शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

चलो आखिर इरोम शर्मीला की सुध तो आयी...

इस देश में कितना अजीब और खतरनाक सा चलन चल पड़ा है कि उसी अनशन को अनशन माना जाता है जिसके सिर पर मीडिया खास करके इलेक्ट्रानिक मीडिया अपना वरदहस्त रख देता है ? वरना वह सत्याग्रह नहीं दुराग्रह या आत्महत्या की कोशिश है मीडिया ने जहाँ अन्ना हजारे को रातों-रात पूरे देश के लिए एक आंधी बना कर गांधी या भगत सिंह बना दिया और अंततः सरकार को काफी हद तक झुकने के लिए मज़बूर कर दिया कारोबारी बाबा रामदेव को भी एक महान संत, भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाला सन्यासी और क्रांतिकारी बना कर अन्ना के कद को काफी हद तक छोटा करने की पुरजोर कोशिश की और उनके खाते पीते अघाए भक्तों को भ्रष्टाचार से लड़ने वाले कटिबद्ध लोगों के रूप में चित्रित करने का भरपूर प्रयास किया तथा उनके और उनके जमावड़े के खिलाफ की गयी पुलिसिया कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या तक की संज्ञा दे डाली। वहीं केवल बिकने वाली चीज़ों को दिखाने और पढ़ाने वाले समूचे मीडियातंत्र को न तो गंगा की पवित्रता के लिए खनन माफियाओं के खिलाफ निरंतर अनशन करने वाले संत निगमानंद की चिंता हुयी और न ही मणिपुर के सशस्त्र सेना विशेषाधिकार क़ानून के खिलाफ पिछले लगभग ग्यारह साल से लगातार अन्न व जल का त्याग किये बैठी इरोम शर्मीला कहीं से कोई खबर बन पायीं। जहाँ निगमानन्द ने लगातार ६८ दिनों के उपवास के बाद चुप-चाप अपने प्राण त्याग दिए वहीं इरोम की हालत भी कम नाजुक नहीं है। वर्ष २००६ से ही सरकार उनको इम्फाल के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में पुलिस हिरासत में एक अपराधी की तरह रख कर और जबरन नाक के ज़रिये तरल पदार्थ दे-दे कर किसी तरह जीवित रखे हुए है। देखने में दुबली पतली पर अपने लौह विचारो की ताकत से लैस इरोम का पूरी दुनिया के राजनीतिक विरोधों के इतिहास में कोई सानी नहीं है। वे पिछले ११ वर्षों से सत्याग्रह पर है। इसके चलते वे दो विश्व रिकार्ड बना चुकी हैं। सबसे अधिक दिनों तक भूख हड़ताल करने का और सबसे ज्यादा बार जेल जाकर रिहा होने का। अदालत उन्हें बार-बार रिहा कर देती है। पर रिहा होते ही वे फिर से अनशन पर बैठ जाती हैं।
मणिपुर व अधिकांश पूर्वोत्तर राज्यों में ११ सितम्बर १९५८ से थोपे गए सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के विरोध में इरोम ने ४ नवम्बर २००० को अपना सत्याग्रह शुरू किया था। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून ( ए ऍफ़ एस पी ए ) एक अति-अमानवीय कानून है। इससे अशांत घोषित क्षेत्रों में सशस्त्र बालों को विशेष शक्तियां प्राप्त होतीं हैं। इस एक्ट के आधार पर सेना केवल शक के आधार पर ही किसी भी व्यक्ति को, कि वह अपराध करने वाला है या अपराध कर चुका है, गिरफ्तार कर सकती है या बिना सवाल-जवाब किये गोली मार सकती है। इसी की आड़ में सुरक्षा बलों ने मणिपुर में अब तक हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। मानवाधिकार के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ २००९ में ही ३०० लोगों का क़त्ल कर दिया गया था। यही नहीं, इस कानून की आड़ में पूर्वोत्तर राज्यों में हत्या, बलात्कार, टार्चर, गायब कर देने और गलत गिरफ्तारियों की भरमार हो गयी है। जिससे प्रतिक्रिया स्वरुप वहां नित नए-नए उग्रवादी संगठनों के लिए ज़मीन तैयार हो रही है। इस कानून को लागू करते समय जहाँ मणिपुर में ४ उग्रवादी संगठन थे, वहीं अब ४० हो गए हैं।
