शनिवार, 31 जनवरी 2009

बसंत पंचमी का यह दिन----

आज बसंत पंचमी है. आसमान में उड़ती हुई पतंगों को देख कर बचपन की ढेर सारी यादें ताज़ा हो गयीं. बचपन बीत गया,जवानी आयी और अब वह भी हाथ से फिसलती जा रही है. पर आसमान में सिर ताने उड़ती हुई लहराती पतंगें मुझे आज भी रोमांचित करती हैं. आज़ादी की चाहत की तरह. बचपन में हम अपनी पतंगें और माँझा ख़ुद बनाया करते थे. क्या जोश होता था ? सब कुछ अपना. अपनी ज़मीन, अपना आकाश, अपनी हवा और अपनी बाल सुलभ पतंगबाजी की प्रतियोगिता. हार में भी जीत और जीत में भी हार.
लेकिन अब समय बदल गया है. तो अब उस तरह के खुले मैदान हैं और ही उतनी साफ़ सुथरी खुली हवा. पतंग, माँझा, चरखी और डोर सब ब्रांडेड हो गए हैं. और पतंगबाजी हुड़दंग. और हर हाल में जीतने की लालसा. हर साल जाने कितने बच्चे इस पतंगबाजी के चक्कर में अपनी जान गवाँ बैठते हैं. कभी छत से गिरकर और कभी करंट लगने के कारण. पतंगों को भी देखिये तो ऐसा लगता है कि आसमान में पतंगें नहीं रुपये उड़ रहे हैं. वाकई बाज़ार ने हमारे तीज त्योहारों को भी एक वस्तु बना कर रख दिया है.
पहले बसंत पंचमी के दिन स्कूलों में सरस्वती की पूजा होती थी. सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे. पर अब न तो वहाँ सरस्वती है और न उसकी कोई पूजा. क्या आपको नही लगता कि स्कूल और कॉलेज अब मन्दिर नही मण्डी बनते जा रहे हैं ? आज कितने बच्चों को यह पता है कि आज के दिन निराला का जन्मदिन भी है. बच्चों की तो छोड़िये,आज कितने युवा शिक्षकों को यह पता है कि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कौन थे ? साहित्य और संस्कृति को अगर इसी तरह से जीवन से ख़त्म किया जाता रहा , तो ज़रा सोच कर देखिये भविष्य में जो युवा पीढी हमें मिलेगी वह कैसी होगी ?और अगर इसी तरह सिर्फ़ पैसा ही जीवन का निर्णायक तत्त्व बनता चला जाए, तब कैसा होगा हमारा भविष्य ? ज़रा सोच कर देखिये.
अंत में हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार निराला को सादर नमन करते हुए उन्ही की दो कवितायें---

(एक)

स्नेह निर्झर बह गया है
रेत सा तन रह गया है.

आग की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है-अब यहाँ पिक या शिखी,
नहीं आते पंक्ति मैं वह हूँ लिखी,
नहीं जिसका अर्थ-
जीवन दह गया है।

दिए हैं जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रभा को चकित चल,
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल,
ठाठ जीवन का वही-
जो ढह गया.

अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम त्रिन पर बैठने को निरुपमा,
बह रही है हृदय पर केवल अमा,
मैं अलक्षित हूँ,यही
कवि कह गया है।

(दो)

बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु!
पूछेगा सारा गाँव बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँस कर,
वह कभी नहाती थी धँस कर,
आंखे रह जाती थीं फँस कर,
काँपते थे दोनों पाँव बंधु!

बाँधो नाव इस ठाँव बंधु!
पूछेगा सारा गाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फ़िर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी सहती थी,
देती थी सबके दाँव बंधु!

बाँधो नाव इस ठाँव बंधु!
पूछेगा सारा गाँव बंधु!

