शनिवार, 14 मार्च 2009

अशिक्षा के अँधियारे के विरुद्ध

आजकल से बीसेक साल पहले जब मैं स्कूल और कालेज में पढ़ा करता था, तब इम्तहान में नकल करने की पंरपरा नहीं थी। नकलचियों की संख्या कम हुआ करती थी। और छात्र-नौजवान ईमानदारी से अपनी अकल के आधार पर इम्तहान देने में विश्वास करते थे। और नकल करने वालों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा एवं उन्हें जलील किया किया जाता था। पर तब स्कूलों-कालेजों में पढ़ाई होती थी। अध्यापकगण कक्षाओं में पढ़ा-पढ़ा कर कचूमर निकाल देते थे। ट्यूशनों का इतना चलन नहीं था। अध्ययन-मनन-चिंतन का माहौल था। घर पर भी पढ़ाई को लेकर अक्सर पिटाई हो जाती थी। और हर वक्त यह हिदायतें दी जाती थीं, कि चाहे कुछ भी हो जाएं, फेल क्यों न हों, पर नकल कभी मत करना। तब न कहीं नकल विरोधी अध्यादेश था, न नकल रोकने के लिए उड़ाका दल थे। कक्ष निरीक्षक और प्रधानाचार्य का भय ही हमारे लिए काफी हुआ करता था। लेकिन तब विद्यालय वाकई विद्या मंदिर हुआ करते थे। अध्यापक गुरू थे। और शिक्षा ने व्यवसाय का रूप कत्तई नहीं अख्तियार किया था ।
पर अब परीक्षाओं में की प्रथा-सी चल पड़ी है। नकलचियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। नकल कराने के लिए एजेंसिया खुल गई हैं, जो ठेका लेकर नकल करवाती हैं। अभिभावक और अध्यापक नकल रोकना या रोकने की चेष्टा करना तो दूर, खुद नकल करवाने में संलग्न हो गए हैं। अब नकल न करने वाला एवं पठन-पाठन और चिंतन-मनन की बातें करने वाला हेय दृष्टि से देखा जाता है। तथा बेवकूफ, कप-मंडूक एवं ठस-बुद्धि का कहकर जलील किया जाता है। आजकल के अध्यापक भी पढ़ाने-लिखाने में कम, बल्कि ट्यूशन पढ़ाने, प्रैक्टिकल में नम्बर दिलवाने आदि की ठेकेदारी करने लगे हैं। संक्षेप में कहें, तो अब के अध्यापक न तो गुरू रह गये हैं न ही छात्र सही अर्थो में छात्र। विद्यालय में गुंडागर्दी, अराजकता, अशिक्षा, अश्लीलता और नशा-खोरी बढ़ती जा रही हैं। अब के विद्यालय, विद्यालय या मंदिर नहीं, दूकान या कि मंडी बन गये हैं। और यह हालत सरकार व गैर-सरकारी हर प्रकार के विद्यालयों की है।, बेसिक से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक।
आखिर शिक्षा का स्तर इतना गिर क्यों गया हैं ? क्यों पढ़ना और पढ़ाना अब मिशन जैसा नहीं रह गया है ? और क्यों इसको सुधारने की चिंता किसी को नहीं है ?
