शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

कहानी

उमस के बावजूद
पिछले कई दिनों से यूं ही पानी, धूप और उमस का कठिन और भरी क्रम चल रहा था. बाहर तेज बरसात हो रही थी. वे अपने कमरे के कोने में बिछी चारपाई पर लेटे हुए थे. चित. छत को निहारते हुए. चुपचाप. निस्पंद. लगभग मुर्दों की तरह. वह लगातार सिगरेट पी रहा था. और वह उसके धुएं में लिपटी किसी अंधेरे शून्य में तैर रही थी. उन दोनों के भीतर शायद एक भरी कोलाहल मचा हुआ था. वहॅां कोई बड़ी उथल-पुथल चल रही थी. वे चुप थे, पर अन्दर ही अन्दर अपनी-अपनी उलझनों को सुलझाने की पुरजोर कोशिश करते हुए अपने आप से जूझ रहे थे.
-----सो गए क्या?
-----नहीं तो.
-----क्या सोच रहे हो?
-----कुछ भी तो नहीं.
एक लम्बी साँस के साथ उसने ढेर सारा धुआं उगल दिया. सिगरेट की रख को काफी समय से झाड़ा नहीं गया था. इसलिए उस के अगले सिरे पर राख की एक लम्बी लड़ी बन गयी थी. उसको गिराने के लिए उसने सिगरेट को धीरे से दीवार से छुआया. रख चारपाई पर गिरी. और चादर पर बिखर गयी. इस समय चारपाई को दीवार से सटा कर रखा गया था. पांच सौ अस्सी रुपये महीने के किराये का उनका पूरा कमरा यानि कि मकन मालिक का बेकार पड़ा गैराज टप-टप कर चू रहा था. सिर्फ चारपाई और स्टोव के पास का हिस्सा ही सूखा और छूंछा बचा था. बरसात के हर क्रूर मौसम में ऐसा ही होता है.
-----बोलो ना, क्या सोच रहे हो? क्या बात है?
-----कुछ नहीं. कोई बात नहीं है.
-----काफी पपरेशान लग रहे हो. बोलो ना क्या बात है?
-----कुछ नहीं यार,...बोला ना!!
न चाहते हुए भी शब्दों के साथ आवाज़ की झुंझलाहट को वह रोक नहीं पाया. लेकिन अगले ही पल उसने अपने आप को सम्हाल लिया. उसको देख कर हलके से मुस्कराया. एक लम्बा कश लिया. सिगरेट को दीवार से रगड़ कर बुझाया. और बचे हुए टोटके को सहेज कर सिरहाने रख लिया. एक लम्बी सांस ली. और दीवार की तरफ मुंह करके लेट गया.
उसने उसके अन्दर उबलने वाली परेशानियों की गर्मी को महसूस किया. पर टोका-टोकी न करके वह भी अपने अन्दर उठ रहे अंधड़ों में फंसी-उलझी चुपचाप पड़ी रही. कुछ देर तक यूं ही प्रतीक्षा करने के बाद भी जब वह कुछ नहीं बोला तो उसने उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया. उसकी पीठ, जो उसे कभी काफी नर्म, मुलायम और एक खास तरह की खुशबू से भरी हुयी लगती थी, आज उसे खुरदुरी, बेजान और धुल-धूसरित सी प्रतीत हुई. ठीक पुरानी, सुस्त और थकी हु किसी वीरान सड़क की तरह. इधर वाकई कुछ दिनों से उसे लगने लगा है कि उसके बाल, उसका चेहरा, उसकी बातें, उसकी हरकतें और प्यार जताने का उसका तरीका भी अब पहले जैसा नहीं रहा. रंगहीन, बेजान और भावना विहीन हो गया है. उसकी आँखों के सुनहले डोरें भी अब गंदले और मटमैले हो गये हैं.