बुधवार, 28 जनवरी 2009

ओबामा की जासूसी का सच

कौन कहता है कि अमेरिका इस समय भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है ?कम से कम नए राष्ट्रपति ओबामा की ताजपोशी के भव्य लाइव टेलीकास्ट को देख कर तो ऐसा नही लगता है कि वहां के बैंक कंगाल हो गए हैं.बाज़ार सूने पड़े हैं.उद्योग धंधे ठप्प पड़े हैं. गरीबी और बेरोजगारी काफी बढ़ गयी है.उस दिन अमेरिका परस्त पूरी दुनिया की मीडिया ने यह स्थापित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि अमेरिका अभी भी अमीर और शाहखर्च है.और इस तरह की छोटी-मोटी आर्थिक मंदी तो उसके लिए कोई समस्या ही नहीं है. बेल आउट और राहत पैकेज-वैकेज तो बाद में देखा जायेगा,पहले दुनिया भर को यह बता दिया जाए कि उसकी वास्तविक शानो-शौकत क्या है ?लोंगो ने देखा.लोग खुश हुए.और आश्वस्त भी कि यह नया राष्ट्रपति अमेरिका सहित पूरी दुनिया को बदल देगा।
पर लगता है,इन् तमाम दरबारी मीडिया को इस से भी संतोष नहीं हुआ.अचानक उनको लगा कि इतने सारे ताम-झाम के बावजूद प्रभाव उतना पड़ा नहीं जितना कि उम्मीद थी.आर्थिक मंदी और संकट की चहुँओर होने वाली चर्चाओं के शोर में ताजपोशी का यह कार्यकर्म और उसके पीछे का संदेश कंही नक्कारखाने में तूती बन कर ना रह जाए.इसलिए अगले ही दिन उन्होंने बड़े ही सुनियोजित तरीके से यह ख़बर फैला दी कि उस दिन ओबामा के पूरे कार्यक्रम की जासूसी ओसामा के अलावा दूसरे ग्रह के लोग भी कर रहे थे.उड़नतश्तरी में बैठकर कुछ एलियन आए,उन्होंने गुप-चुप तस्वीरे खींची और उड़नछू हो गए।
वैसे आप और हम इसे बेवकूफी ही कहेंगे.क्योंकि दूसरे किसी ग्रह पर जीवन है कि नहीं, यह तो ख़ुद अमेरिका भी अभी तक साबित नहीं कर पाया है.पर यह ख़बर सिर्फ़ अमेरिका में ही नहीं,ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया सहित उन तमाम देशों में भी खूब फैलाई गयी,जिनका भविष्य आज पूरी तरह से अमेरिका के भविष्य पर टिका हुआ है.पर क्या है, इस ख़बर का असली मंतव्य ?मतलब साफ़ है.आज अमेरिका के तमाम लग्गू-भग्गू और पूरी दुनिया में फैले उनके मीडिया-इन्द्रजाल हर तरह से यह स्थापित करने पर तुले हुए हैं कि अमेरिका अभी भी एक ताकतवर देश है.और ओबामा और अमेरिका से अभी भी न सिर्फ़ ओसामा,अलकायदा और तालीबान बल्कि दूसरे ग्रहों को भी खतरा है.तो क्या अब अमेरिका आतंकवाद के साथ-साथ दूसरे ग्रहों से होने वाले हमलों का भी दिकः-दिखा कर पूरी दुनिया को डराएगा ?पर इन हरकतों से तो लगता है कि अमेरिका तो ख़ुद ही डरा हुआ है।
अंत में मैं कवि गोरख पाण्डेय की एक कविता से अपनी बात ख़तम करता हूँ.कल उनकी पुण्यतिथि भी है.

वे डरते हैं
किस चीज़ से डरते हैं वे
तमाम धन दौलत
गोला-बारूद,पुलिस-फौज के बावजूद ?
वे डरते हैं कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे.

रविवार, 25 जनवरी 2009

लीजिये मैं भी आ गया मैदान में.....

दोस्तों,काफ़ी दिनों से सोच रहा था कि मै भी अपना कोई ब्लॉग बनाऊँ.पर नही चाहता था कि हजारों ब्लोगों की भीड़ में मेरा ब्लॉग भी गुम हो कर रह जाए। इस के अलावा मैं यह भी चाह रहा था कि ब्लॉग पर नियमित रह सकूँ। कुछ तो मन की तीव्र इच्छा और कुछ दोस्तों का दबाव। अब मैं भी उतर रहा हूँ इस नई विधा में। कोशिश करूँगा कि मेरे पाठकों और मित्रों को मुझसे निराशा न हो। बाकी बातें बाद में। अभी तो फिलहाल के लिए अपनी दो कवितायें यहाँ दे रहा हूँ। प्रतिक्रिया अपेक्षित है।

(एक)
कुछ भी तो नहीं गुजरा
इधर से / काफी दिनों से
न कोई विजय जुलूस, न कोई महान शवयात्रा
और नाही / किसी प्रेमी युगल की तलाश में
खोजी कुत्तों का कोई झुंड
फ़िर भी, सड़कों पर ये मुर्गे के पंख क्यों
यह शहर अचानक बेजुबान क्यों?

(दो)
कौन कहता है
कि परछाईं हमेशा आदमी के साथ चलती है
वह आदमी के नहीं
रोशनी के साथ चलती है
उसी के अनुसार
कभी छोटी,कभी बड़ी,कभी आगे,कभी पीछे
और कभी कभी तो बिलकुल गुम हो जाती है
आदमी को निपट अकेला छोड़ कर

परछाई आदमी के नहीं
रोशनी के साथ चलती है
और रोशनी बल्ब या मोमबत्ती से नहीं
सूरज की आग से पैदा होती है.