बुधवार, 20 जुलाई 2011

हाँ, सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान से जीने का हक मिलना चाहिये

बहुत लोगों को यह् बात बहुत नागवार लग सकती है.वो नाक भौं सिकोडते हुये पागलपन की हद तक आग बबूला हो सकते है.यह भी हो सकता है कि भारतीय संस्क्रिति के कुछ स्वम्भू ठेकेदार इस बात पर इतना भड़क उठें कि सडकों पर उतर कर तोड़-फोड़ करने लगें. और शायद यह भी हो जाये कि देश के किसी दूर-दराज़ के गाँव की किसी पन्चायत में आनन फ़ानन में इस के खिलाफ़ कोई फ़तवा भी जारी कर दिया जाये. पर हमारे संविधान के अनुसार इस देश के हर इन्सान को सम्मान से जीने का अधिकार है.फ़िर सेक्स वर्कर्स को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिये?...
यह् बात मैं नहीं इस देश का सर्वोच्च न्ययालय कह रहा है. जी हां, सुप्रीम कोर्ट सेक्स वर्कर्स को सम्मान के साथ उन्हें अपना पेशा चलाने के लिए 'माकूल हालात' पैदा करने की तैयारी में है. आ ई बी एन 7 की ताज़ा खबर के अनुसार---सुप्रीम कोर्ट मनाता है कि सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान से जीने का हक मिलना चाहिये.
परन्तु जिस देश मे लडकियों को गर्भ में ही मार दिया जाता हो,उनके साथ हर कदम पर भेदभाव किया जाता हो,उनको या तो गुलाम या भोग्या या बिकाऊ जिंस समझा जाता हो, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता हो और दहेज के नाम पर या झूठे सम्मान के नाम पर जिनको ज़िन्दा जला दिया जाता हो उस देश में क्या वाकयी यह कानून आसानी से बन पायेगा या बनने दिया जयेगा?..संसद और विधानसभा में महिलाओं की बराबर की भागीदारी का कानून तो अभी तक अधर में ही लटका हुआ है.पता नहीं कभी बन भी पयेगा या नहीं? सामंती,रूढीवादी,पिछडी हुई...पुनर्रुत्थान वादी और बाज़ार की ताकतें क्या कभी इस कानून को बनने देंगी? क्या उनके गले से यह बात कभी नीचे उतर पायेगी कि महिलायें इस देश में सिर्फ़ अपनी बदौलत स्वतन्त्रतापूर्वक सम्मान के साथ जी सकें. और उनकी देह पर सिर्फ सिर्फ उनका अधिकार हो.
( चित्र 'साइट्स डाट गूगल डाट कोम' से साभार )