उधर उसे भी लगा कि उसका इस तरह पीठ पर उंगली फिरना अब पहले की तरह मादक नहीं रहा. उसका देखना, उसका छूना और बल खाती किसी नागिन की तरह उसका उससे लिपटना भी अब उसके अन्दर उतनी उत्तेजना नहीं भरता कि वह तड़प कर उसे बाँहों में भींच ले. चूमे उसे और बस चूमता ही चला जाये. कहाँ उड़ गयीं वे सारी भावनाएं? कहाँ गम हो गया वह प्यार का लहराता समुन्दर? क्यों सरे सपने इतनी ज़ल्दी रेतीले हो गए?
-----सुनो, अब उसने उसके कंधे पर हाथ रख.
-----ओफ्फो, बोलो क्या बात है?
-----सब्जी लाना भूल गए ना? बोलो, अब इस समय क्या बनाऊँगी?
-----कुछ भी बना लो...
-----सवेरे टिफिन में क्या लेकर जाओगे? वह उसके बालों में प्यार से उँगलियाँ फिरने लगी-----मैंने जाते समय तुमसे कहा भी था.
-----पैसे नहीं थे.
-----लेकिन सुबह तो तुम्हारी जेब में पचास रुपये थे. मैंने देखा था.
-----हाँ थे. पर वे तो सुबह थे.
-----और शाम को क्या हुए? तुमने फिर दोस्तों के साथ बैठ कर चाय पी ली होगी. कितनी बार कहा है कि इस तरह फिजूलखर्ची मत किया करो...एक-एक पैसे कीमती होते हैं.
-----सुनोगी भी या...उसका स्वर फिर रूखा हो गया-----पचास रुपये फोटोस्टेट और रजिस्ट्री में खर्च हो गए.
-----फोटोस्टेट? रजिस्ट्री? क्यों?...वह वाकई चौंक पडी.
-----बिमन दा का फोन आया था....वह पलटा-----उनके यहाँ कोई जगह आयी है. उसी के लिए अप्लाई किया है....यहाँ का अब कोई भरोसा नहीं. सुना है, अगले कुछ महीनों में छॅंटनी होने वाली है.
-----क्यों?
-----कंपनी घटे में चल रही है. खर्चों को कम करना चाहते हैं.
-----तुमने शर्मा जी से बात नहीं की?
-----की थी...पर वे भी क्या करेंगे?...खुद उनकी गर्दन पर भी तलवार लटकी हुयी है...खैर छोड़ो, आज का तुम्हारा दिन कैसा रहा?
-----आज मैं जल्दी घर आ गयी थी.
-----क्यों?
-----तबीयत ठीक नहीं थी. सुबह से ही उल्टियाँ हो रही थीं. बाद में चक्कर आने लगा. इसलिए आधे दिन की छुट्टी ले ली.
-----फिर तो सहगल आधे दिन की तनख्वाह ज़रूर काट लेगा?
-----वो तो कटेगा ही. पर मेरी हालत वाकई बहुत ख़राब थी.
-----अच्छा सुनो, उसे पता है तुम्हारे बारे में?
-----अभी तक तो नहीं. पर अगर इसी तरह रोज़-रोज़ तबीयत ख़राब होती रही, तो उसको ज़रूर शक हो जायेगा...वैसे भी, कुछ दिनों बाद तो सब को पता लग ही जायेगा.
-----तब?
-----सहगल फ़ौरन नौकरी से निकल देगा...आगे तो खैर मैं खुद ही इस लायक नहीं रहूँगी कि दिन भर ख़ सकूं.
उसने एक गहरी सांस ली. और पहले की बची हुयी सिगरेट को निकल कर सुलगाने लगा. माचिस की डिबिया सीलन के कारण नर्म पड़ गयी थी. लिहाज़ा कई तीलियाँ टूट कर बेकार हो गयीं. आखिर में एक तीली गर्म सांसों से काफी सेंकने के बाद जाकर जली. कमरे में भक्क से उजास भर गया. पर फ़ौरन ही अंधेरे ने झपट कर उसे अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया. देखते ही देखते कमरे में अंधेरा और खामोशी छ गयी. वह चुपचाप सिगरेट पीने लगा. और वह फिर से अपनी अंधेरी गहरी सुरंग में उतरने लगी.
