मंगलवार, 10 मार्च 2009

आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--तीन

आज भी हकीकत यही है कि दंगे हों तो कहर महिलाओं पर टूटता है। जातीय संघर्ष हो तो महिलाओं को भुगतना पड़ता हैं। आतंकवादियों का जुल्म बरसता है तो महिलाओं पर। पुलिस और सेना भी जब वहशी होती हैं तो भुगतती हैं महिलाएं। प्रेम प्रसंगों में भी प्रताड़ित महिलाएं ही होती है। यही नहीं, जब भारतीय संस्कृति के स्वयभू ठेकेदार अपनी तथाकथित संस्कृति की रक्षा में नैतिक पुलिस बन कर हिंसक होते हैं, तो सब से ज्यादे शिकार महिलायें ही होतीं हैं। चाहे वह हिन्दू धर्म हो या मुस्लिम, ईसाई हो या कि सिख धर्म, या चाहे कोई भी जाति हो या वर्ण हर जगह महिलाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। सारे नियम कानून और ढेरों पाबंदियाँ महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं। पुरूष हर जगह उनसे ऊपर और आजाद होता है।
दूसरी तरफ बाजार में जब खुलापन आता है, तो भी धड़ल्ले से महिलाएं और उनका शरीर ही बेचा और खरीदा जाता है। गरज यह कि सामंती मध्ययुगीन संस्कृति का बोलबाला हो या पश्चिमी अत्याधुनिक भोगवादी संस्कृति का वर्चस्व, शिकार महिलाओं को ही बनाया जाता हैं। चाहे दबाकर जोर जबर्दस्ती से या फिर फुसलाकर और चकाचैंध से भरी जिंदगी का लालच देकर। और हमारे देश में सामंती संस्कृति की छत्रछाया में ही तो फलफूल रही है यह मुनाफा आधारित पश्चिमी भोगवादी संस्कृति, मुक्त बाजार की अपसंस्कृति, विज्ञापनों, फिल्मों, टीवी सीरियलों और ब्यूटी कान्टेस्टों में महिला-शरीर का भोंड़ा इस्तेमाल और प्रदर्शन मात्र पुरूषों की दमित इच्छाओं की पूर्ति का साधन नहीं तो और क्या हैं ? पुरूष सत्तात्मक समाज में पुरूषों के हितों को ध्यान में रखकर अपना शरीर दिखा-दिखा कर तालियाँ पुरस्कार और पैसे पाने की मजबूरी।
कुल मिलाकर आज भी हमारे समाज की महिलाओं की स्थिति दयनीय और सोचनीय है। हालांकि उनकी स्थिति को बेहतर बनाने क कई एक कोशिशें हुई हैं। भारतीय दंड संहिता की धाराओं में कई सकारात्मक संशोधन हुए है। महिला शिक्षा, महिला को आरक्षण की सुविधा एवं महिला संगठनों व महिला मंचो के जरिए समय-समय पर कुछेक जेनुइन मुद्दों पर आंदोलन कर महिला-चेतना का विकास भी हुआ है, पर सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से किसी सार्थक आंदोलन या जागरण के आभाव में उनकी कुल स्थिति में कोई अधिक या अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। हालांकि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों खास करके अब अक उनके लिए वर्जित माने गए क्षेत्रों में उनकी भागीदारी या घुसपैठ बढ़ी है। और वहां उन्होंने अपनी योग्यताएं साबित भी की हैं, पर समग्रता में देखें तो आज भी गुणात्मक रूप से उन्हें कुछ भी ठोस हासिल नहीं हुआ हैं। महिलाओं की कुल आबादी का लगभग 76 प्रतिशत गाँवों में रहता है। आँकड़े बताते हैं कि इनमें से लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं आज भी अशिक्षित है। और प्रसव के दौरान हर 7 मिनट पर एक महिला की मृत्यु हो जाती है। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े ये तथ्य आजादी के 60 सालों के बाद भी उनकी दयनीय स्थिति को दर्शाते हैं।
पर सवाज यह उठता है कि आखिर महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा कैसे ? कैसे मिलेगा उन्हें सामाजिक न्याय ? बराबरी का वास्तविक दर्जा ? ताकि वे भी समाज के सम्यक विकास में अपना सार्थक योगदान कर सकें। कानून की अपनी सीमाएं जग जाहिर हैं। और खास करके उस देश में जहां भ्रष्टाचार का चहुँ ओर बोलबाला हो तथा पैसे, जोर और रूतबे से न्याय को भी न्यायपूर्ण न रहने दिया जाता हो, वहाँ कानून की सीमाएं यूँ ही बरकरार रहेंगी । वरना दहेज हत्याओं मे इस तरह की वृद्धि कभी नहीं होती। यही हाल छेड़खानी और बलात्कार के खिलाफ खड़े तमाम कानूनों का है। इन सबका माखौल उड़ाते हुए इनकी घटनाएं हर साल बढ़ती ही जा रही हैं। तब फिर ?
