बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

काहे की जय हो ?

आज कल पूरा देश जय हो-जय हो की जय-जय कार में मदमस्त होकर पागलों की तरह झूम रहा है और ऑस्कर मिलने की खुशी में लोग-बाग़ फूल कर इतना कुप्पा हो रहे हैं कि सच की तरफ़ न तो ख़ुद देखना चाहतें हैं और दूसरों को देखने-सुनने दे रहे हैं। जश्न मनाने का शोर भाई लोगों ने इतना कनफोरवा कर रखा है कि जब तक कोई कुछ सोच-समझ पाए, तब तक स्लमडॉग मिलिनिअर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपना बिजनेस कर के खूब सारा पैसा यहाँ से बटोर लें जायें। और उनका यह कम खूब असं कर रहे हैं उदार पूंजीवाद और वैश्वीकरण की समर्थक इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया। जी हाँ, यह है बाजारवाद का नया रूप जो अबकी ऑस्कर की शक्ल में हमारे यहाँ आया है। चाहे वह स्लमडॉग मिलिनिअर को हांथों-हाथ उठाने का मसला हो या इस्माईल पिंकी को पुरस्कृत करने की बात हो।
इसमें कोई शक नहीं कि ए0 आर0 रहमान एक उच्चकोटि के संगीतकार हैं और गुलजार एक महान गीतकार। उनकी पहचान, प्रतिभा और कला किसी मठ, मंच व कुछ तथाकथित कला-पारखियों की स्वीकृति या प्रमाण-पत्र की मोहताज बिल्कुल नहीं है। उन्होंने दुनिया को अब तक एक से बढकर एक उत्कृष्ट फिल्मी और गैर फिल्मी रचनायें दी हैं। पर उनकी तरफ आज तक किसी पश्चिमी ज्ञानी-विशेषज्ञ का ध्यान क्यों नहीं गया था ? और उनको अब जिस गाने व धुन के लिए सम्मानित किया गया है, क्या वह वाकई उनकी एक सर्वश्रेष्ठ कृति है ? ऐसा तो शायद वे खुद भी नहीं मानते होंगे।
हमें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि उनको दिया गया यह सम्मान और उनकी प्रशंसा में गोरों द्वारा गाए गये ये तमाम गान यूँ ही स्वाभाविक या निस्वार्थ नहीं है। यह ढ़हते हुए विश्व-बाजार की मुनाफा आधारित उस स्वार्थी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत कभी सुस्मिता सेन या ऐशवर्या राय को दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की बनाकर भारत को एक बड़े बाजार और भारतीयों को शक्तिशाली उपभोक्ता समूह में बदलने की चालाक प्रक्रिया शुरू की गयी थी। इन सब से अन्जान हम तब भी गदगद हो कर कुलाँचे भरने लगे थे कि देखो आखिर दुनिया ने भारतीय सौंदर्य का लोहा मान ही लिया। हलाँकि ये दोनों (सुस्मिता और ऐशवर्या) वास्तविक भारतीय सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति और बहुत खूबसूरत हैं। पर कई बार बाजार अकूत मुनाफा कमाने की लालसा में कुछ मिडियाकर चेहरों को भी आसमान पर बिठा देता है। जैसा कि बाद के सालों में किया भी गया था। स्लमडॉग मिलिनियर के अति प्रचार-प्रसार के पीछे भी इसी धूर्तता का हाथ है। लेकिन हम यह सोच-सोच कर हवा में कुलांचे मार रहें हैं कि देखो आखिर उनको हमारे यहाँ की प्रतिभावों की सुध आ ही गयी। पर इसबार फर्क सिर्फ इतना है कि ऐशवर्या और सुस्मिता को सिर आँखो पर तब बैठाया गया था जब वैश्वीकरण और उदार पूँजी अपने उठान पर थी। और अब रहमान व गुलजार को हाथों हाथ इसलिए लिया जा रहा है, क्योंकि इस समय विश्व-बाजार बिलकुल मरने की कगार पर है।