समय धीरे-धीरे दबे पांव सरकने लगा. रात गहरी और भरी होने लगी. बहर पानी का बरसना बंद हो गया था. और इसलिए अब फ़िर से पूरे कमरे में उमस पसर गयी थी. पसीने ने दोनों को तरबतर कर दिया था. सन्नाटा कोने में छिपे झींगुरों की तरह उनके भीतर भी ांय-चाय कर रहा था. दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक एक अजीब सी डरावनी आवाज़ पैदा कर रही थी. और वे बे हरकत अपने-आप से जूझते-निपटते चुप-चाप पड़े हुए थे.
काफी देर तक यूं ही निश्चल पड़े रहने के बाद उसने अपनी आँखें खोलीं. और उसकी तरफ ध्यान से देखा. लेकिन वह दूसरी तरफ मुंह करके लेटी हुयी थी.
-----सो गयी क्या, सुमि?
उसने उसे धीरे से छुआ. और अपनी तरफ घुमाने की कोशिश की. पर वह घूमी नहीं. उसने थोड़ी ताकत लगाकर उसे अपनी तरफ घुमाया. वह घूम तो गयी, पर आँखें बंद किये हुए चुप-चाप पडी रही.
-----सुमि, सुनो...सुमि? उसने उसके कंधे पर प्यार से अपना हाँथ रखा.
-----क्या है?...उसने आँखें खोल कर उसकी आँखों में पनपने वाले भाव को पकड़ना चाहा. पर वहां अपेक्षा से भिन्न कुछ और था. पर क्या? वह समझ नहीं पाई.
-----मैं सोच रहा हूँ कि...उसकी आवाज़ थरथराने लगी. और वह हकलाने-सा लगा-----कल तुम मेरे साथ डाक्टर सहनी की क्लिनिक पर चलना...उसने उसके बाजू को प्यार से पकड़ लिया. और कांपती हुयी आवाज़ में एक-एक शब्द तौलते हुए बुदबुदाने लगा-----सुमि, हमें अभी बच्चा नहीं चाहिए.
-----क्या? वह लगभग चीख पडी.
-----देखो सुमि,...मुझे समझने की कोशिश करो....हमारी ये हालत...तुम देख ही रही हो...वह फूल मुरझा जायेगा...तुम्हें पता है ना? अभी हम अपने चुने हुए रस्ते को ठीक से बना भी नहीं पाए हैं...और अभी से उस पर इस तरह चलना...अभी काफी वक्त लगेगा...कोई नहीं है साथ देने वाला...ना आगे ना पीछे....तुम्हें तो पता ही है कि घर वाले अभी तक जान के पीछे पड़े हुए हैं...पता नहीं कब और किस मोड़ पर ज़िंदगी हमसे रूठ जाये और अपने हाँथ खड़े कर ले...सोचो, कहीं वह मासूम हमारी बेड़ियाँ ना ब जाये...क्या-क्या सोचा था...कितने सपने देखे थे...पर प्यार और हकीकत में तना फर्क होगा...सपने में भी नहीं सोचा था...सुमि, मैं कतरा-कतरा जल रहा हूँ...अचानक ही वह कातर हो उठा. दयनीय. निरीह.
-----मैं भी तो झुलस रही हूँ...पर खुश हूँ कि तुम्हारे साथ हूँ. यही तो हम चाहते थे.
-----इसीलिये तो कहता हूँ कि...कल चल कर बच्चा गिरवा देंगे...इसी में भलाई है...
उसका कलेजा काँप उठा. पर वह चुपचाप पड़ी रही. जमी हुयी. मानों बर्फ की सिल्ली पर लेटी हुयी हो. स्थिर. शब्द-शून्य. मातृत्व के सरे सपने, सारी मधुर कामनाएं उसके आगे राख बन कर उड़ने लगीं. उसने अपने भीतर से फूट कर बहर बहने को तैयार आंसुओं को जबरन अन्दर ही रोक लिया. उसकी गले की नसें फूल कर मोटी हो गयीं.