वैसे, कहने को तो यह कहा जा सकता हैं कि शिक्षा का प्रसार हो रहा है। पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। कोचिंग, इंस्टीट्यूटों, पत्राचार, पाठ्यक्रमों और स्कूलो-कालेजों की संख्या में दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। ’सबके लिए शिक्षा’ का अभियान चालाय जा रहा है। पर फिर भी, आज विचार शून्यता की स्थिति है। और सोचने-समझने वालों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। क्यों ? तर्क दिया जा सकता है कि आज जब समूचा समाज विकृत हो चला है, तो स्कूल और कालेज क्यों न होंगे ? आखिर समाज के विभिन्न हिस्सों से ही तो पढ़ने के लिए छात्रगण आते हैं। और चूंकि प्रदूषण बाहर चारों तरफ फैला हुआ है, इसलिए आज स्कूल और कालेज भी प्रदूषित हैं।
पर यह पूरा सच नहीं है, क्योंकि आज समाज में ढ़ेर सारी गड़बड़ियां जो दिखायी पड़ रही हैं, उनके पीछे एक मुख्य कारण शिक्षा के स्तर में गिरावट का होना है। अर्थात् आज चूंकि शिक्षा जगत का माहौल प्रदूषित हैं, इसलिए समाज भी प्रदूषित है। क्योंकि सिद्धान्तः विद्यायल होते इसलिए हैं कि वहां पढ़ने वाले कायदे से शिक्षित-ज्ञानशील और विचारवान होकर अच्छे नागरिक बनें और अपनी प्रतिभा व सोच-समझ से समाज को सही दिशा दें। इस लिहाज में देंखें तो शिक्षकों के ऊपर और विद्यालयों पर एक बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी होती हैं, जिसका निर्वाह करने में अगर जरा भी चूक हुई तो समाज की सुख-शांति और ताना-बाना ही नहीं, आने वाले कल की तस्वरी भी पूरी तरह से चैपट हो जाएगी। और यही आज कल हो रहा है।
आज न तो शिक्षक और न ही स्कूल कालेज अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभा पा रहे हैं। इसलिए तो दिन पर दिन अमीर-गरीब के बीच की खाई चैड़ी होती जा रही है। इसी देश में दो तरह के नागरिक पैदा हो रहे हैं। श्रम और श्रमिकों को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता की बातें करने वालों को आज बेककूफ और न जाने क्या-क्या समझा जाता है। सभी उच्च मानवीय मूल्यों का ह्नास हो रहा है। और पतनशील संस्कृति जीवन के हर क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन हावी होती जा रही हैं।
दरअसल, जब समाज में पैसे का वर्चस्व हो, उपभोक्ता वाद का बोलबाला हो और समाज की संचालक शक्तियां येन-केन-प्रकारेण मुनाफा और सिर्फ मुनाफा कमाने में जुटी हों, तब उनके लिये बहुत जरूरी होता है कि वे समाज में विचार-निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह से नष्ट-भ्रष्ट कर दें। और यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि स्कूलों-कालेजों को पूरी तरह से तहस-नहस करके शिक्षा जगत को पूरी तरह से प्रदूषित न कर दिया जाए। क्योंकि इसी से तो समाज के भविष्य का निर्माण होता है। अगर विचारों की जन्मस्थली को ही भ्रष्ट कर दिया जाए, तो बृहत्तर समाज को विचार-शून्य बनाकर आसानी से किसी भी प्रकार की चाकरी में लगाया जा सकता है।
यही कारण है कि आज सबके अधिक सोचनीय हालत शिक्षा के क्षेत्र की है। अब चूंकि विद्यालय, शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रमों के साथ-साथ पढ़ने और पढ़ाने वाले दूषित माहौल से ग्रस्त हैं, इसलिए भोगवादी और मुनाफाखोर शक्तियां आसानी से समाज को अपने पंजो में जकड़ कर दूषित-प्रदूषित कर रही हैं। ऊपर से समाज के भविष्य बच्चों और युवाओं को बरगला कर भटकाने के लिए टी0वी0, केबल, अश्लील सामग्री, फिल्में, इंटरनेट, माइकल जैक्सन, मैडोना और ब्रिटनी स्पीयर्स हैं ही।