अन्य तमाम उद्योगों की तरह हॉलीवुड का फिल्म उद्योग भी मृतप्राय है। और इसको तत्काल ऐसे ही किसी ऑक्सीजन की जरूरत है। जाहिर सी बात है कि रहमान, गुलजार व अनिल कपूर की सक्रिय भागीदारी से और भारत की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म को मिले हुए अवार्ड और आस्कर के लिए हुए नामिनेशन ने इसको इतनी चर्चा तो दिला ही दी है कि लाखों लोग खास करके भारतीय दशर्क फिल्म की तरफ अपने आप खिचें चले आयेंगे। और इसके गीत गानो की सीडी, डीवीडी और कैसेटस पूरी दुनिया में (भारत मे सबसे अधिक) आसानी से बिक जायेगें। इसमें कोई शक नहीं कि सलामडॉग मिलिनियर फिल्म का मुख्य उददेश्य सिर्फ और सिर्फ व्यापार करना है न कि उत्कृष्ट कलात्मक फिल्मों की कड़ी में एक और कृति जोड़ना। इस लिहाज से देखें तो डेनी बायल (निर्देशक) और क्रिश्चियन काल्सन (निर्माता) का मकसद आसानी से पूरा हो रहा है। यह एक कम बजट की कम लागत से बनी फिल्म है, जिसमें कथा लेखक से लेकर कलाकार और लोकेशन तक सब कुछ भारतीय है। और काफी सस्ता भी। दूसरे शब्दों में कहें तो कच्चा माल हमारा, कल-कारखाने व कामगार हमारे और उपभोक्ता भी हम और हमारा देश। क्या अब हालीवुड के फिल्म-उद्योग में इस तरह से आउट सोर्सिंग की शुरूआत नहीं है ? चर्चा तो इस बात की भी खूब हो रही है कि फिल्म के निर्माता और निर्देशक ने स्लम्स में रहने वाले बच्चों से मुफ्त मे काम कराकर उनका भरपूर आर्थिक शोषण किया है। अब अनिल कपूर और इरफान खान को उन के रेट के मुताबिक पारिश्रमिक दिया गया या नहीं, पर इस फिल्म में काम कर के वे अपने आपको काफी धन्य महसूस कर रहे है। और यही उनके लिए बहुत है।
भाई लोगों को खुशी इस बात की भी बहुत ज्यादे है कि भारतीयों को विदेश का कोई बड़ा पुरस्कार मिला है। और यह बड़े गर्व की बात है। यह हमारी मानसिकता को दर्शाता है। दरअसल हम आजाद तो हो गये है और हमारी आजादी ने साठ साल का लम्बा सफर भी पूरा कर लिया है, परन्तु हमारी मानसिकता अभी भी पूरी तरह से गुलाम बनी हुई है। इसी कारण हम मौका मिलते ही अंग्रेजी और अंग्रेजो के आगे न सिर्फ नतमस्तक हो जाते हैं, बल्कि इसमें अपनी शान भी समझते हैं। जब तक हमें कोई विदेशी स्वीकृति, पुरस्कार या सम्मान नहीं मिलता, हमें अपना जीवन या तमाम रचनात्मक उपलब्धियाँ अधूरी लगती हैं। और जब यह हमें मिलता है, तो हम अपने आप को रायबहादुर या जागीरदार जैसे खिताबों से पुनः नवाजा हुआ मानकर गर्व से सीना चौडा करने लगते, जैसा कि इस समय कर रहें हैं।
यह कोई जरूरी नहीं है कि किसी गोरी चमड़ी द्वारा बनायी गयी फिल्म या रचा हुआ साहित्य शानदार और अद्वितीय ही हो। हम जानतें हैं कि विदेशों में भी हर साल सैकड़ों कूडा फिल्में बनती हैं या बकवास साहित्य रचा जाता है। और अगर हॉलीवुड की फिल्मों के तकनीकी पक्ष को छोड़ दिया जाये, तो उनके फिल्मी लेखकों, निर्देशकों व कलाकारों की तुलना में हमारे यहाँ के कलाकार कहीं अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। बल्कि हमारे यहाँ की सोच, समझ और दृष्टि का स्तर इन विदेशियों से अधिक ऊँचा और मानवीय होता है। खासकर के इस देश की मिट्टी के दुख-दर्द को समझने और रचनाओं में उकेरने के संदर्भ में हमारी संवेदना अधिक सहज और तीव्र होती है। यदि इसी स्लमडॉग मिलिनियर फिल्म को किसी कुशल भारतीय निर्माता-निर्देशक ने बनाया होता, तो वह अधिक जीवंत व प्रभावशाली होती। पर क्या तब भी इस को इतनी ही तवज्जो दी जाती ? और तब भी क्या इसके लिए ऑस्कर में इतना ही धूम-धडाका किया जाता ?