-----ठीक है ना, सुमि?...मैं ठीक कह रहा हूँ ना?
-----पर...उसने अपने को संयत किया-----इसमें दो-तीन हज़ार रुपये लगेंगे....मैंने पता किया था...ऊपर से दवाइयों का खर्चा अलग...
-----तो फिर देसी तरीके से...गाँव में तो दाईयाँ...
-----पागल हो...उसमें काफी रिस्क होता है...जान का खतरा...चार महीने का है...
-----तो फिर...डाक्टर सहनी के यहाँ ही चलना...मैं शर्मा जी से उधर ले लूँगा.
-----उधार...उधार...उधार!!...आखिर हम कब तक उधर ले-लेकर कम चलते रहेंगे? अभी तो हमने अपनी ज़िंदगी शुरू की है...और अभी से क़र्ज़ का बोझ?...और फिर हम इतना उधर चुकायेंगे कैसे?...क्या उसके लिए फिर क़र्ज़ लेंगे?...हमें अपनी ज़िंदगी को संवारना है...उजाड़ना नहीं...अगर हम इसी तरह हताश और निराश होते रहे, तो कुछ दिनों बाद हमें भी लगने लगेगा कि इस तरह घर वालों की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करने का हमारा फैसला गलत था...अगर हम हर जायेंगे तो उनकी जीत हो जायेगी...
-----देखो सुमि, मैं भी हारना नहीं, लड़ना चाहता हूँ...जीतना चाहता हूँ...पर इस समय भावनाओं में बहने का समय नहीं है...हमें अभी एक व्यावहारिक और सही निर्णय लेना होगा.
-----तभी तो मैं कह रही हूँ...मैं एबर्शन हरगिज नहीं करवऊंगी...मैंने यह अच्छी तरह से सोच लिया है...यह हमारे प्यार...हमारे अपने निर्णय...हमारे सपनो की दुनिया की ओर बढ़ने वाल पहले कदम की पहली निशानी है...मैं इसको कभी नष्ट नहीं करूंगी...चाहे कुछ भी हो जाये...जब तक सहगल को पता नहीं चल जाता और वह मुझको नौकरी से निकल नहीं देता, मैं उसके यहाँ काम करती रहूँगी...फिर घर पर बैठ कर लोगों के कपड़े सिलूँगी...स्वेटर बुनूँगी...छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाऊँगी...मैंने इस सिलसिले में मोहल्ले के दो-चार लोगों से बात भी कर ली है...लडूंगी अंतिम समय तक...पर हर नहीं मानूँगी...सब ठीक हो जायेगा. रास्ता हरने से नहीं लड़ने से निकलता है.
बोलते-बोलते वह उठ कर बैठ गयी. उसका चेहरा लाल सुर्ख हो गया था. और आँखें बड़ी, गोल और चमकदार. घुप्प अंधेरे के बावजूद वह इस समय दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत लग रही थी. 