इसलिए आज इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि इन स्कूलों-कालेजों के पाठ्क्रम, पद्धति और वातावरण को सुधारा जाए। अध्यापकों को पढ़ाने के लिए प्रेरित या बाध्य किया जाये और छात्रों को पढ़ने के लिए। ट्यूशनों का चलन बंद करना होगा। नकल प्रथा को रोकना होगा। और यह सब सिर्फ कानून बनाने से नहीं होगा। होगा तो सिर्फ और सिर्फ वैचारिक अभियान या कि सशक्त आंदोलन चलाने से। और इसके लिए जागरूक व ईमानदार शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, अध्यापकों, छात्रों और अभिभावकों को आगे आना होगा। तथा एक सशक्त शिक्षा आंदोलन चलना होगा, ताकि यह घटाटोप अंधेरा छंटे और विद्यालय विद्या का मंदिर होकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निष्ठापूर्वक निभाएं।
--अरविन्द कुमार
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार )

मंगलवार, 10 मार्च 2009

आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--तीन

आज भी हकीकत यही है कि दंगे हों तो कहर महिलाओं पर टूटता है। जातीय संघर्ष हो तो महिलाओं को भुगतना पड़ता हैं। आतंकवादियों का जुल्म बरसता है तो महिलाओं पर। पुलिस और सेना भी जब वहशी होती हैं तो भुगतती हैं महिलाएं। प्रेम प्रसंगों में भी प्रताड़ित महिलाएं ही होती है। यही नहीं, जब भारतीय संस्कृति के स्वयभू ठेकेदार अपनी तथाकथित संस्कृति की रक्षा में नैतिक पुलिस बन कर हिंसक होते हैं, तो सब से ज्यादे शिकार महिलायें ही होतीं हैं। चाहे वह हिन्दू धर्म हो या मुस्लिम, ईसाई हो या कि सिख धर्म, या चाहे कोई भी जाति हो या वर्ण हर जगह महिलाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। सारे नियम कानून और ढेरों पाबंदियाँ महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं। पुरूष हर जगह उनसे ऊपर और आजाद होता है।
दूसरी तरफ बाजार में जब खुलापन आता है, तो भी धड़ल्ले से महिलाएं और उनका शरीर ही बेचा और खरीदा जाता है। गरज यह कि सामंती मध्ययुगीन संस्कृति का बोलबाला हो या पश्चिमी अत्याधुनिक भोगवादी संस्कृति का वर्चस्व, शिकार महिलाओं को ही बनाया जाता हैं। चाहे दबाकर जोर जबर्दस्ती से या फिर फुसलाकर और चकाचैंध से भरी जिंदगी का लालच देकर। और हमारे देश में सामंती संस्कृति की छत्रछाया में ही तो फलफूल रही है यह मुनाफा आधारित पश्चिमी भोगवादी संस्कृति, मुक्त बाजार की अपसंस्कृति, विज्ञापनों, फिल्मों, टीवी सीरियलों और ब्यूटी कान्टेस्टों में महिला-शरीर का भोंड़ा इस्तेमाल और प्रदर्शन मात्र पुरूषों की दमित इच्छाओं की पूर्ति का साधन नहीं तो और क्या हैं ? पुरूष सत्तात्मक समाज में पुरूषों के हितों को ध्यान में रखकर अपना शरीर दिखा-दिखा कर तालियाँ पुरस्कार और पैसे पाने की मजबूरी।