आज निश्चित तौर पर इस बात की जरूरत है कि समाज में महिलाओं के प्रति मौजूदा दृष्टिकोण में बदलाव लाया जाए और इसके लिए जरूरी है कि पहले खुद महिलाएं ही अपने हित के प्रति सचेत हों तथा आगे आएं। महिलाओं को इस प्रकार शिक्षित प्रशिक्षित किया जाये कि उनकी चेतना का विकास सम्यक ढंग से और उचित दिशा में हो सके तथा पुरूष सत्तात्मक सोच-समझ पर कारगर दबाव व चोट पड़ सके।
पर विडंबना यह है कि महिलाओं से जुड़े तमाम संगठन आज दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। एक तो धुर महिलावादी विचार दृष्टिकोण को मानने वाले हैं तथा दूसरे प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी सिद्धांतो व विचारों को तहत काम करने वाले। एक उच्च वर्ग और उच्च मध्य वर्ग की महिलाओं के बीच काम करते हैं, तो दूसरे निम्न मध्य वर्ग की कामकाजी महिलाओं और खेत-मजदूर श्रमिक महिलाओं के बीच सक्रिय हैं। पर इन दोनों के अतिवादी व आमतौर पर अव्यावहारिक एवं यान्त्रिक तौर-तरीकों के कारण इन दोनों तरह के संगठनो के साथ व्यापक महिलाओं की भागीदारी कम ही हो पाती है। सच तो यह है अधिकांश प्रगतिशील, जनवादी व क्रान्तिकारी संगठन और पार्टियों अन्दर भी काफी हद तक पुरूषवादी मानसिंकता हावी है। इस पर भी कारगर चोट करने की जरूरत है।
इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि व्यपाक महिलाओं को उनसे जुड़ी तमाम समस्याओं के इर्द-गिर्द एकजुट-गोलबंद करते हुए कुछ इस तरह से जागरूक और शिक्षित किया जाए, ताकि अपनी दोहरी गुलामी के विरूद्ध नुक्ता-दर-नुक्ता संघर्ष करते हुए वे अपनी मुक्ति की सही मंजिल की और बढ़ सकें। पर इसके लिए स्वयं महिलाओं को ही पहल लेनी होगी। और इन दो ध्रुओं पर खड़े महिला संगठनों के बीच या शायद दोनों को मिलाकर एक व्यापक आधार वाले मंच या मोर्चे का निर्माण करना होगा, ताकि वहाँ से वे अपनी लड़ाई को मुकम्मिल अंजाम दे सकें। पहले तो उन्हें हर स्तर पर पुरूषवादी सोच व संस्कृति के विरूद्ध जूझना-लड़ना होगा, फिर दूसरे दौर में पुरूषों के साथ मिलकर हम-कदम होकर इस अन्यायी, भ्रष्ट व अराजक समाज-व्यवस्था को बदलने के लिए इसके विरूद्ध चलने वाले तमाम संघर्षो में सक्रिय हिस्सेदारी निभानी होगी, तभी हो पाएगी उनकी बेहतरी और सही मान्य में उनकी मुक्ति। अन्यथा मानसिक रूप से विकलांग महिलाओं का गर्भाशय यूँ ही निकाला जाता रहेगा, उच्चतम न्यायलय गवाहों और सबूतों के आभाव में यूँ ही बलात्कार की सजा सात साल पहले घटाकर तीन साल करता रहेगा, डायन और चुड़ैल कहकर यूँ ही पत्थरों से पीट-पीटकर मारी जाती रहेंगी महिलाएं, शिवपति व ऊषा धीमान को यूँ ही नंगा करके सरे बाजार घुमाया जाता रहेगा, रूपकँवर यूँ ही जलाई जाती रहेंगी, रोशनी, शाहबानों व इमराना की आवाज यूँ ही नक्कार खाने में तूती की तरह अनसुनी गूँजती रहेगी। और यूँ ही उमड़ता-घुमड़ता रहेगा आधी आबादी की आंखों में दर्द का समंदर आने वाले समय में भी।
अंत में मैं क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे की एक कविता के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ-
ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए
--अरविन्द कुमार
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)
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