अंत में मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस्माईलपिंकी को मिले ऑस्कर को भी इसी लिहाज से देखने और समझाने की जरूरत है। यह दोकुमेंट्री तो सीधे-सीधे स्माईल ट्रेन का प्रचार कर ने वाली फ़िल्म है। यह स्वयं सेवी संस्था भारत सहित कई विकासशील देशों में कटे-फटे होंठों-तालू का ऑपरेशन करवाती है। और अच्छे-अच्छे प्लास्टिक सर्जन्स का अपने तरीके से इस्तेमाल करती है। इस के कारण कई प्लास्टिक सर्जन तो अपनी सरकारी नौकरी को छोड़ कर इस्माईल ट्रेन पर सवार हो रहें हैं, क्योंकि यहाँ से उनको खूब सारा नाम और पैसा मिल रहा है। यह चिकित्सा के क्षेत्र का घातक बाजारवाद है।
अच्छा एक बात बताइए, हमें सम्मान मिल गया, पुरस्कार झटक लिया, प्रचार हो गया, हम गदगद हो लिए और हमारा जीवन धन्य हो गया, पर क्या इससे असल जिन्दगी के ज़मालों या की पिंकियों जिन्दगी बदल पायेगी ? ये स्लम्स और कटे-फटे तालू-होंठ जिन सामाजिक व आर्थिक कारणों से होतें हैं वे परिस्थितयां क्या बदल जायेंगी ?
(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

जी हाँ, नुकसान पहुँचा सकता है मोबाइल फोन

मोबाइल फोन आज हर आदमी की जरूरत बन गये हैं । बड़े-बूढे, जवान और बच्चे सभी इसका इस्तेमाल धड़ल्ले सेकर रहे हैं । एक अनुमान के अनुसार आज दुनिया भर में पचास करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल फोन के नियमितउपभोक्ता हैं। स्वाभाविक भी हैं इन्फार्मेशन तकनालोजी और दूर-संचार के इस दौर में यह आज की एक बड़ीआवश्यकता बन गयी हैं । इसके फायदे भी बहुत हैं। तुरत-फरत किसी को भी फोन करने सुनने की सुविधा। संदेशभेजने-पाने की सहूलियत। मनचाही आडियो-वीडियो रिकार्डिग। इन्टरनेट, सर्फिग और एफ0 एम0 रेडियो ! परहमें पता होना चाहिए की यह उच्च तकनीक वाला सुविधाजनक व उपयोगी मोबाइल फोन हमें काफी नुकसान भीपहुँचा सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना हैं कि मोबाइल फोन का अत्याधिक और लम्बे-लम्बे समय तक उपयोग स्वास्थय के लिए काफी हानिकारक हो सकता हैं । हाल ही में हुए कई शोधों से यह बात साबित हुई है कि कम उम्र के बच्चों और युवाओं द्वारा मोबाइल फोन के अंधाधुंध इस्तेमाल से उनको भविष्य में मिरगी, ह्रदय रोग, ब्रेन ट्यूमर, नपुंसकता, कैंसर और अल्झेमर जैसी कई खतरनाक बीमारियाँ हो सकती हैं। दरअसल, मोबाइल फोन से ''नॉन-आयोनाइजिंग'' विकिरण उत्सर्जित होता है, जिसे ''मोइक्रोवेब रेडियशन'' कहा जाता हैं । आज दुनिया भर के वैज्ञानिक और विकिरण विशेषज्ञ इस बात से पूरी तरह से सहमत हैं कि इस ''नॉन-आयोनाइजिंग रेडियशन'' की अधिक और लगातार खुराक से मानव-शरीर की कोशिकाओं को काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती है।
अमेरिका वैज्ञानिकों डा0 हेनरी लेई और उनके सहयोगियों ने अपने कई अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकाला कि कम मात्रा का ''माइक्रोवेव रेडियशन'' भी चूहों के मस्तिष्क की कोशिकाओं के ''डी0 एन0 ए0'' अणुओं को विभाजित कर देता हैं । आज यह बात वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुकी है कि मस्तिष्क की कोशिकाओं के डी0 एन0 ए0 का इस तरह से विभाजन ''अल्झेमर'', ''पार्किन्सन'' और ''कैन्सर'' जैसी खतरनाक बीमारियाँ उत्पन्न कर सकता हैं ।
