शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

ऐड्स के शोर में बढ़ रही हैं अन्य जानलेवा बीमारियाँ

आज पुरी दुनिया में एच आई वी और ऐड्स को लेकर जिस तरह का भय व्याप्त है और इसकी रोकथाम उन्मूलन के लिए जिस तरह के जोरदार अभियान चलाये जा रहे हैं , उससे कैंसर, हार्ट-डिजीज, टी बी और डायबिटीज़ जैसी खतरनाक बीमारियाँ लगातार उपेक्षित हो रही हैं और बेलगाम होकर लोगों पर अपना जानलेवा कहर बरपा रही हैं। पूरी दुनिया के आँकडों की मानें तो हर साल ऐड्स से मरने वालों की संख्या जहाँ हजारों में होती है , वहीं दूसरी घातक बीमारियों की चपेट आकर लाखों लोग अकाल ही मौत के मुँह में समां जाते हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अगर ह्रदय रोग, कैंसर, मधुमेह और क्षय-रोग से बचने के लिए लोगों को जागरूक या इनके उन्मूलन के लिए कारगर उपाय नही किए गए, तो अगले दस वर्षो में इन बीमारियों से लगभग पौने चार करोड़ लोगों की मौत हो सकती है

इस रिपोर्ट के अनुसार तमाम विकसित देशों ने इन बीमारियों के खतरों के प्रति व्यापक जागरूकता फैलाकर और इनसे बचाव के उपायों के लिए शिक्षा के अनेकों कार्यक्रमों को चलाकर, लोगों के खान-पान की आदतों और असामान्य असंयमित जीवन शैली को बदल कर एवं कुछ आसान सस्ते तरीकों को अपनाकर इन पर काफी हद तक काबू प् लिया है अब यहाँ इन बीमारियों से होने वाली मौतों में लगभग सत्तर प्रतिशत की कमी हो गयी हैपरन्तु विकासशील देशों में जहाँ निम्न मध्यम आय वर्ग के लोगों की बड़ी तादात है,गरीबी,भुखमरी कुपोषणहै, ह्रदय रोग,कैंसर,स्ट्रोक और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों का खतरा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा हैचीन, भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, ब्राजील, नाईजीरिया, इंडोनेशिया और तंजानिया जैसे देश आज मुख्य रूप से इन्हीं बीमारियों की चपेट में हैंऐड्स से मरने वालों की संख्या यहाँ काफी कम है

ख़ुद हमारे देश में भी १९८७ से लेकर अब तक ऐड्स से मरने वालों की संख्या जहाँ सिर्फ़ ग्यारह हज़ार थी, वहीं पिछले ही वर्ष केवल टी बी और कैंसर से छः लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो गयीपरन्तु सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तरों पर सिर्फ़ एच आई वी और ऐड्स की रोकथाम के लिए ही गंभीरता है और इसी के लिएअति सक्रिय कार्यक्रम चलाये जा रहे हैंसरकार भी अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च कर रही हैउदाहरण के लिए २००५-२००६ में जहाँ ऐड्स नियंत्रण पर ५०० करोड़ खर्च किए गए, वहीं टी बी उन्मूलन पर सिर्फ़ १८६ करोड़ और कैंसर नियंत्रण पर केवल ६९ करोड़ रुपये खर्च किए गए

शायद इसीलिये ऐड्स विरोधी चलाये जा रहे तमाम अभियानों से कई चिकित्सा विज्ञानी कत्तई सहमत नहीं हैंउनका यह मानना है की एच आई वी और ऐड्स से भी खतरनाक कैंसर और हार्ट-डिजीज होता हैऔर ऐड्स को लेकर पूरी दुनिया में जितना शोर मचाया जा रहा है, उतने तो इसके मरीज़ भी नहीं हैंफिर भी आज दुनिया भर के स्वास्थ्य के एजेंडे में ऐड्स ही मुख्य मुद्दा बना हुआ हैऔर इसकी रोकथाम के लिए करोड़ों डॉलर की धनराशि को पानी की तरह बहाया जा रहा हैयही नहीं, अब तो अधिकांश गैर सरकारी संगठन भी जन-सेवा के अन्य कार्यक्रमों को छोड़कर ऐड्स नियंत्रण अभियानों को ही चलाने में रूचि दिखा रहे हैंक्योंकि इसके लिए उनको आसानी से लाखों का अनुदान मिल जाता हैऔर इससे नाम और पैसा आराम से कमाया जा सकता हैकुछ वैज्ञानिकों का तो यह भी मानना है की एच आई वी ऐड्स के हौवे की आड़ में कंडोम बनाने वाली कम्पनियाँ भारी मुनाफा कमानेके लिए ही इन अभियानों को हवा दे रही हैंतभी तो,ऐड्स से बचाव के लिए सुरक्षित यौन संबंधों की सलाह तो खूब दी जाती है, पर संयम रखने या व्यभिचार करने की बात बिल्कुल नहीं की जाती हैयानि कि खूब यौनाचार करो पर कंडोम के साथ

