गुरुवार, 26 नवंबर 2009

कहानी

शायद अब वह नहीं आयेगा

उस दिन वह अचानक ही मुझसे टकरा गया था। मेरा स्कूटर अस्पताल के छोटे सँकरे गेट के अन्दर दाखिल हो रहा था और उसकी साइकिल तेजी से बाहर निकल रही थी। दोनों अपनी अपनी तेजी में थे। मोड़ पर आपस में भिड़ गये। हम दोनों ने एक दूसरे को चौंक कर देखा। उसनें हड़बड़ा कर नमस्ते की और मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा-'अरे, तुम ? यहां क्या कर रहे हो ?
'आप ही से मिलने आया था ।’ उसने अपनी साइकिल सम्हाली। मुझे रूकने को कहा और करीब आकर कहने लगा-'वाइफ की तबीयत खराब है, जरा किसी बढ़िया लेडी डाक्टर को दिखला दीजिए, प्रेगनेंसी का मामला है। बेचारी सुबह से दर्द से छटपटा रही है। प्लीज हेल्प मी, आई बेग...........।’
वह आदतन एकदम से रूआँसा हो गया। उसके बदहवास चेहरे और याचना के हाव भाव ने मुझे फिर से बाँध लिया। बाध्य होकर मैंने अपने हाँथ का ढाँढस उसके कंधे पर रखा-'जाओ वाइफ को ले आओ, मैं अच्छी तरह से चेकअप करवा दूँगा।’
'क्या कुछ दवाइयाँ भी मिल जाएंगी ? इधर पैसों की बड़ी तंगी है।’
'देखूगाँ, पहले उसे लेकर तो आओ।’
वह उछल कर साइकिल पर सवार हो गया। उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि मुझसे अचानक मिली इस मदद ने उसके भीतर फिर से नया जोश भर दिया है।
तीन साल.......हां, तीन साल पहले वह मुझसे मिला था। परवेज भाई के प्रेस पर। लेकिन तब उसकी शादी नहीं हुई थी। मुझे अच्छी तरह याद है, इस बारे में उसने कभी भी कुछ नहीं बताया था। परवेज भाई उन दिनों ’आफताब’ नामक साप्ताहिक अखबार निकालते थे। उस दिन मैं उसी के लिए एक लेख लेकर गया था। वह वहाँ पहले ही से बैठा हुआ था और चुपचाप शगिर्दों की भीड़ में धँसा गप्पबाजियाँ सुन रहा था। मुझे देखते ही परवेज भाई ने अपना इस्तकबालिया शेर दागा और अदा के साथ मेरी तारीफ के पुल बाँधने लगे। मेरे बैठते ही वह मेरी तरफ सरक आया-आप कहाँ रहते हैं, क्या काम करते हैं ? बहुत नाम सुना है ! वगैरह-वगैरह..............
परवेज भाई से निपटकर जब मैं उठा तो वह भी साथ हो लिया। पहली-पहली मुलाकात में अगर कोई आपके साथ चलने, तो न चाहते हुए भी आप उससे बातचीत कीजियेगा ही। मैंने भी यूं ही उसका अता-पता पूछ लिया और बस, वह शुरू हो गया बिन रूके, एक साँस में।
........इन्टर के बाद वह आगे पढ़ नहीं पाया। ट्यूशन कर-कर के अपना खर्च निकाल रहा है। घर पर भी उसे बराबर पैसे देने पड़ते हैं। न दे तो घर से निकाल दिया जाएगा। परिवार की माली हालत ठीक नहीं है। बाप बूढ़ा, चिड़चिड़ा और सख्त दिल है। घर का खर्च उसकी रेलवे की तनख्वाह से चल नहीं पाता है। माँ अक्सर बीमार रहती है। दमा की मरीज ! तीन सयानी जवान बहने हैं। भाई दो हैं, छोटे और स्कूल में पढ़ने वाले। बाप ने उसकी पढ़ाई छुड़वाई। बहनों को चार-पाँच से आगे पढ़ाया नहीं और अब भाइयों की पढ़ाई छुड़वाना चाहते हैं। लेकिन भाई पढ़ना चाहते हैं। वह भी चाहता है कि दोनों भाई पढ़ें। पर बाप का कहना हैं कि कुछ हाथ का काम सीख कर काम धन्धा ढूंढे। मेरा पिण्ड छोड़ें। खुद कमायें, खुद खाएं। साथ में घर भी चलायें।