इरोम का अनशन कहीं से भी राजनीतिक नहीं है। वे मूलतः एक कवि हैं और उनका यह सत्याग्रह पूरी तरह से मानवीय आधार पर है, जो कि अपने आसपास निरंतर होने वाले हिंसा व मौत के तांडव को देख-देख कर संवेदना की स्वाभाविक प्रतिक्रिया स्वरुप उपजा है। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि इस सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को मणिपुर से हटाया जाय। फिर भी राज्य और केंद्र की सारी शक्तियां इस आन्दोलन का दमन करने पर तुली हुयी और एकजुट हैं। ६ साल तक मणिपुर में अनशन करने के बाद इरोम शर्मीला को लगा कि दिल्ली में बैठे रहनुमाओं तक उनके मौन सत्याग्रह की आवाज़ शायद दूरी की वजह से नहीं पहुँच पा रही है। इसीलिये उन्होंने ३ अक्टूबर २००६ को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना डेरा डाल दिया। लेकिन यहाँ पुलिस ने उनको आत्महत्या का प्रयास करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। और इम्फाल के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के एक गंदे से कमरे में दाल दिया। यहाँ अब वे एक कैदी की तरह बंद हैं। यहाँ उनके भाई के अलावा और किसी को भी उनसे मिलने की इज़ाज़त नहीं है। माँ तो अब उनसे मिलने इसलिए भी नहीं आतीं कि मिलने से भावुकता बढ़ेगी। और इरोम कमज़ोर पड़ जायेंगी।
२००४ में प्रधानमंत्री की ओर से इस कानून की समीक्षा के लिए गठित जस्टिस रेड्डी समिति ने इस एक्ट को ख़त्म करने की सिफारिश की थी। स्वं प्रधानमंत्री इस कानून को बदल कर इसे मानवीय स्वरुप देना चाहते हैं। पर तब तत्कालीन रक्षामंत्री प्रणव मुखर्जी ने इसे सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब सुना है कि सरकार इस कानून पर दुबारा विचार करने को तैयार हो गयी है। और बात-चीत के ज़रिये इरोम की भूख हड़ताल तुडवाने की दिशा में सार्थक पहल कर रही है।
शायद इसे अन्ना हजारे के आन्दोलन का असर ही कहा जायेगा। वैसे भी अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ के आन्दोलन में इरोम शर्मीला से जुड़े संगठन "जस्ट पीस फौन्डेशन" ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उन्होंने शर्मिला की तरफ से अन्ना को मणिपुर आने का न्योता भी दिया है। और संगठन का कहना है कि अन्ना इस के लिए तैयार हो गए हैं। अब देखिये आगे क्या होता है, पर यह एक सच है कि मीडिया की उपेक्षा के कारण यह समूचा देश इरोम के इस सत्याग्रह का सम्मान करने में पूरी तरह से असफल रहा है। जबकि पूरी दुनिया में उनको सम्मान की निगाह से देखा जाता है। २००६ में नोबल पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान इरोम के सत्याग्रह को अपना पुरजोर नैतिक समर्थन दिया था। और कहा था कि अगर इरोम शर्मिला मरती हैं तो इसके लिए भारत सरकार पूरी तरह से ज़िम्मेदार होगीइरोम को और अधिक जानने के लिए देखें...
(चित्र डब्ल्यू-आई आर जी डोट ओ आर जी से साभार)

सोमवार, 29 अगस्त 2011

क्या आप जने फोंडा को जानते हैं?