पर कहने का मतलब यह नहीं है की ऐड्स की भयावहता के खिलाफ लोगों को जागरूक किया जाएएच आई वीऔर ऐड्स वाकई एक गंभीर बीमारी हैऔर इसकी रोकथाम के लिए जन-जागरण अभियान जरूर चलाया जाना चाहिए, पर अन्य जानलेवा बीमारियों की कीमत पर कत्तई नहींविश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है की थोड़े से प्रयासों एवं प्रयत्नों से ही हार्ट-डिजीज, डायबिटीज़, डेंगू और कैंसर से होने वाली मौतों में ६० से ८० प्रतिशत तक की कमी हो सकती हैइसलिए यह ज़रूरी है की विकसित देशों की तर्ज़ पर विकासशील देशों में भी सरकारी और गैर-सरकारी दोनों स्तर पर इन जानलेवा बीमारियों के कारणों,खतरों और इनकी रोक-थाम के उपायों की जानकारी देने वाले व्यापक कारगर कार्यक्रमों को चलाया जाएऐड्स-नियंत्रण की तरह, बल्कि उससे भी कहीं अधिक जोरदार,अभियानों को चला कर ही पूरी दुनिया को स्वस्थ एवं दीर्घजीवी बनाया जा सकता है

(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

कृष्णा सोबती जी, आपको जन्मदिन मुबारक हो !!

आज हिन्दी की मशहूर साहित्यकार कृष्णा सोबती जी का ८४ वाँ जन्मदिन है। उनको इसकी बहुत-बहुत बधाई। 'मित्रों मरजानी', 'जिंदगीनामा', 'ऐ लडकी', 'सूरजमुखी अंधेरों के' और 'दिल ओ दानिश' जैसी रचनाओं के माध्यम से मानवीय रिश्तों और स्त्री के व्यक्तित्व की जटिलताओं को बड़ी ही कुशलता से चित्रित पाठकों की चेतना को विकसित करने वाली कृष्णा जी को हिन्दी साहित्य जगत बहुत ही आदर की दृष्टि से देखता है। उनके उपन्यास 'जिंदगीनामा' के लिए उनको १९८० में न सिर्फ़ साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बल्कि १९९६ में उनको साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान 'साहित्य अकादमी फेलोशिप' से भी नवाजा गया था। इसके अलावा उनके अनूठे साहित्यिक योगदान के लिए उनको शिरोमणि पुरस्कार, शलाका पुरस्कार और व्यास सम्मान से सुशोभित किया गया है।
कृष्णा जी अपनी 'बोल्ड' और 'बिंदास' लेखनी के लिए जानी जाती है। उनके कथ्य और उसको प्रस्तुत करने की उनकी अनोखी शैली उन्हें तमाम साहित्यकारों की भीड़ से अलग करके एक ऊंचा स्थान प्रदान करती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में बड़ी ही कुशलता एवं साफगोई के साथ स्त्री-मन की गहराईयों व उसके व्यक्तित्य के अनछुए पहलुयों को जीवन्तता के साथ उकेरा है। उनका उपन्यास 'मित्रोमार्जनी' में तो बड़ी ही बेबाकी से एक शादी-शुदा महिला की 'सेक्सुअलिटी' का चित्रण किया गया है। १९६६ के साल में आए इस उपन्यास ने न सिर्फ़ हिन्दी साहित्य में एक जबरदस्त भूचाल ला दिया था, बल्कि इसने एक तरह से स्त्री-विमर्श के प्रति पुरूष-वादी सोच व मानसिकता को ध्वस्त भी कर दिया था। वैसे तो, कृष्णा जी कहीं से भी 'महिलावादी' यानि कि 'फेमिनिस्ट नहीं हैं, पर उनका मानना है कि स्त्री-विमर्श के तमाम शोर-शराबे में पुरुषवादी मानसिकता ही हावी रहती है। इस गंभीर मसले पर चहुँ ओर व्याप्त पुरुषवादी यह दृष्टिकोण हमेशा स्त्री-विमर्श को ग़लत दिशा में ले जाता है। ओर तब स्त्री अपनी सम्पूर्णता के बजाय सिर्फ़ एक सेक्स-सिम्बल में बदल कर रह जाती है।
कृष्णा जी न सिर्फ़ अपने लेखन में,बल्कि अपने जीवन में भी बिंदास और साफगों हैं। यह उनकी किताब 'हुम्हास्मत' साफ़-साफ़ देखा जा सकता है, जहाँ उन्होंने अपने समकालीन अन्य साहित्यकारों पर बेवाक ढंग से अपनी लेखनी चलायी है। 'राम मन्दिर विवाद' मसाले पर उनका मानना है कि अयोध्या की विवादस्पद भूमि पर एक ऐसा विश्वविद्यालय बना देना चाहिए, जहाँ हिंदू,मुस्लिम,सिख, बौद्ध व जैन सहित सम्पूर्ण भारतीय धर्म व दर्शन को पढाया जाय।...कृष्णा जी, आप जियें हजारों- हजारों साल इसी तरह बेवाक और सक्रिय।
(चित्र पिकासा वेब एल्बम से साभार)