इस बात को लेकर उसमें और बाप में बराबर तनी रहती है। बाप से उसका झगड़ा इस बात पर भी होता है कि बहनों की शादी वो जैसे-तैसे निपटा देना चाहते हैं। रोकने टोकने पर उखड़ जाते हैं। कहते है कि कुछ करता धरता है नहीं। मेरी खाता है और मुझे ही उपदेश देता हैं.......अब आप ही बताइये, अगर उन्होंने मुझे एम0ए0, बी0ए0 कराया होता, तो मुझे नौकरी क्यों नहीं मिलती! तब मैं सौ-सौ, दो-दो सौ रूपयों के लिये लोगों के तलवे नहीं चाटता। आखिर में उसने दरख्वास्त की कि मैं उसे परवेज भाई के अखबार में स्थानीय संवाददाता बनवा दूँ।
इसके बाद वह अक्सर ही मुझसे मिलने लगा। घर पर। प्रेस पर। चाय की दुकान पर। या कहीं रास्ते में। आते-जाते वक्त-बेवक्त टकराने लगा। शुरू-शुरू में तो मैं यूं ही रहम खाकर उससे दो-चार मिनट बतिया लिया करता था, पर धीरे-धीरे वह मुझे बोर करने लगा। हमारे बीच की औपचारिकता सूखने लगी और मैं उससे कतराने लगा। अब परवेज भाई मेरे सगे तो थे नहीं और न ही मैं उनके लिये इतना भारी भरकम था कि मेरी सिफारिश पर वे उसे अपना संवाददाता बना लेते। और फिर था ही क्या उसके पास ऐसा चमकदार, जो अगर मैं दिखा देता तो परवेज भाई लपक कर पकड़ लेते। एक आम बेरोजगार। सूखा सिकुड़ा नौजवान। एक अदना-सा बूढ़ा नजर आने वाला। हड्डियों का ढांचा। बेकार और बुझा हुआ। चेहरे पर हर वक्त बेचैनी और उलझन का एहसास। आंखे गड्ढों में धँसी हुई। अगल-बगल से बेखबर। अपनी ही फिक्रों के जाल में कैद! वह बातें करता तो उसके पीले-पीले बेतरतीव, ऊबड़-खाबड़ पायरियाग्रस्त दातों और मुंह से लगातार छूटती हुई थूक की फुलझड़ियों से किसी को भी उबकाई आ जाए।
तकरीबन एक घन्टे बाद वह बीवी को लाद कर ले आया। मैनें उसे ले जाकर लेडी डाक्टर के हवाले कर दिया। और बॉस के पास चला गया। बॉस के केबिन से जब मैं बापस आया तो देखा, वह मेरे कमरे में जमा हुआ है। लेकिन अकेले।
'अरे तुम्हारी बीवी कहाँ हैं ?’
'घर भेज दिया ।’
'अकेले ?’
'नहीं भाई आया था उसी के साथ....।’ और लेडी डाक्टर का पर्चा सामने कर दिया-‘ये दवाइयाँ लिखी हैं।‘ मैंने देखा टानिक वगैरह लिखा था। टिटनस की एक सुई। और पेट ठीक रखने के लिये एक दवा। कुल सौ रूपये का खर्च था। किसी डाक्टर के पास इनमें से एकाध का ’सैम्पुल’ भले ही मिल जाए। सभी दवाइयाँ तो मुश्किल हैं यहाँ कि मिलें। फिर भी पर्ची छोड़ जाओ, देखता हूँ नहीं होगा तो सामने की दुकान से ’रिजनेबल रेट’ पर दिलवा दंूगा।’
'लेकिन मेरे पास तो कुल पचास रूपये है। अच्छा छोड़िए दवा-फवा। डाॅक्टर साहिबा ने कहा कि सब कुछ नाॅरमल है। कल थोड़ा सोने में इधर-उधर हो गया था बस।'
'ये दवाइयां बहुत जरूरी हैं और ये टिटनेस कि सुई तो बहुत ही जरूरी है।’
'लेकिन वह तो बोल रही थी कि यह सुई अगले महीने और उसके अगले महीने फिर लगवानी पड़ेगी।’
'हाँ लेकिन ये तो बहुत सस्ती आती है।'
'तब इसी सूई को लगवा दे रहा हूँ। पैसे होंगे, तो दूसरी दवाइयाँ आयेंगी।' वह पर्चा लेकर उठा खड़ा हुआ।
मैंने पर्चा छीन लिया और कहां 'फिक्र मत करो, जाओ वाइफ को आराम करने दो। और थोड़ी-थोड़ी देर पर नींबू का पानी पिलाते रहना। और शाम को चार और पाँच के बीच आ जाना। दवाइयों का बन्दोबस्त कर दूंगा।’ वह कुछ आश्वस्त हुआ। और मुझे देखकर मुस्कराया। वे ही पीले-पीले गंदे दांत। और चला गया........