कुल मिलाकर आज भी हमारे समाज की महिलाओं की स्थिति दयनीय और सोचनीय है। हालांकि उनकी स्थिति को बेहतर बनाने क कई एक कोशिशें हुई हैं। भारतीय दंड संहिता की धाराओं में कई सकारात्मक संशोधन हुए है। महिला शिक्षा, महिला को आरक्षण की सुविधा एवं महिला संगठनों व महिला मंचो के जरिए समय-समय पर कुछेक जेनुइन मुद्दों पर आंदोलन कर महिला-चेतना का विकास भी हुआ है, पर सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से किसी सार्थक आंदोलन या जागरण के आभाव में उनकी कुल स्थिति में कोई अधिक या अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। हालांकि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों खास करके अब अक उनके लिए वर्जित माने गए क्षेत्रों में उनकी भागीदारी या घुसपैठ बढ़ी है। और वहां उन्होंने अपनी योग्यताएं साबित भी की हैं, पर समग्रता में देखें तो आज भी गुणात्मक रूप से उन्हें कुछ भी ठोस हासिल नहीं हुआ हैं। महिलाओं की कुल आबादी का लगभग 76 प्रतिशत गाँवों में रहता है। आँकड़े बताते हैं कि इनमें से लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं आज भी अशिक्षित है। और प्रसव के दौरान हर 7 मिनट पर एक महिला की मृत्यु हो जाती है। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े ये तथ्य आजादी के 60 सालों के बाद भी उनकी दयनीय स्थिति को दर्शाते हैं।
पर सवाज यह उठता है कि आखिर महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा कैसे ? कैसे मिलेगा उन्हें सामाजिक न्याय ? बराबरी का वास्तविक दर्जा ? ताकि वे भी समाज के सम्यक विकास में अपना सार्थक योगदान कर सकें। कानून की अपनी सीमाएं जग जाहिर हैं। और खास करके उस देश में जहां भ्रष्टाचार का चहुँ ओर बोलबाला हो तथा पैसे, जोर और रूतबे से न्याय को भी न्यायपूर्ण न रहने दिया जाता हो, वहाँ कानून की सीमाएं यूँ ही बरकरार रहेंगी । वरना दहेज हत्याओं मे इस तरह की वृद्धि कभी नहीं होती। यही हाल छेड़खानी और बलात्कार के खिलाफ खड़े तमाम कानूनों का है। इन सबका माखौल उड़ाते हुए इनकी घटनाएं हर साल बढ़ती ही जा रही हैं। तब फिर ?
आज निश्चित तौर पर इस बात की जरूरत है कि समाज में महिलाओं के प्रति मौजूदा दृष्टिकोण में बदलाव लाया जाए और इसके लिए जरूरी है कि पहले खुद महिलाएं ही अपने हित के प्रति सचेत हों तथा आगे आएं। महिलाओं को इस प्रकार शिक्षित प्रशिक्षित किया जाये कि उनकी चेतना का विकास सम्यक ढंग से और उचित दिशा में हो सके तथा पुरूष सत्तात्मक सोच-समझ पर कारगर दबाव व चोट पड़ सके।
पर विडंबना यह है कि महिलाओं से जुड़े तमाम संगठन आज दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। एक तो धुर महिलावादी विचार दृष्टिकोण को मानने वाले हैं तथा दूसरे प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी सिद्धांतो व विचारों को तहत काम करने वाले। एक उच्च वर्ग और उच्च मध्य वर्ग की महिलाओं के बीच काम करते हैं, तो दूसरे निम्न मध्य वर्ग की कामकाजी महिलाओं और खेत-मजदूर श्रमिक महिलाओं के बीच सक्रिय हैं। पर इन दोनों के अतिवादी व आमतौर पर अव्यावहारिक एवं यान्त्रिक तौर-तरीकों के कारण इन दोनों तरह के संगठनो के साथ व्यापक महिलाओं की भागीदारी कम ही हो पाती है। सच तो यह है अधिकांश प्रगतिशील, जनवादी व क्रान्तिकारी संगठन और पार्टियों अन्दर भी काफी हद तक पुरूषवादी मानसिंकता हावी है। इस पर भी कारगर चोट करने की जरूरत है।
इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि व्यपाक महिलाओं को उनसे जुड़ी तमाम समस्याओं के इर्द-गिर्द एकजुट-गोलबंद करते हुए कुछ इस तरह से जागरूक और शिक्षित किया जाए, ताकि अपनी दोहरी गुलामी के विरूद्ध नुक्ता-दर-नुक्ता संघर्ष करते हुए वे अपनी मुक्ति की सही मंजिल की और बढ़ सकें। पर इसके लिए स्वयं महिलाओं को ही पहल लेनी होगी। और इन दो ध्रुओं पर खड़े महिला संगठनों के बीच या शायद दोनों को मिलाकर एक व्यापक आधार वाले मंच या मोर्चे का निर्माण करना होगा, ताकि वहाँ से वे अपनी लड़ाई को मुकम्मिल अंजाम दे सकें। पहले तो उन्हें हर स्तर पर पुरूषवादी सोच व संस्कृति के विरूद्ध जूझना-लड़ना होगा, फिर दूसरे दौर में पुरूषों के साथ मिलकर हम-कदम होकर इस अन्यायी, भ्रष्ट व अराजक समाज-व्यवस्था को बदलने के लिए इसके विरूद्ध चलने वाले तमाम संघर्षो में सक्रिय हिस्सेदारी निभानी होगी, तभी हो पाएगी उनकी बेहतरी और सही मान्य में उनकी मुक्ति। अन्यथा मानसिक रूप से विकलांग महिलाओं का गर्भाशय यूँ ही निकाला जाता रहेगा, उच्चतम न्यायलय गवाहों और सबूतों के आभाव में यूँ ही बलात्कार की सजा सात साल पहले घटाकर तीन साल करता रहेगा, डायन और चुड़ैल कहकर यूँ ही पत्थरों से पीट-पीटकर मारी जाती रहेंगी महिलाएं, शिवपति व ऊषा धीमान को यूँ ही नंगा करके सरे बाजार घुमाया जाता रहेगा, रूपकँवर यूँ ही जलाई जाती रहेंगी, रोशनी, शाहबानों व इमराना की आवाज यूँ ही नक्कार खाने में तूती की तरह अनसुनी गूँजती रहेगी। और यूँ ही उमड़ता-घुमड़ता रहेगा आधी आबादी की आंखों में दर्द का समंदर आने वाले समय में भी।
अंत में मैं क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे की एक कविता के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ-
ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए
--अरविन्द कुमार
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)

सोमवार, 9 मार्च 2009

आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--दो

आज हम एक संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। चारो तरफ तीव्र हलचल, उठा-पटक, बहस-मुबाहिसा, संघर्ष और धुव्रीकरण का माहौल है। अभी कल तक जो था, वह आज नहीं है और आज जो है कि वह कल निश्चित ही नहीं रहेगा। घटनाएं इतनी तेजी से घट रही हैं, दृश्य-परिदृश्य इतनी तेजी से बदलता जा रहा है कि आने वाले कल के बारे में अनुमान करना कतई मुश्किल हो गया है। कंप्यूटर, अत्याधुनिक, तक्नालाजी , मुक्त बाजार, आयातित पश्चिमी पूँजी व संस्कृति और अब यह आर्थिक मंदी का भँवर और गोल और गहरा होता जा रहा है। मूल्य और मान्यताएं रोज-ब-रोज बदलती जा रही है। समय के इस नाजुक मोड़ पर कहाँ खड़े है हम ? कहाँ खड़ी हैं हमारी महिलाएं ? भारतीय नारी ? इसकी जाँच पड़ताल करने और इस संदर्भ में निणर्यात्मक बहुत कुछ ठोस करने की जरूरत आन पड़ी हैं। क्योंकि जब तक इस आधी आबादी से जुड़ी समस्याओं व त्रासदियों को हल नहीं कर लिया जाता, समाज की शक्लो सूरत को कतई नहीं बदला जा सकता। इधर-उधर से पैबंद लगाकर इसे सुधारने की लाख कोशिशें क्यों न कर ली जायें।
