रहीं थीं। आज़ाद परिंदों की यह चहचहाहट आज उसे कर्कश और चिढ़ाने वाली लग रही थी। जाँघ के पास उसे कुछ चलता हुआ महसूस हुआ। एक लाल चींटा वहाँ बेफिक्री से रेंग रहा था। उसने उंगलियों से उसे पकड़ा और मसल कर दूर फेंक दिया। अचानक ही एक काला कुत्ता उसके पास आकर दुम हिलाने लगा। और कोई दिन होता तो वह उसे पुचकारता। सहलाता। पर आज उसने उसे बुरी तरह से दुत्कार कर भगा दिया। कुत्ते ने भी शायद उसके चेहरे पर उठती-गिरती चिंता की लहरों को देखा। महसूस किया। और दुम हिलाते हुए खेतों की ओर चला गया। कुत्ते को देख कर उसे याद आया कि ऐसे ही कुछ आवारा कुत्तों के कारण उस दिन उसके पूरे शरीर में बारह-तेरह जगह टाँके लगे थे। और उसे पूरे दस दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था। और वह भी सिर्फ मेमसाहब और बिटिया के आंसुओं की वजह से।
अचानक ही वह पूरा वाकया उसकी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह कौंध गया। रोज़ की तरह उस दिन शाम को जब वह कोठी पर पहुंचा, तो देखा कि वहां सबके चेहरे उदास, परेशान और लटके हुए हैं। थाना पुलिस की बातें हो रही हैं। साहब भी हैरान परशान हो कर इधर उधर फोन कर रहे हैं। पूछने पर पता चला कि साहब की नयी वाली बिलायती कुतिया “जूलिया” कहीं गुम हो गई है। या तो कोई उसे चुरा कर ले गया है या मौका पाकर गेट से निकल कर वह खुद ही कहीं भटक गयी है। और जब से वह गायब हुयी है तब से साहब की छोटी वाली बिटिया का रो-रो कर बुरा हाल है। और चूंकि बिटिया रो रही है, इसलिए मेमसाहब भी रो रही हैं। बस फिर क्या था? उनके आंसुओं को देख कर वह इतना द्रवित हो गया कि उसके अन्दर की सारी वफादारी अचानक ही जाग कर बाहर आ गयी। उसने साहब से कहा---“आप इन लोगों को सम्हालिए। और परेशान मत होइए। कुत्तों का सीजन चल रहा है। वह ज़रूर भटक कर कुत्तों के झुण्ड के साथ कहीं दूर निकल गयी होगी।”
साहब को उसकी इस नादानी भरी बात पर गुस्सा आ गया---“क्या बात करते हो? हम तो उसे हर बार सूई लगवाते हैं?” इस पर मेम साहब ने साहब को याद दिलाया कि इस बार तो अभी सूई लगी ही नहीं है।
फिर क्या था? उसके साथ रामसुमेर ड्राईवर और दुलारी “जूलिया को खोजने के अभियान में जुट गए। और जैसा कि उसका अंदाज़ा था, “जूलिया” पुलिया के नीचे मोहल्ले के पांच आवारा कुत्तों के बीच में फंसी हुयी थर-थर काँप रही थी। सीजन के कारण कुत्ते जोश में थे। और खूंखार हो रहे थे। रामसुमेर और दुलारी तो दूर खड़े सिर्फ हुल-हुल और हट-हट करते रहे। पर उसने न आव देखा न ताव। फटाक से कुत्तों के बीच घुस कर “जूलिया” को बचाने लगा। जोश से भरे हुए कुत्ते बिफर पड़े। और उन्होंने उस के ऊपर हमला बोल दिया। उसे जगह-जगह काटा। नोंचा। मांस निकाल दिया। पर बुरी तरह से घायल होने के बावजूद वह “जूलिया” को सही सलामत निकाल लाया। खून से लथफथ जब वह वापस कोठी पर पहुंचा, तो दर्द से बुरी तरह बिलबिला