रविवार, 22 फ़रवरी 2009

यह सिर्फ़ ननों की व्यथा-कथा नहीं है

इन दिनों सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा ने सिर्फ़ केरल को ही नहीं, कैथोलिक-चर्च की समूची दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। पुस्तक विवादस्पद एवं चर्चित हो कर हांथों-हाथ बिक रही है और इसके प्रकाशक को कुछ ही हफ्तों के अन्दर इस विस्फोटक आत्मकथा का (२५०० नयी प्रतियों के साथ) तीसरा संस्करण छापना पड़ गया है। लोगों में इस किताब को लेकर काफी उत्सुकता है। क्योंकि इस आत्मकथा में सिस्टर जेस्मी ने अपनी आपबीती के माध्यम से कैथोलिक चर्चों में चलने वाले अनेकों गोरख-धंधों, ननों के यौन-शोषण और पादरियों के बीच निरंतर चलने वाले सत्ता-संघर्ष सहित उन तमाम काले-अंधियारे पक्षों को बड़ी बेबाकी व बहादुरी से उजागर किया है, जिन पर चर्च के बाहर बात-चीत करना वर्जित ही नहीं पाप भी माना जाता है। दुनिया का हर धर्म वैसे भी किसी भी प्रकार के तर्क-वितर्क,बहस-मुबाहिसा और आरोप-प्रत्यारोप की इजाजत नहीं देता है।
सिस्टर जेस्मी ने लिखा है कि केरल के चर्चों में ननों का सिर्फ़ यौन-शोषण ही नहीं किया जाता, उन्हें हर तरह से प्रताड़ित भी किया जाता है। पादरी न सिर्फ़ ननों को मन बहलाव व उपभोग की चीज़ समझ कर उनका यौन-शोषण करते हैं, बल्कि चर्च के बंद कमरों में समलैंगिक सम्बन्ध भी बनाते हैं। वे सदैव सत्ता-शक्ति की तिकड़म बाजी में घटिया राजनीति करने में लिप्त रहते हैं। यही नहीं, चर्च की ऊँचीं-ऊँची दीवारों के पीछे स्वयं ननों के बीच भी समलैंगिक संबंधों की भरमार है। यह बड़े संयोग की बात है कि यह पुस्तक ऐसे समय में आयी है जब कि सिस्टर अभया हत्याकांड एवं अनूप मैरी की आत्महत्या के सन्दर्भ में दो ननों की गिरफ्तारी हुयी है और चर्च कई तरह के विवादों से घिरा हुआ है। सिस्टर जेस्मी ने अपनी कहानी के माध्यम से उन तमाम ननों की व्यथा-कथा को उजागर किया है जो आज पूजा के पवित्र-संस्थानों में फंसी छटपटा रही हैं। पर बाहर न निकल पाने के की मजबूरी के कारण वहीं जीने के लिए हैं। ख़ुद सिस्टर जेस्मी ने भी यह सब कुछ ३० वर्षों तक लगातार झेला है।
उनकी कहानी इसलिए भी प्रमाणिक एवं विश्वसनीय लगती है, क्योंकि अभी हाल ही में हुए एक अध्ययन से भी यह खुलासा हुआ है कि चर्चों या कांवेंट्स के जीवन से २५% ननों का मन बेहद दुखी है और वे असंतुष्ट जीवन जी रहीं हैं। अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर व त्रिचुर में चर्च द्वारा संचालित एक कोलेज की प्रिंसिपल रहीं सिस्टर जेस्मी भी नन के रूप में बिताये गए अपने जीवन को बेहद तकलीफदेह और संघर्ष पूर्ण मानती हैं। और कहती हैं कि '' मैं जिस भयावह अनुभवों से गुज़रीं हूँ, उसका बोझ उतारना मेरे लिए बहुत जरूरी था। ननों के साथ क्या होता है, यह जानने का हक पूरे समाज को है।'' सिस्टर जेस्मी ने बहुत कम उम्र में ही अपने आप को धर्म के हवाले कर दिया था, पर अंततः उनको घोर निराशा ही हाथ लगी। इसलिए ३० साल तक इस ज़लालत की ज़िंदगी को जीने के बाद उन्होंने पिछले साल चर्च की ज़िंदगी से तौबा कर लिया था।
पर क्या यह सिर्फ़ सिस्टर जेस्मी की व्यथा की कहानी है ? या यह सिर्फ़ कैथोलिक चर्चों के अन्दर व्याप्त अंधेरों का चित्रण भर है? या क्या यह सब कुछ केवल ईसाई धर्म की चौहद्दी में होता है ? क्या सिस्टर जेस्मी द्वारा वर्णित ननों के हालात दक्क्षिण के मंदिरों की देवदासियों की दर्द भरी ज़िंदगी जैसे नहीं है ? क्या तमाम मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, मठों-पीठों की चाहर दीवारी में यही सब कुछ नही होता है ? अन्याय, अत्याचार, शोषण, यौन-शोषण और संपत्ति-सत्ता के लिए संघर्ष। और कभी-कभी तो खूनी संघर्ष भी ! कौन आज सीना ठोक कर यह कह सकता है कि यह सब कुछ दूसरों के यहाँ होता है, हमारे धार्मिक संस्थानों में नहीं ? दरअसल, यही है वर्त्तमान में महिलाओं की वास्तविक स्थितिसिर्फ़ घर, परिवार, समाज और अफ्फिस-कार्यालय में ही नहीं, धर्म की दीवारों भीतर भी महिलाएं सिर्फ़ गुलाम, भोग्या और ताड़ना की अधिकारी होती हैंपर सिस्टर जेस्मी जैसी हिम्मत कोई कभी-कभी ही दिखाता है ?
(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)
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