---अरविन्द कुमार
(यह कहानी "परिकथा" के "जुलाई-अगस्त" अंक में प्रकाशित हुआ है) 
                                                          

रविवार, 22 जून 2014

कहानी

चूहे

बच्ची और पत्नी की घटना को वहम मान कर उन्होंने टाल दिया था। पर जब उनके साथ भी लगातार तीसरी बार वही सब कुछ हुआ, तो उनका माथा ठनका। इस बार भी उसी तरह। उसी जैसा। इस बार तो नींद खुलने के बाद भी सब कुछ सही सही जानने के उद्देश्य से उन्होंने अपने हाँथ-पैर को ढीला छोड़ दिया था। खुर-खुर करता हुआ वह उनके पैर के अंगूठे पर जा चढ़ा। उसके बड़े-बड़े पैने नाखूनों की चुभन उन्होंने साफ़-साफ़ महसूस की। दो उँगलियों के बीच की मुलायम जगह पर उसने अपने नथुने से सही स्थान निश्चित किया। और अपने नुकीले दांत गड़ा कर धीरे-धीरे चमड़ी कुतरने लगा। कुतुर-कुतुर...कुतुर-कुतुर। धीरे-धीरे गोश्त तक। गुदगुदी के साथ जब एक तेज़ दर्द उनकी नसों में चढ़ने लगा, तो तिलमिला कर उन्होंने अपना पैर झटक दिया। वह उछला। और यह जा, वह जा।
इसके बाद अब उसकी पहचान के लिए उसे खोजना बेकार था। वह चूहा ही था। अब इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। तो क्या? वे फिर आ गए? और अब इस रूप में? उनके माथे पर बल पड़ गए। उनकी भृकुटियाँ तन गयीं। और डर की एक सिहरन उनकी नसों में करेंट की तरह दौड़ गयी। इनकी तादात क्या होगी? वे सोचने लगे।  
पिता की कृपा पर पलने वाले इन चूहों ने तब से लेकर आज तक इस घर का साथ नहीं छोड़ा। वे शायद इस घर को अपना घर मानते हैं। पिता नियमित रूप से घर के राशन का एक हिस्सा उनके लिए निकाल देते थे। मानों वे घर के ख़ास सदस्य हों। यह उनका एक रूढ़ी ग्रस्त संस्कार था। एक मान्यता। वे कहते थे कि सभी जीव एक ही खुदा के बच्चे हैं। और अगर एक बच्चा कमाता है, तो यह उसका नैतिक कर्त्तव्य होता है कि वह औरों की जीविका भी चलाये। अगर एक सक्षम है, तो वह दूसरे को भी संबल दे। तमाम परेशानियों, उलझनों, उंच-नीचों और खिंचावों के रहते हुए भी पिता ने कभी भी उनके रहने पर कोई आपत्ति नहीं की। और न ही कभी अपना नियम तोड़ा।  
पर उन्हें बचपन से ही पिता की इन बातों से काफी चिढ़ थी। वे मन ही मन कुढ़ते थे। ऐसा भी क्या दान-पुण्य? ऐसी भी क्या दया? इतनी महंगाई में इतना कीमती अनाज चूहों को दिया जा रहा है। उनको ऐसे अंधविश्वासों और मान्यताओं पर कत्तई विश्वास नहीं था। दूसरों को खैरात देने से कहीं खुद खाना मिलता है? पिता समझाते कि यह तुम्हारी दया नहीं, उनका हिस्सा, उनका हक़ है। वे अबोलते हैं, तो क्या हुआ? हैं तो जीव ही। पर कैसा हक़? कैसा हिस्सा? एक ही घर में रहने से क्या कोई हक़ कायम हो जाता है? वे सवाल करते। और पिता की सारी बातें एक कान से सुनते और दूसरे कान से निकाल देते थे। पिता को वे परले दर्जे का बेवक़ूफ़ समझते थे। और चूहों को गन्दगी और बीमारी का कारण। बचपन की इसी अनिच्छा के कारण जब वे घर की सत्ता में आये, पुराने सारे नियम कायदे टूट गए। और खैरात (हक़) बटनी बंद हो गयी।  