आज कल जने फोंडा एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं। पर इस बार अपने किसी बयान या विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं, अपनी सुन्दर, जवाँ और सेक्सी काया के कारण। अभी हाल में ही उनकी कुछ तस्वीरें जारी की गयी हैं। इन तस्वीरों को देख कर यह ज़रा भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि उनकी उम्र ७३ साल की है और वे दो प्रौढ़ व्यक्तियों की माँ हैं। इन तस्वीरों में दिखने वाली उनकी फीगर के हिसाब से वे हद से हद ३०-४० साल की महिला लग रही हैं, जिसको देख कर दुनिया का कोई भी पुरुष जहाँ झटके खा सकता है वहीं महिलायें ईर्ष्या से भर सकती है। और यह वाकई गौर करने वाली बात है। और सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि एक ज़माने की यह अमेरिकन एक्ट्रेस अपने उम्र के इस पड़ाव पर भी आज कल स्वास्थ्य एवं फैशन गुरु के रूप में काफी चर्चित एवं सक्रिय है।
जाने फोंडा का जन्म २१ दिसंबर १९३७ में हुआ था और उनका पूरा नाम लेडी जीने सेयमौर फोंडा है। अपने कर्रिएर की शुरुआत एक फैशन मोडल और फ़िल्मी एक्ट्रेस के रूप में करने वाली जने एक लेखक और राजनीतिक एक्टिविस्ट के रूप में भी काफी चर्चित रही हैं। एक एक्ट्रेस के रूप में उनको प्रसिद्धि लगभग १९६० के आस-पास मिलनी शुरू हुयी जब दर्शकों में उनकी "बर्बरेला"और "कैट बल्लोऊ" जैसी फ़िल्में हिट हो गयीं। जने को दो बार अकेडमी अवार्ड और कई एक फ़िल्मी अवार्ड मिल चुके हैं। और अपने ५० सालों के फ़िल्मी कर्रिएर में वे कई-कई बार पुरस्कारों के लिए नामांकित भी हो चुकी हैं। उनकी अन्य चर्चित फ़िल्में हैं "जूलिया" और "कमिंग होम"। १९९० के आसपास उन्होंने फिल्मों से लगभग सन्यास ले लिया। और सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने लगीं। १९८२ से १९९५ के बीच उन्होंने अपने कई स्वास्थ्य-वीडिओ रिलीज़ किये और कईयों में लीडिंग भूमिका भी निभायी। अपने पंद्रह वर्षों के फ़िल्मी सन्यास के बाद वे फिर से २००५ में "मोंस्टर इन ला " जैसी सशक्त फिल्म से वापस हुईं। और २००७ में "जॉर्जिया रूल" में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस बीच २००६ में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुयी, जो न सिर्फ एक चर्चित बल्कि एक विवादस्पद किताब भी साबित हुयी। और अभी पिछले साल २०१० में उनका एक नया स्वास्थ्य विडियो लॉन्च और खूब पसंद किया गया है
जने अपने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के लिए भी खूब जानी जाती हैं। खास कर के वियतनाम के खिलाफ युद्ध और ईराक के ऊपर किये गए हमलों का सक्रिय विरोध-प्रदर्शन करने के कारण। यही नहीं,पूरी दुनिया में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और हिंसा का वे पुरजोर विरोध करती हैं। और इसके लिए उन्होंने रोबिन मोर्गन और ग्लोरिया स्टेनेम के साथ मिलकर २००५ में "विमेंस मीडिया सेंटर "की स्थापना भी की है। वे अपने आपको लिबरल और फेमिनिस्ट मानती हैं। और आज काल स्वास्थ्य और फिटनेस गुरु के रूप में पूरी दुनिया को शिक्षित-प्रशिक्षित कर रही हैं। देखें उनका अपना ब्लॉग
(चित्र न्यूज़ सोर्स डोट काम से साभार)