मंगलवार, 16 अगस्त 2011

शेहला मसूद की हत्या एक शर्मनाक एवं कायर कृत्य है

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि हमारे देश में किसी सामाजिक कार्यकर्ता और खास करके किसी आर टी आई कार्यकर्ता पर जान लेवा हमला करके उसकी आवाज़ को जबरन दबाने का प्रयास किया गया हो। इतिहास हमें बताता है कि अन्याय, अत्याचार और शोषण पर आधारित हर देश और हर समाज में इस तरह की घटनाएँ आये दिन होती रहती हैं। पर शेहला मसूद की दिनदहाड़े की गयी हत्या कई मायनों में सिर्फ हमारे यहाँ की इस भ्रष्ट, मनुष्य विरोधी और अत्याचारी व्यवस्था के असली चरित्र को पूरी तरह से बेनकाब करती है, बल्कि उन तमाम लोगों की मुंदी हुयी आँखों को खोलने के लिए एक ज़बरदस्त झटका भी है, जिनको लगता है कि हमारा देश प्रगति कर रहा है, हमारी अर्थव्यवस्था कुछ ही दिनों में दुनिया में नंबर दो के पायदान पर पहुँच जायेगी और अब हम पूरी तरह से विकसित सभ्य हो गए हैं। शेहला मसूद की हत्या से बहुतों का यह भ्रम जाल तार-तार हो गया है।
इस कायरता पूर्ण घटना से पहली बात तो यह साबित होती है कि इस देश के आर्थिक,सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचे को चलाने वालों के पास सच को सुनने और उसको स्वीकार करने का साहस कत्तई नहीं है। वे अपने झूठ,लूट,फरेब और भ्रष्टाचार पर टिकी सत्ता को बचाने बरक़रार रखने के लिए बर्बरता की किसी भी हद तक जा सकते हैं। और दूसरी यह कि हमें आजादी या लोकतंत्र के नाम पर भले ही कई मौलिक अधिकार दे दिए गए हों, पर हकीकत में उन सभी पर इतनी बंदिशें और पाबंदियां लगी हुयी हैं कि हम चाह कर भी उन अधिकारों का बेधड़क स्वंत्रता पूर्वक पालन नहीं कर सकते। इस भ्रष्ट तंत्र ने आतंक, अपराध,गुंडागर्दी और दमन को इस तरह से अपनी ढाल या सुरक्षा कवच बना लिया है कि सच बोलना और सच के लिए लड़ना अब अपनी जान पर खेलने जैसा हो गया है।
शेहला मसूद को इसी बात की सज़ा मिली है। भाषा की खबर के अनुसार उनको मंगलवार (१६.०८.२०११) को उनके घर के ठीक बाहर गोली मार दी गई, जिसके चलते उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई। भोपाल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आदर्श कटियार ने यह स्पष्ट किया कि शेहला मसूद आज अपराह्न ११ बजे अपने कोहेफिजा स्थित अपने निवास से बाहर जाने के लिए कार में बैठ ही रही थीं कि तभी किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें गोली मार दी। उन्होंने यह भी बताया कि शेहला को गोली मारे जाने के कारणों के संबंध में सघन जांच की जा रही है तथा कातिल को पकडने के लिए चरों तरफ नाकेबंदी कर दी गई है। शेहला मसूद वन्यजीव संरक्षण के अलावा अन्य कई समाज सुधार संबंधी कामों से भी जुडी थीं। उन्हें राष्ट्रीय उद्यानों और टाइगर रिजर्ब्स में बाघों की मृत्यु संबंधी मुद्दे उठाने के लिए जाना जाता हैं। वह एक सक्रिय आर टी आई कार्यकर्ता थीं। और हाल ही में अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल पर भी बैठी थीं। उनकी हत्या के बाद पुलिस ने चारों तरफ नाके बंदी कर दी है, हत्यारों की बड़ी सरगर्मी से तलाश की जा रही है और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की मानें तो वे जल्दी ही पकड़ भी लिए जायेंगे।
पर क्या वाकई कभी वे पकडे जायेंगे ? पर क्या वाकई पुलिस या कानून के हाँथ कभी शेहला मसूद के उन वास्तविक दुश्मनों तक पहुँच पाएंगे जो उनके आर टी आई आन्दोलन के कारण या उनके वन्यजीव संरक्षण की मुहिम के चल्ते उनसे खुंदक रखते थे और उनके दुश्मन बन बैठे थे ?...और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या इस तरह की छिटपुट कायरतापूर्ण दमनात्मक कृत्यों के बल पर सच या हक की आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए कुचला जा सकता है ? पूरे विश्व के मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यह बताता है कि सच और हक की आवाज जब व्यापक जनता की आवाज बन जाती है तो बड़े से बड़े अत्याचारी अन्यायी लाखों जतन कर के भी उस आवाज का गला नहीं घोंट पाते बल्कि उस के शोर की आँधीं में खुद घुट जातें हैं ?
(चित्र स्क्रैच माई सोल डाट काम से साभार)