ब्रीस्टल रोयल इन्फर्मरी के डा0 एलेन प्रीस ने अपने लम्बे समय के अध्ययनों से यह पाया कि मोबाइल फोन से निकलने वाला विकिरण हमारे मस्तिष्क के कार्य करने की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित कर देता है। स्वीडन के नेशनल इन्स्तितुते ऑफ़ वर्किंग लाइफ के वैज्ञानिक डा0 जेल हेन्सन माइल्ड ने अपने वैज्ञानिक अनुसंधानो से यह निष्कर्ष निकाला कि मोबाइल फोन के नियमित उपभोक्ताओं को कुछ समय बाद सिरदर्द की शिकायत होने लगती है। उनकी शारीरिक थकान बढ़ जाती है। और कभी-कभी उनकी त्वचा में जलन और खुजली की शिकायत भी होने लगती हैं। यही नहीं आस्ट्रेलिया के डा0 माइकल रेपचोली, जो कि एडीलेड के रोंयल हॉस्पिटल के वरिष्ठ वैज्ञानिक चिकित्सक हैं, के अनुसार अगर मोबाइल फोन से निकलने वाले विकिरण की मात्रा चूहों को प्रतिदिन एक घंटे तक दी जाये तो उनको कैंसर उत्पन्न हो सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ मोबाइल फोन कम्पनियाँ इन दुष्प्रभावों को एक सिरे से नकार रही हैं। अभी हाल ही में जनरल ऑफ़ अमेरिकन मेडिकल एसोशियेशन और न्यू इंगलैंड जनरल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली विकिरण के ब्रेन ट्यूमर और कैंन्सर नहीं होता हैं। पर ध्यान देने वाली बात यह है कि कई बार ब्रेन ट्यूमर धीरे-धीरे बढ़ता है। उपरोक्त रिपोर्ट को तैयार करते समय 1982 से 1995 के अध्ययनों को आधार बनाया गया है । और तब की अवधि में मोबाइल फोन का इस्तेमाल इतना अधिक नहीं होता था तथा मोबाइल फोन इतने भारी और साथ रखने के लिहाज से काफी असुविधाजनक होते थे, इसलिए लोग इनका प्रयोग आज की तुलना में बहुत कम ही करते थे।
कहीं ऐसा तो नहीं कि इस रिपोर्ट का आधार कोई ऐसा अध्ययन हो, जिसे मोबाइल कम्पनियों ने ही ''स्पाॅन्सर'' किया हो ? दुनिया भर के वैज्ञानिक और चिकित्सा विशेषयज्ञों के गले से यह रिपोर्ट नीचे नहीं उतर रही है। उनका कहना है कि इसी तरह अतीत में सिगरेट बनाने वाली कम्पनियां भी अपने कुछ वैज्ञानिकों के माध्यम से यह दावे करवाती रहीं है कि सिगरेट पीने और तम्बाकू के सेवन से कोई नुकसान नहीं होता है। परन्तु आज यह पूरी तरह से साबित हो गया है कि सिगरेट पीन से न सिर्फ स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है, बल्कि कैंसर रोग और हृदय रोग भी हो सकता हैं। कहीं मोबाइल फोन को लेकर भी यही सब कुछ तो नहीं किया जा रहा हैं ।
प्रोफेसर रोस एन्डे जैसे जीवविज्ञानी, जिन्होंने विकिरण के दुष्प्रभावों पर काफी अध्ययन किया है और ब्रिस्टन यूनिवर्सिटी के डा0 रोज़र कागहिल जैसे वैज्ञानिकों द्वारा निकाले गये निष्कर्षो के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली माइक्रोवेब विकिरण की मात्रा से मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रर्याप्त ऊष्मा की खुराक मिलती है, जिससे उनमें रक्त संचार बढ़ जाता है। और उनकी प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया पर फर्क पड़ता हैं। इसके अलावा यह विकिरण मानव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी नुकसान पहुंचता है। मस्तिष्क की एकाग्रता और चैंकन्नेपर को बाधित करता है तथा स्मरण शक्ति को प्रभावित करता है। और अगर मस्तिष्क की कोशिकाओं को इस विकिरण की लगातार और अधिक मात्रा मिलती रही तो ब्रेन ट्यूमर भी हो सकता है।
