शनिवार, 11 जनवरी 2014

कहानी---कुत्ते


हाँ वे कुत्ते ही थे, अलग-अलग नस्ल, आकार-प्रकार और रंग के कुत्ते, जिन्होनें पूरे गाँव का जीना दूभर कर रखा था।
वे कहाँ से आये थे? कब आये थे? उन्हें यहाँ कौन लाया था? वे एक एक करके आये थे या कि झुण्ड में? वे यहाँ खुद आये थे या उन्हें कोई यहाँ छोड़ गया था? किसी को भी उनके बारे में कुछ भी नहीं मालूम था। मालूम था तो सिर्फ इतना कि सबसे पहले कुत्तों के इस गिरोह को शिवालय के पंडित रामानुज शास्त्री और मस्जिद के मौलवी हाजी समशुल अहमद ने देखा था।
वह ब्रह्म मुहूर्त की बेला थी। दोनों अपने-अपने घरों से निकल कर रोज़ की तरह इकट्ठे दिशा फिराकत को जा रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि ये कुत्ते मस्त होकर घोड़ों की तरह गाँव की गलियों में धमाचौकड़ी मचा रहे हैं। दोनों ने एक दूसरे को सवालिया निगाहों से देखा, मुस्कराए और बुदबुदाये---ये ससुरे कहाँ से आ गए?...ज़रूर रात में आये होंगे।
फ़ौरन से पेश्तर इन आगंतुक कुत्तों के लिए गाँव की पंचायत बुलाई गयी। और पंचों ने काफी सोच विचार का यह फैसला किया कि चूंकि ये कुत्ते रास्ता भटक कर यहाँ आ गए हैं। इसलिए इनको यहाँ चैन से रहने दिया जाय। इनको भगाने या इनको परेशान करने की कोई ज़रुरत नहीं है। जिस दिन इनको रास्ते या अपने ठिकाने की याद आ जायेगी ये खुद ब खुद यहाँ से चले जायेंगे। तब तक ये गाँव के मेहमान हैं। और इसी गाँव में ग्रामवासी बन कर रहेंगे। पंचों की राय, आम जनता की राय। और वो भी पंडित और मौलवी की सिफारिश पर। इसीलिये किसी ने कोई सवाल नहीं किया। पूरे गाँव ने चुपचाप यह मान लिया कि ये कुत्ते सिर्फ कुत्ते नहीं, गाँव के खास मेहमान हैं। और मेहमान तो खास ऊपर वाले का रूप होता है। फिर क्या था, देखते ही देखते वे कुत्ते गाँव के जीवन में पूरी तरह से रच बस गए।
मौज से खाते और गलियों की धूल उड़ाते हुए दिन रात मस्ती करते। बच्चों के साथ खेलते। उनको खुश करने के लिए तालाब से पकड़ पकड़ कर मछलियाँ लाते। बड़े-बूढों के साथ आगे-पीछे दौड़ कर खेतों की चौकसी करते। भौंक-भौंक कर चिड़ियों को उड़ाते। गाँव की लड़कियों-औरतों के साथ बैठ कर उनका कहा अनकहा दुःख-दर्द सुनते। और प्यार से कूँ-कूँ करते हुए उनकी गोद में लेट कर उनका मन हल्का करते। जो मिलता वह चुपचाप खा लेते। और दरवाजे पर बैठ कर दिन-रात चौकीदारी करते।
पर अचानक ही न जाने क्या हुआ कि कुत्तों ने अपना असली रंग दिखलाना शुरू कर दिया। एकदम कुत्तापनी पर उतर आये। हमेशा घर की चौखट के बाहर रहने वाले वे मेहमान अब घर और आँगन में भी बेधड़क घुसने लगे। रसोई में रखे हंडिया-बासन में मुंह डालते। कितना भी दूध, रोटी, अंडा, दाल और मांस-मछली दो ससुरों की क्षुधा कभी शांत ही नहीं होती। जब देखो तब खाना। महक लगती नहीं कि लार टपकाते हाज़िर हो जाते। कभी-कभी तो हद ही कर देते। अचानक ही दूर से दौड़ते हुए आते और सामने थाली में रखा हुआ खाना मुंह में दबा कर भाग जाते। यहाँ तक कि बच्चों को भी नहीं बख्शते। मौका पाते ही वे उनके हाँथ की रोटियां भी झपट्टा मार कर छीन लेते।
