बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

कृष्णा सोबती जी, आपको जन्मदिन मुबारक हो !!

आज हिन्दी की मशहूर साहित्यकार कृष्णा सोबती जी का ८४ वाँ जन्मदिन है। उनको इसकी बहुत-बहुत बधाई। 'मित्रों मरजानी', 'जिंदगीनामा', 'ऐ लडकी', 'सूरजमुखी अंधेरों के' और 'दिल ओ दानिश' जैसी रचनाओं के माध्यम से मानवीय रिश्तों और स्त्री के व्यक्तित्व की जटिलताओं को बड़ी ही कुशलता से चित्रित पाठकों की चेतना को विकसित करने वाली कृष्णा जी को हिन्दी साहित्य जगत बहुत ही आदर की दृष्टि से देखता है। उनके उपन्यास 'जिंदगीनामा' के लिए उनको १९८० में न सिर्फ़ साहित्य अकादमी के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बल्कि १९९६ में उनको साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान 'साहित्य अकादमी फेलोशिप' से भी नवाजा गया था। इसके अलावा उनके अनूठे साहित्यिक योगदान के लिए उनको शिरोमणि पुरस्कार, शलाका पुरस्कार और व्यास सम्मान से सुशोभित किया गया है।
कृष्णा जी अपनी 'बोल्ड' और 'बिंदास' लेखनी के लिए जानी जाती है। उनके कथ्य और उसको प्रस्तुत करने की उनकी अनोखी शैली उन्हें तमाम साहित्यकारों की भीड़ से अलग करके एक ऊंचा स्थान प्रदान करती है। उन्होंने अपनी रचनाओं में बड़ी ही कुशलता एवं साफगोई के साथ स्त्री-मन की गहराईयों व उसके व्यक्तित्य के अनछुए पहलुयों को जीवन्तता के साथ उकेरा है। उनका उपन्यास 'मित्रोमार्जनी' में तो बड़ी ही बेबाकी से एक शादी-शुदा महिला की 'सेक्सुअलिटी' का चित्रण किया गया है। १९६६ के साल में आए इस उपन्यास ने न सिर्फ़ हिन्दी साहित्य में एक जबरदस्त भूचाल ला दिया था, बल्कि इसने एक तरह से स्त्री-विमर्श के प्रति पुरूष-वादी सोच व मानसिकता को ध्वस्त भी कर दिया था। वैसे तो, कृष्णा जी कहीं से भी 'महिलावादी' यानि कि 'फेमिनिस्ट नहीं हैं, पर उनका मानना है कि स्त्री-विमर्श के तमाम शोर-शराबे में पुरुषवादी मानसिकता ही हावी रहती है। इस गंभीर मसले पर चहुँ ओर व्याप्त पुरुषवादी यह दृष्टिकोण हमेशा स्त्री-विमर्श को ग़लत दिशा में ले जाता है। ओर तब स्त्री अपनी सम्पूर्णता के बजाय सिर्फ़ एक सेक्स-सिम्बल में बदल कर रह जाती है।
कृष्णा जी न सिर्फ़ अपने लेखन में,बल्कि अपने जीवन में भी बिंदास और साफगों हैं। यह उनकी किताब 'हुम्हास्मत' साफ़-साफ़ देखा जा सकता है, जहाँ उन्होंने अपने समकालीन अन्य साहित्यकारों पर बेवाक ढंग से अपनी लेखनी चलायी है। 'राम मन्दिर विवाद' मसाले पर उनका मानना है कि अयोध्या की विवादस्पद भूमि पर एक ऐसा विश्वविद्यालय बना देना चाहिए, जहाँ हिंदू,मुस्लिम,सिख, बौद्ध व जैन सहित सम्पूर्ण भारतीय धर्म व दर्शन को पढाया जाय।...कृष्णा जी, आप जियें हजारों- हजारों साल इसी तरह बेवाक और सक्रिय।
(चित्र पिकासा वेब एल्बम से साभार)
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