इन निष्कर्षो को ध्यान में रखते हुए डा0 कागहिल कहते हैं कि अगर मोबाइल फोन से निकलने वाली विकिरण की खुराक पन्द्रह से बीस मिनट प्रतिदिन ही सीमित रहती है, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अगर यही खुराक आधे घंटे से लेकर सात-आठ घंटे रोज मिलती है, तो कनपटी के नीचे तेज दर्द, टीसने वाला सिर दर्द, थकान, रक्तकणों व शरीर की प्रतिरोधक शक्ति में गिरावट और मस्तिष्क की कार्य क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो सकती है। यही नहीं, मोबाइल फोन का घंटो इस्तेमाल करते रहने से मिरगी, ब्लडप्रेशर और नपुंसकता जैसी बीमारियों के होने की संभावना भी बढ़ जाती है। हाल ही में हुए कुछ नवीनतम शोधों के अनुसार अत्याधिक प्रयोग करने वाले ऐसे पुरूष मोबाइल धारको, जो मोबाइल फोन को अपनी कमर से लटकाकर रखते है, के शुक्राणुओं में चैंकाने वाली कमी पाई गयी, जो कि आठ से दस वर्षो के बाद स्थायी नपुंसकता में बदल जाती है।
हाँलाकि ''नेशनल रेडियेशन प्रोटेक्शन बोर्ड'' और इन्टरनेशनल फॉर रेडियेशन प्रोटेक्शन (नॉन आयोनाइजिंग) ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मोबाइल फोन की डिजाइन, बनावट और इनको बाजार में उतारने से पहले उनकी गुणवत्ता-परीक्षण आदि के लिए कई मानदंड व दिशा-निर्देश निर्धारित किये हैं । परन्तु दिन-प्रतिदिन पूरे विश्व में मोबाइल फोन की बढ़ती हुई संख्या और उनकी व्यवसायिक माँग को देखते हुए क्या सभी मोबाइल कम्पनियाँ वाकई इन मानकों का पालन करती होगी ? दुनिया भर के वैज्ञानिक तो अब यह भी माँग करने लगे है कि मोबाइल फोन पर भी सिगरेट के पैकेट की तरह स्वास्थ्य संबन्धी वैज्ञानिक चेतावनी लिखी जानी चाहिए, ताकि मोबाइल फोन धारक सोच-समझ कर इनका इस्तेमाल कर सकें।
मोबाइल फोन के दुष्प्रभाव सम्बन्धी तर्क-विर्तक चालू हैं । और आगे भी इसके पक्ष और विपक्ष में दलीलें दी जाती रहेंगी । फिर भी, इतना तो तय है कि हमें मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते समय कुद सावधनियां अवश्य बरतनी चाहिये । हमें मोबाइल फोन का अधिक और लगातार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ''माइक्रोशील्ड्स'' का प्रयोग करना चाहिये। फोन को सिर के कुछ सेन्टीमीटर दूर रखना चाहिए और जहां तक सम्भव हो सके ''हैन्ड फ्री यूनिटस'' का इस्तेमाल करना चाहिये। बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मोबाइल फोन के इस्तेमाल से बचना चाहिये, क्योंकि यह विकिरण और गर्भस्थ शिशु को अत्याधिक नुकसान पहुॅचाता है। ''ईयर पीस'' आदि का प्रयोग तो और भी नुकसानदायक होता है, क्योंकि यह विकिरण को सीधे मिस्तिष्क में पहुंचता है। जहां तक संभव हो सके अच्छी क्वालिटी का मोबाइल फोन ही इस्तेमाल करना चाहिए।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अगर हम समझदारी के साथ और सावधानी पूर्वक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करें, तो इसके संभावित दुष्प्रभावों से बच सकते हैं ।
(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)

रविवार, 22 फ़रवरी 2009

यह सिर्फ़ ननों की व्यथा-कथा नहीं है

इन दिनों सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा ने सिर्फ़ केरल को ही नहीं, कैथोलिक-चर्च की समूची दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। पुस्तक विवादस्पद एवं चर्चित हो कर हांथों-हाथ बिक रही है और इसके प्रकाशक को कुछ ही हफ्तों के अन्दर इस विस्फोटक आत्मकथा का (२५०० नयी प्रतियों के साथ) तीसरा संस्करण छापना पड़ गया है। लोगों में इस किताब को लेकर काफी उत्सुकता है। क्योंकि इस आत्मकथा में सिस्टर जेस्मी ने अपनी आपबीती के माध्यम से कैथोलिक चर्चों में चलने वाले अनेकों गोरख-धंधों, ननों के यौन-शोषण और पादरियों के बीच निरंतर चलने वाले सत्ता-संघर्ष सहित उन तमाम काले-अंधियारे पक्षों को बड़ी बेबाकी व बहादुरी से उजागर किया है, जिन पर चर्च के बाहर बात-चीत करना वर्जित ही नहीं पाप भी माना जाता है। दुनिया का हर धर्म वैसे भी किसी भी प्रकार के तर्क-वितर्क,बहस-मुबाहिसा और आरोप-प्रत्यारोप की इजाजत नहीं देता है।