बात सिर्फ उनके भूख और लालच तक ही सीमित रहती तो लोग सब्र कर लेते। उनके बढ़ते हुए पेट की मांग को समझ कर गाँव वाले ज़रूर उनकी खुराक बढ़ा देते। पर उन्होंने तो अब चारों तरफ गन्दगी फैलाना भी शुरू कर दिया। पहले जब वे आये थे, तो गाँव के बाहर जाकर टट्टी पेशाब करते थे। और वो भी सिर्फ सुबह और शाम। पर अब न तो समय का ठिकाना रहा। न जगह का। उन्होंने गाँव की हर गली, हर चौपाल, दालान, घर-आँगन, खेत और खलिहान को ही अपना शौचालय बना लिया। और वो भी ऐसा वैसा नहीं छीछालेदरी वाला। गाँव में इतने बच्चे हुए। अब तो बच्चों के भी बच्चे हो गए। कई बार बच्चों ने भी खुले में इधर-उधर पैखाना किया था। पर किसी ने भी इस कदर गंध नहीं मचाई थी कि ठीक से कदम रख कर चलना ही मुश्किल हो जाये।
पर कुत्तों का यह झुण्ड इतने पर भी शांत नहीं हुआ। अब वह उद्दंड हो कर कूड़े और गोबर की खाद के ढेर में भी मुंह मारने लगा। जब देखो तब वे कूड़े के ढेर पर जा चढ़ते। और अपने अगले पंजों से ढेर को खोद-खोद कर सारी गन्दगी रास्तों पर उलीच कर रख देते। गहरे मुंह डाल कर गंदी और सड़ी हुयी चीजों को खोज निकालते। और खाने बैठ जाते। और एक-एक निवाले के लिए आपस में खांटी कुत्तों की तरह लड़ते, झगड़ते और झांय-झांय कर के गाँव वालों का राह चलना मुश्किल कर देते। शुरू-शुरू में तो गंदी चीज़ों का उनका यह भोज कार्यक्रम या तो कूड़े के ढ़ेर के पास चलता था या फिर खेतों के पास किसी पेड़ के नीचे या गली के मुहाने पर। लेकिन ज़ल्दी ही उनका यह सामूहिक भोज निहायत ही व्यग्तिगत भोजन में तब्दील हो गया। कुत्ते न जाने कहाँ से मरे हुए जानवर का कोई अंग या महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किये हुए खून से लथपथ कपड़े या मरी हुयी कोई चिड़िया ले आते। और किसी के घर में चारपाई के नीचे घुस कर बड़े चाव से चटकारे ले-ले कर खाते। इससे घरों में गन्दगी तो फैलती ही घर वाले भी बुरी तरह से घिना जाते। बच्चे और लड़कियां तो उल्टी कर-कर के बेदम हो जाते।