अपने चारों तरफ आज हम निगाहें दौड़ाते हैं, तो पाते है कि हमारे यहाँ महिलाएं आज भी कमोबोश मध्ययुगीन सोव व संस्कृति तथा पतनशील, मुनाफाखोर, पूँजीवादी उपभोक्ता मूल्यों के पाटों में दबी पड़ी छटपटा रही हैं। शहरी अत्याधुनिक उच्च वर्ग की महिलाओं से लेकर दूर-दरार की गँवई-गाँव की महिलाएं तक पितृ-सत्तात्मक समाज-व्यवस्था के अंतर्विरोधों और दंशो को हर पल-हर दिन झेल रही हैं। कहीं वे यौन-उत्पीड़न की शिकार हैं, तो कहीं घर की चारदीवारी में कैद। पति को शारीरिक सुख देते हुए बच्चे पैदा करने की मशीन बनी, पति और बच्चों की देखभाल करने के तथाकथित फर्ज के बोझ तले पिस रही हैं। कहीं उन पर यौन-उन्मुक्तता की कुंठाएँ हावी हैं, तो कहीं वे कैरियर और अस्तित्व के लिए जूझती हुई मर-खप रही हैं या फिर मुनाफाखौर बाजार की माँगो के अनुसार खुले बाजार में वस्तु की तरह बिक रही हैं। उपेक्षा, उत्पीड़न, शोषण, दोहन, दमन और क्रय-विक्रय। यही कुछ आज भी उनकी नियति बनी हुई है।
बराबरी का हक, समानता का दर्जा, संवैधानिक अधिकार, महिला जागृति, महिला मंच, संगठन, महिला आंदोलन और महिलाओं के लिए राष्ट्रीय कमीशन आदि की चर्चाएँ तो खूब होती हैं, पर आज भी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा बूढ़ी मान्यताओं, अनर्गल रूढ़ियों और अंधविश्वासों के घने दलदली जंगल में फंसा हुआ है। आज भी अपनी पहचान के लिए उसे हर स्तर पर जूझना पड़ता हैं, वरना बाप, भाई, पति और बेटे से ही आज भी उसकी पहचा है। अभी भी वह लगभग दोयम दर्जे की नागरिक है। शिक्षा, नौकरी, पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक आजादी भी उसकी सामाजिक व घरेलू हैसियत में कोई खास फर्क नहीं ला पाये हैं, क्योंकि वहाँ भी उसे पति या किसी पुरूष की इच्छानुसार चलना, काम करना और निर्णय लेना पड़ता है। वह घर चलाने और पति को सहयोग देने के लिए नौकरी तो करती है, परन्तु उसे अपने कमाये हुए पैसों को खर्च करने तक की आजादी नहीं है। ऐसी महिलाओं की संख्या आज भी काफी हैं, जो पति से अधिक तन्ख्वाह पाने के बावजूद उनकी मर्जी की ही गुलाम हैं और यदा-कदा उनसे पिटती भी रहती हैं। यही नहीं, निम्न आय वर्ग की श्रमिक महिलाएं तो अधिक श्रम करने के बावजूद अपने सहकर्मी पुरूष श्रमिकों से कम मजदूरी पाती हैं। और अपने निकम्मे व शराबी पति से पिटने के लिए अभिशप्त हैं। यौन-शोषण तो खैर दोनों जगहों पर बराबर मात्रा में है।
महिलाओं के साथ छेड़खानी, दहेज-हत्या, विधवा-हत्या (सतीप्रथा) बेइज्जती और बलात्कार की घटनाएं दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही हैं। इधर महिलाओं को नंगा करके घुमाए जाने या उनके माथे पर गोदना गोदवाए जाने या थाने मे उनके साथ सामूहिक बलात्कार करने की घटनाओं में जो अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसे भी महिला उत्पीड़न के इसी परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा चाहिए, जहाँ गर्भ में लिंग निर्धारित होते ही उनकी हत्या कर दी जाती है। आज भी यह धारणा आम है कि महिलाओं को दया, प्रेम, क्षमा, शर्म और हया की प्रतिमूर्ति बनकर घर की चार-दीवारी या पर्दें के भीतर ही रहना चाहिए। आज भी उन्हें पुरूषों की तुलना में कमजोर, हेय और दोयम दर्जे का मानकर मात्र भोग्या माना और समझा जाता है तथा उनकी बुद्धि, प्रतिभा, एकाग्रता, लगन, निष्ठा, जीजिविषा और कर्तव्यपरायणता की तुलना में (उनको नकार कर) अनके शरीर की खूबसूरती, मादकता, फीगर और सेक्स को ही महत्व दिया जाता हैं।
शेष फिर कभी--
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)