सिस्टर जेस्मी ने लिखा है कि केरल के चर्चों में ननों का सिर्फ़ यौन-शोषण ही नहीं किया जाता, उन्हें हर तरह से प्रताड़ित भी किया जाता है। पादरी न सिर्फ़ ननों को मन बहलाव व उपभोग की चीज़ समझ कर उनका यौन-शोषण करते हैं, बल्कि चर्च के बंद कमरों में समलैंगिक सम्बन्ध भी बनाते हैं। वे सदैव सत्ता-शक्ति की तिकड़म बाजी में घटिया राजनीति करने में लिप्त रहते हैं। यही नहीं, चर्च की ऊँचीं-ऊँची दीवारों के पीछे स्वयं ननों के बीच भी समलैंगिक संबंधों की भरमार है। यह बड़े संयोग की बात है कि यह पुस्तक ऐसे समय में आयी है जब कि सिस्टर अभया हत्याकांड एवं अनूप मैरी की आत्महत्या के सन्दर्भ में दो ननों की गिरफ्तारी हुयी है और चर्च कई तरह के विवादों से घिरा हुआ है। सिस्टर जेस्मी ने अपनी कहानी के माध्यम से उन तमाम ननों की व्यथा-कथा को उजागर किया है जो आज पूजा के पवित्र-संस्थानों में फंसी छटपटा रही हैं। पर बाहर न निकल पाने के की मजबूरी के कारण वहीं जीने के लिए हैं। ख़ुद सिस्टर जेस्मी ने भी यह सब कुछ ३० वर्षों तक लगातार झेला है।
उनकी कहानी इसलिए भी प्रमाणिक एवं विश्वसनीय लगती है, क्योंकि अभी हाल ही में हुए एक अध्ययन से भी यह खुलासा हुआ है कि चर्चों या कांवेंट्स के जीवन से २५% ननों का मन बेहद दुखी है और वे असंतुष्ट जीवन जी रहीं हैं। अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर व त्रिचुर में चर्च द्वारा संचालित एक कोलेज की प्रिंसिपल रहीं सिस्टर जेस्मी भी नन के रूप में बिताये गए अपने जीवन को बेहद तकलीफदेह और संघर्ष पूर्ण मानती हैं। और कहती हैं कि '' मैं जिस भयावह अनुभवों से गुज़रीं हूँ, उसका बोझ उतारना मेरे लिए बहुत जरूरी था। ननों के साथ क्या होता है, यह जानने का हक पूरे समाज को है।'' सिस्टर जेस्मी ने बहुत कम उम्र में ही अपने आप को धर्म के हवाले कर दिया था, पर अंततः उनको घोर निराशा ही हाथ लगी। इसलिए ३० साल तक इस ज़लालत की ज़िंदगी को जीने के बाद उन्होंने पिछले साल चर्च की ज़िंदगी से तौबा कर लिया था।
पर क्या यह सिर्फ़ सिस्टर जेस्मी की व्यथा की कहानी है ? या यह सिर्फ़ कैथोलिक चर्चों के अन्दर व्याप्त अंधेरों का चित्रण भर है? या क्या यह सब कुछ केवल ईसाई धर्म की चौहद्दी में होता है ? क्या सिस्टर जेस्मी द्वारा वर्णित ननों के हालात दक्क्षिण के मंदिरों की देवदासियों की दर्द भरी ज़िंदगी जैसे नहीं है ? क्या तमाम मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, मठों-पीठों की चाहर दीवारी में यही सब कुछ नही होता है ? अन्याय, अत्याचार, शोषण, यौन-शोषण और संपत्ति-सत्ता के लिए संघर्ष। और कभी-कभी तो खूनी संघर्ष भी ! कौन आज सीना ठोक कर यह कह सकता है कि यह सब कुछ दूसरों के यहाँ होता है, हमारे धार्मिक संस्थानों में नहीं ? दरअसल, यही है वर्त्तमान में महिलाओं की वास्तविक स्थितिसिर्फ़ घर, परिवार, समाज और अफ्फिस-कार्यालय में ही नहीं, धर्म की दीवारों भीतर भी महिलाएं सिर्फ़ गुलाम, भोग्या और ताड़ना की अधिकारी होती हैंपर सिस्टर जेस्मी जैसी हिम्मत कोई कभी-कभी ही दिखाता है ?
(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)