दोपहर को चपरासी भेज कर मैंने दूकान से उसकी दवाइयाँ मँगवा ली। शाम को जब वह आया, तो देख कर बहुत खुश हुआ। मैंने चाय की प्यालियों के साथ अपने ढेरों सवाल उसके सामने रख दिये। मसलन शादी कब की ? नौकरी मिली कि नहीं ? अब घर के हालात कैसे हैं ? जवाब मैं उसने जो कुछ बताया उससे पता चला कि पहले तो वह घर में अकेले ही झेलता था, अब मियाँ बीवी दोनों झेलते हैं। नौकरी उसे अभी तक नहीं मिली। किसी तरह ट्यूशन कर-कर के दिन गुजार रहा हैं.......। ‘पिछली गर्मियों में ही शादी हुई है। पर छः महीने के अन्दर ही अच्छे खाते पीते घर की हाई स्कूल पास लड़की के सौ करम हो चुके है। जिस महीने वह घर पैसे नहीं दे पाता, उस महीने खूब थूकम फजीहत होती है। अब आप ही बताइये, ट्यूशन का क्या भरोसा ? सिर्फ साल में छः-सात महीने ही तो पाँच-छः सौ पाता हूँ। उसमें से सौ रूपये अपने पास रख सब घर पर दे देता हूँ। क्या सौ रूपये भी खुद पर और अपनी वाईफ पर न खर्च करूँ ?'
'जब से शादी हुई है किसी ने एक चप्पल भी खरीद कर नहीं दिया। सब मैं ही करता हूँ। चाहे पिक्चर ले जाना हो या कुछ खरीद कर लाऊं। और तो और पिक्चर भी अकेले कहाँ जा पाता हूँ ? सब साथ लग लेते हैं। भाईसाहब, आलम यह है कि हम बेफिक्र होकर प्यार भी नहीं कर पाते।' बताते-बताते वह भावुक हो गया 'अब इधर चूंकि गर्मियाँ चल रही हैं, इसलिए हाथ में एक ही ट्यूशन हैं। अब सौ रूपयों में क्या दूँ ? और क्या बचाऊँ ? लेकिन किसको कौन समझायें ? वाइफ तो रात-रात भर रोती रहती है। प्रेग्नेंट है, तो इतना भी नहीं सोचते कि उसे थोड़ा आराम करने दें। खुश रहने दें। काम करा-करा कर मार डालते हैं।'
यकायक वह चुप होकर कहीं खो गया। कुछ पल तक यूँ ही खामोश रहने के बाद उसने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया-'बहनें और दोनों छोटे भाई भी उसी रंग में रंग गए हैं। कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करता। पहले इन्ही के लिए जान छिड़कता था। बाबूजी के मनमाने रवैये से इनको बचाता था। पर अब तो इनसे भी चिढ़ होने लगी है। हर झगड़े और हर तनाव में ये आँख मूँद कर माँ और बाबू जी के साथ हो लेते हैं। और मुझे जोरू का गुलाम समझ कर ताने मारते हैं। कभी-कभी तो सोचता हूँ, वाइफ को लेकर घर द्वार छोड़ दूँ। रहने लगूँ अलग। घर छोड़ दूंगा, तभी पता चलेगा आटे दाल का भाव। बाबूजी जब एक एक करके रगड़ेगे तब समझ में आएगा।’ हताशा लिए दर्द का सूनापन उसकी आंखो में तैरने लगा और वह उदास हो गया।
इसके बाद वह अक्सर आने लगा। पहले तो अधिकतर दवाइयाँ लेने। पर फिर वाइफ के बारे में ’कम्पलेन्ट्स’ लेकर। मैं सैम्पुल वगरैह दिलवां देता। सूई-वूई लगवा देता। उसकी बीवी की हालत अन्जानें ही मेरी चिन्ता बन गयी थी। कहाँ आ फँसी बेचारी ?