रहा था। पर साहब, मेम साहब और बिटिया रानी की आँखों से छलकने वाली शाबाशी और खुशी ने उसके सारे दर्द को फूंक कर एकदम से उड़ा दिया था। साहब ने अम्बुलेंस मंगवा कर उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाया था। और कृतज्ञता से उसका हाँथ पकड़ कर कहा था---“हम तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे।” और उसे पूरा विश्वास है कि वाकई साहब वह बात कभी भी नहीं भूलेंगे।
पुलिया से थोड़ा आगे चल कर सड़क दो रास्तों में बंटी हुई थी। बाँयी तरफ का रास्ता सीधे थाने की तरफ जाता था। रीना की चीखों के हिसाब से वह शांति की सकुशल वापसी और लुटी हुयी इज्जत और चेहरे पर पुती हुयी कालिख को साफ करने का सही रास्ता था। उसके सीने के घाव तभी भरेंगे जब शांति को घसीट कर घर लाया जायेगा। और बंटी को भर इच्छा मार-पीट कर जेल भेज दिया जायेगा। अब यह काम चाहे पुलिस करे या श्याम के आवारा-गुंडें दोस्त। रीना के लिए यह जीने-मरने की लड़ाई थी। जिसे वह हर हाल में जीतना चाहती थी। वह जीतेगी तभी जीएगी। नहीं तो हार और बदनामी का दंश लेकर वह अपनी कमज़ोर साँसों को ज्यादा दिनों तक नहीं खींच पायेगी।
दाहिनी तरफ का रास्ता खेतों और बगीचों के बीच से होकर कोठी की ओर जाता था। साहब की कोठी। जहाँ उसने अपने इकलौते सपने को अरसे से गिरवीं रख छोड़ा था। उसे पक्का विश्वास था कि इस बार वांट आते ही साहब श्याम को अपने दफ्तर में या कहीं और चपरासी की नौकरी ज़रूर दिलवा देंगे। और तब उस एक कृपा से उसका सब कुछ ठीक हो जायेगा। रीना का ईलाज़। शांति की शादी। घर की मरम्मत। उधार-कर्ज़ा। और छोटकू की पढ़ाई। पर लगता है कि शांति को उसके इस सपने पर कत्तई भरोसा नहीं था। तभी तो बंटी के साथ मिल कर उसने अपने लिए एक अलग से सपना बुन लिया था। उसे अपना सपना और अपना भविष्य परिवार के सपने और भविष्य से ज़्यादा ज़रूरी लगा था। तभी तो...। शांति की चिंता आकर उसे फिर से कचोटने लगी।
खेतों और बगीचों के पास से पुलिया के नीचे से होकर बहने वाला नाला गुज़रता था। उसने देखा कि वहाँ से रुक-रुक कर बीड़ी का धुआँ उठ रहा है। लोग-बाग रोज़ की तरह आज भी वहां दिशा-मैदान कर रहे थे। उसके जी में आया कि वह जोरों से चीखे। और एक पत्थर उठा कर उस तरफ उछाल दे। आज पता नहीं क्यों, उसे लोगों का इस तरह से खुले में बैठ कर निवृत होना बड़ा अजीब, घटिया और बुरा लग रहा था। उसे वाकई आज बहुत गुस्सा आ रहा था। हर एक के ऊपर। खुद अपने ऊपर भी। बैठे-बैठे वह अचानक ही बड़बड़ाने लगा...‘स्साला, कोल्हू का बैल बन गया हूँ...पूरे दिन ख़टता रहता हूँ...किसके लिए?...पर किसी को भी मेरी चिंता, मेरी परवाह नहीं है...जिसे देखो वही अपनी राह चल रहा है...लानत है, स्साली ऐसे ज़िंदगी पर!’ वह बुदबुदाया। और उदास हो गया। (क्रमशः)
---अरविन्द कुमार 

[यह कहानी "कथा क्रम" के "अप्रैल-जून 2015" अंक में प्रकाशित हुयी है]