रविवार, 17 जुलाई 2011

बाबा व्यापार करने के साथ सत्ता में हिस्सेदारी भी चाहते हैं...दो

लेकिन बाज़ार पर कब्ज़ा करने और सत्ता में हिस्सेदारी के लिये जिन ज़रूरी अवयवों की ज़रूरत होती है वह सब कुछ बाबा के पास बिल्कुल नहीं है. बल्कि सिरे से गायब है. आज के प्रतिस्पर्धा से भरपूर समय में बाज़ार में वही अपनी सही जगह बनाकर टिक पाता है जिसके उत्पाद गुणवत्ता और परिणाम दोनों में उत्तम होते हैं....और इस मामले में बाबा का हाँथ कत्तई तंग है.शुरू से ही उनके उत्पादों के बनाने के तौर तरीकों और उनमें मिलाये जाने वाले तत्वों पर सवाल खडे किये जाते रहे हैं. और सम्भवतः इन्हीं सब कारणों की वजह से एवं "गुड मैनुफ़ैक्चरिन्ग प्रैक्टिसेज" के अभाव से उनके उत्पाद अमेरिका सहित कई देशों में प्रतिबन्धित हैं.हमारे देश में भी उनके उत्पादों के दावों की कलई पूरी तरह से खुल चुकी है.
बाबा
दावा करते हैं कि उनके सिखाये योग और उनकी दवाइयों के नियमित सेवन से डायबिटीज, कैन्सर और हार्ट डिजीज जैसे असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं.परन्तु आँकडे बताते हैं कि बाबा की वजह से ना तो आज तक किसी का डायबिटीज ठीक हुआ है कैन्सर और ही किसी को उसके हार्ट डिजीज में कोई विशेष लाभ पहुँचा है.अपने हर योग शिविर में बाबा बडे उत्साह् से यह कहा करते हैं कि योग एवं उनकी तथाकथित जडी-बूटियों के सेवन से हर आदमी कम से कम सौ-डेढ सौ साल तक आसानी से जीवित रह सकता है.परन्तु अपने अनशन के चार-पाँच दिनों के अन्दर ही बाबा खुद लुढक गये और अपनी जान बचाने के लिये उनको उसी अस्पताल और उसी पद्धति की शरण में जाना पडा जिसकी वे हमेशा ही खिल्ली उडाया करते हैं. इस अनशन और उनके इतनी जल्दी अस्वस्थ होकर धाराशाई हो जाने के करण बाबा के योग,उनकी दवाईयों और उनके दावों पर एक गहरा धब्बा लग गया है,जिसको धोने में बाबा को अब वर्षों लग जयेंगे .
इसी
तरह सत्ता में हिस्सेदारी या राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिये जिन मूलभूत अवयवों की अवश्यकता होती है, बाबा उनमें भी पूरी तरह से शून्य हैं.उनके पास तो कोई संगठन है और ही कोई स्पष्ट विचारधारा.और ही उनके पास आन्दोलनों को चलाने या आन्दोलनों में शामिल होने कोई ठोस विशाल अनुभव है. हाँ,उनके पास शोहरत है और उनके पीछे है उनको चाहने वलों की एक लम्बी भीड.पर आखिर ये लोग हैं कौन ? थके-हारे,बीमार,अपने खोये हुये स्वास्थ्य को पुनः पाने के लिये जूझते लोग और कुछ छोटे-मोटे व्यापारी, अन्धी हिन्दूवादी विचारधारा के कुछ् छुटभैया नेता,सत्ता के कुछ दलाल और इस देश समाज को चलाने की गलतफ़हमी में जीने तथा अपने दोनों हाँथों से पैसा कमाने में जुटे कुछ चैनल्स और अखबार. लेकिन क्या इतने भर से सत्ता में हिस्सेदारी हो सकती है? या सत्ता पर कोई कारगर दबाव बनाया जा सकता है?...इसीलिये बाबा को मुहँ की खानी पडी. भ्रष्टाचार के बहाने सरकार के खिलाफ़ रणभेरी बजाने वाले बाबा रामदेव को अन्ततः महिलाओं के लिबास में रणछोड देव बनना पडा....
हाँ
, रामलीला मैदान में सरकार ने जो कुछ भी किया वह कत्तई गलत और अलोकतान्त्रिक था. और इसकी घोर निन्दा की जानी चाहिये. परन्तु कमजोर बिखरे विपक़्छ के कारण सरकार की कम और बाबा की किरकिरी अधिक हो गयी. और वे पूरे देश के सामने पूरी तरह से एक़्सपोज हो गये. अब तो उन पर और उनके सहयोगी सहित उनके ट्रष्ट पर खुद कई-एक आर्थिक घोटालों गैर कानूनी क्रित्यों में शामिल होने के आरोप लगने लगे हैं तथा सरकार को उनके ऊपर कानूनी शिकन्जा कसने का भरपूर मौका मिल रहा है. और उनकी अब तक की अर्जित सारी प्रतिश्ठा पर ग्रहण लगता जा रहा है.
बाबा
की नीयत अगर साफ़ होती तो वे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ की लडाई में आन्ना हज़ारे के साथ होते. अलग से अपनी दूकान नहीं चलाते. बाबा अभी भी हुँकारे भर रहे हैं. और उनके पीछे दौडने वाले चैनल्स उनको फ़िर से जोश दिलाना चाह रहे हैं.पर बाबा की आवाज़ में वो लरज गरज नही दिखाई पड रही ,जो पहले हुआ करती थी.और ही उनके पास इसका कोई जबाब है कि वे अन्ना से अलग रहकर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ क्यों लडना चाहते हैं? और लडेंगे भी तो किस तरह से?...खैर बाबा इस समय थके-हारे और पस्त हैं. ऊलजलूल बयान बाजियाँ करके अपनी भडास निकालते फ़िर रहे हैं. क्योंकि आज तक की तारीख में उनको तो माया मिली है राम.
(चित्र रिडिफ़ डाट काम से साभार)