धीरे-धीरे कुत्तों और उनकी कुत्तापनी को लेकर गाँव वालों में रोष फैलने लगा। और हर शख्स यह चाहने लगा कि बहुत हो गयी खातिरदारी, अब तो इनको डंडे मार मार कर भगा देना चाहिए। और सबने मिल कर यह फैसला किया कि फ़ौरन पंचायत बुला कर इन कुत्तों को गाँव से बाहर खदेड़ने का अभियान चलाया जाए। नहीं तो, वह दिन दूर नहीं जब इनके कुत्तापनी के कारण गाँव में रहना मुहाल हो जायेगा। और अगर यही हाल रहा, तो ये जल्दी ही कटखन्ने भी हो जायेंगे। और तब एक-एक कर के सबको कुत्ता काटे की सूई लगवाने के लिए शहर के अस्पताल भागना पड़ेगा। पर इससे पहले कि गाँव की पंचायत बैठे और पंच परमेश्वर ग्राम हित में कोई फैसला लें, एक ऐसी घटना घटित हो गयी जिसके बारे में कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था।
उस दिन अलस्सुबह जब पंडित रामानुज और मौलवी समशुल इकट्ठे हंसते ठिठोली करते हुए दिशा फिराकत से लौटे, तो देखा कि कुत्ते तो हरमपन की सारी हदें पार कर चुके हैं कुछ कुत्ते तो मंदिर के प्रांगण में इत्मीनान से बैठ कर एक पवित्र जानवर के मांस का टुकड़ा खा रहे हैं और कुछ कुत्ते मस्जिद के आहाते में बैठ कर एक अपवित्र जानवर के गोश्त की बोटियाँ चबा रहे है फिर क्या था? क्रोध से उनकी भृकुटियाँ तन गयीं उन्होंने एक दूसरे को देखा मुस्कुराये कि नहीं, यह तो कोई नहीं देख पाया पर फ़ौरन ही गाँव की पंचायत बुलवाने का फैसला किया गया पर इस बार एक नहीं, दो अलग-अलग पंचायतें हुईं एक में आग उगला गया, तो दूसरे में धधकता लावा गांववालों की भावनाओं को इतना भड़काया गया कि लोग विवेकहीन हो गए किसी ने भी यह सोचने की कोशिश नहीं की कि आखिर इन कुत्तों के पास ये मांस के लोथड़े आये कहाँ से? और अगर ये सिर्फ टुकड़े हैं, तो बाकी समूचे जानवर गए कहाँ? कहाँ कटे? कौन इन्हें यहाँ लाया? और किसने उनको इन कुत्तों को दे दिया? सत्य की जानकारी या तो कुत्तों को थी या फिर उन मरे गए जानवरों को
पर उस दिन गाँव में एक ऐसी आग लगी जिसने सब कुछ जला कर राख कर दिया। लोग दरिंदें बन गए। एक दूसरे के जानी दुश्मन। खून के प्यासे। फिर क्या था? सदियों से चला आ रहा भाईचारा, रिश्ता और बंधनों का रेशमी ताना बाना पलक झपकते ही लूट-पाट, आगजनी, बलात्कार और लाशों के ढेर में तब्दील हो गया। और गाँव बन गया एक और नोवाखाली...एक और अमृतसर...एक और लाहौर...एक और भिवंडी...एक और मेरठ, गोधरा, भागलपुर और मुजफ्फरनगर!!
उस पूरी रात चाँद अपनी बेबसी पर छाती पीट-पीट कर रोया था। और अगले दिन का सूरज भी जब निकला तो पूरी तरह ग़मगीन और निस्तेज था। समूचे गाँव में अभी भी हर तरफ मातम पसरा हुआ था। खून के धब्बे। उजड़े हुए घरों से निकलता हुआ धुआं। और इंसानी जिस्मों के जलने की चिरांध। लेकिन कुत्ते नदारद थे। न तो वे दिशा फिराकत के लिए निकले पंडित और मौलवी को कहीं नज़र आये और न ही गाँव के बचे-खुचे जिंदा लोगों को। लेकिन वे गए कहाँ? और किस रास्ते से गए? वे खुद गए या कोई आकर उन्हें यहाँ से ले गया? न तो किसी ने कुछ देखा था और न ही इस बावत किसी को कुछ मालूम था।  
----अरविन्द कुमार      
(यह कहानी नव्लोक टाइम्स में 06.01.2014 को प्रकाशित हुयी है)