एक दिन वह अपने सारे प्रमाण-पत्र लेता आया। और अस्पताल में नौकरी दिलवाने की जिद करने लगा। कोई भी, कैसी भी नौकरी। मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि यहाँ नौकरी दिलवाना मेरे वश में नहीं है। एक तो मैंनेजमेंट से मेरी पटती नहीं है, दूसरे इस प्राइवेट अस्पताल का मैं ख़ुद एक अदना-सा कर्मचारी हूँ। और फिर, न मैं कभी इतना बड़ा था और आज भी मेरी हैसियत ऐसी नहीं है कि किसी को नौकरी-वौकरी दिलवा सकूँ। पर उसे लगा कि शायद मैं उसे टाल रहा हूँ। अतः जिद्द पर अड़ा गिड़गिड़ाता रहा। हार कर मैंने उसे मुख्य प्रबंधक के पास पहुँचा दिया।
पर इसके बाद उसका आना कम होते-होते एकदम से बन्द हो गया। कुछ दिनों तक तो उसके बारे में मेरी चिन्ता यूँ ही बनी रही। पर धीरे-धीरे काम की व्यस्तता और खुद की चिन्ताओं के गर्दों गुबार ने उसे चिन्ताओं को परिधि से बाहर दूर धकेल दिया। धीरे-धीरे और बहुत दूर।
लेकिन एक दिन अचानक अलस्सुबह ही उस ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दे दी। परेशान। बाल बिखरे। कपड़े अस्त व्यस्त। आँखें लाल सूजी हुई। थकान से चूर- 'जरा, थाने चलिये।’
'थाने किसलिये ?’ मैं चैंका ।
’वे लोग उसका पोस्टमार्टम करना चाहते हैं।’
'किसका पोस्टमार्टम ? साफ साफ बताओ क्या बात है ? पहेलियाँ मत बुझाओ।'
'जरा पानी पिलवा दीजिये । प्लींज बड़ी प्यास लगी है।’
मुझे लगा वह गश खाकर गिर जायेगा। इसलिए पकड़ कर अन्दर कमरे में बैठा दिया। दो गिलास पानी पीने के बाद वह सोफे से पीठ टिका कर लुढ़क गया। और छत की तरफ चेहरा करके आँखे बन्द कर लीं। एक पल, दो पल, तीन पल। मेरी बेसब्री उछल कर बाहर आ गयी। और उसके कंधे पर सवार होकर झकझोरने लगी-'बताओ क्या बात है ?‘
‘मेरी वाइफ अब इस दुनिया में नहीं है। कल रात चुपके से उसने कुछ खा लिया। मुझे कुछ बताया तक नहीं। साथ ही खाया। साथ ही सोयी। पर........उसके पपड़ी जमे होंठ थरथाने लगे। उसने उन्हें रोका। आँसुओं को बाहर निकलने नहीं दिया। जबरन। सुबह तीन बजे के करीब जब मेरी नींद खुली तो देखा वह गों गों करके ऐंठ रही है। पानी से निकाली हुई मछली की तरह छटपटा रही है। मैं घबरा गया। दौड़कर माँ और बाबूजी को जगाया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जब तक वे आये वह जा चुकी थी।’
उसकी आँखों में आँसू भर आये। वह रोने लगा। पर तुरन्त ही सम्हला। और चुप हो गया। 'इधर किस्मत के मारे हम सब रो रहे थे। उधर मुहल्ले के कुछ लोग जा कर थाने पर सेंक आये। अब पुलिस वाले परेशान कर रहे हैं कि मामला दहेज हत्या का बन रहा है। मुकदमा दर्ज होगा। पोस्टमार्टम होगा। इसके मायके वालों को बुलाया जाएगा। इन्क्वायरी होगी। भाई साहब, प्लीज आप थाने पर चलकर कह दीजिये कि मामला दहेज हत्या का नहीं है।’
मैं यकायक सकपका गया - ‘लेकिन यह मैं कैसे कह सकता हूँ ?‘ उसने मेरे घुटने पर अपनी याचना का ठंडा हाथ रख दिया-’सच मानिये भाईसाहब, इसके पीछे कोई साजिश-वाजिश नहीं है। लोग ख्वामख्वाह ही हम लोगों को फँसाना चाहते है।‘
’पर परिस्थितियाँ तो तुम लोगों के एकदम खिलाफ हैं। और चूँकि यह नेचुरल डेथ नहीं है, इसीलिये.........।’
‘यह तो होना ही था। अपेक्षित। मैंने लाख कोशिश की। पर वह तंग आ चुकी थी। बेचारी।’
'पोस्टमार्टम तो होगा ही। और अगर कोई कम्पलेंट हुई तो इन्क्वायरी भी होगी। मुकदमा भी चलेगा। हो सकता है, तुम लोगों को...........।’
उसने सूनी-सूनी आँखो से मुझे देखा और एक लम्बी साँस ली-'तो आप भी मेरी मदद नहीं करेंगे। मैं जानता था।.....उफ मैं भी कितना बदनसीब हूँ।’ और पता नहीं वह क्या-क्या बुदबुदाया। और फिर एक झटके से उठ कर चला गया। शायद फिर कभी न आने के लिये।.......

अरविन्द कुमार