खाने की बंदी हो जाने के बाद भी उन्होंने अपना स्थान नहीं बदला। और न ही उनकी तादात में कोई कमी हुयी। थोड़े बहुत असंतोष के बावजूद उनका उछलना, कूदना और स्वच्छंद होकर घूमना पहले की ही तरह चलता रहा। दमन, कैद और छिट-पुट हत्याओं का भी उन पर कोई असर नहीं हुआ। काफी सोचा-विचारी के बाद पत्नी और मित्रों के साथ की एक बैठक में उन्होंने बहुत खुश होकर (मानों मैदान मार लिया हो) फैसला किया और घोषणा की---“गल्ले लोहे के ड्रमों में रखे जायें। लोहे की दीवारों के पीछे। और इस बात का ढोंग किया जाए कि घर में अन्न की भारी कमी हो गयी है।” 
ठीक वैसा ही किया गया। पर कोई खास अंतर नहीं पड़ा। ठोस अनाज तो नहीं (सवाल ही नहीं उठाता), पर रोटी के टुकड़ों, भात के एकाध दानों और कागज़ की कतरनों पर उनकी गुजर बसर होने लगी। शायद उन्होंने अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके समझौता कर लिया था। हाँ, उनके व्यवहार में एक अंतर ज़रूर नोट किया गया। उनकी उदंडता पहले से काफी बढ़ गयी थी। और अब वे कपड़े और किताबें भी कुतरने लगे थे। कभी कभार तो उन्होंने अलमारी में रखे रुपयों को भी अपने पैने दाँतों का शिकार बना डाला। काफी नुक्सान हुआ। इस बार पहले से कहीं ज्यादा। उनकी चिंता फिर बढ़ी। और उनका राजनीतिक दिमाग फिर से इधर-उधर दौड़ने लगा। उन्होंने अपने कुछ ख़ास दोस्तों से सलाह मशविरा करने के बाद फ़ौरन ही एक आपातकालीन बैठक बुलाई। और इस बार संहार की नीति अपनाई गयी। और चूहों के विरुद्ध महासंहार अभियान शुरू कर दिया गया। और वह भी बड़े जोर-शोर से। चूहे मार दवाइयां रखी गयीं। और फंसाने का पिंजड़ा भी प्रयोग में लाया गया। कुछ बिल्लियां भी इम्पोर्ट की गयीं। कुछ बूढ़े, लालची और बेवक़ूफ़ चूहे फंसे ज़रूर। मारे भी गए। पर बाकी इस महादमन अभियान के डर से अपने दल-बल के साथ कहीं लापता हो गए। उनके हमले और उपद्रव बंद हुए। और पूरे घर में शांति छा गयी। इसी खुशी से उन्होंने अपने पूरे परिवार के साथ चैन के उन्मुक्त ठहाके लगाये। और शैम्पेन की बोतल के साथ दोस्तों को एक बहुत बड़ी दावत दे डाली।
 पर अब पता चला कि वे डर कर भागे या गायब नहीं हुए थे। कुछ सोच कर ही वे कुछ दिनों के लिए चुप होकर छुप गए थे। कुछ दिनों की चुप्पी के बाद छिपे हुए चूहे जब बाहर निकले, तो उनके तेवर काफी बदले-बदले और उग्र थे। दिन भर लापता रहने के बाद अब उन्होंने रात के अंधेरे में हमला करना शुरू कर दिया। पहले उनकी छोटी बच्ची पर हमला हुआ। वे उसकी एक उंगली पर दांत गड़ा कर भाग गए। फिर पत्नी ने बताया कि उनको भी नोचा गया है। और आज तीसरी बार लगातार उनकी उँगलियों को भी कुतरने की कोशिश की गयी थी। उन्होंने अनुमान लगाया कि वे एक नहीं थे, बल्कि अनेक थे।  
इस बात की किसी को आशा या दुराशा नहीं थी कि चूहे, जो कि शाकाहारी जीव होते हैं और धर्मानुसार जिनको गणेश जी की सवारी मान कर मान-सम्मान दिया जाता है, इस तरह से हिंसक और मांसाहारी हो जायेंगे। कोई मान ही नहीं सकता। उन्हें अपने दोस्तों से इस बात की चर्चा करते हुए भी काफी झिझक और शर्म महसूस हुयी। पर जिक्र करने पर पता चला कि उनके तमाम दोस्त भी आजकल इसी परेशानी से त्रस्त हैं। और उनके पूरे तबके पर इस प्रकार के हमले हो रहे हैं। रात के अंधेरे में वे चुपके से आते हैं। और नर्म चमड़ी या नमकीन गोश्त नोच कर फ़ौरन भाग जाते हैं। सबने बैठ कर एक बहुत बड़ी बैठक की। खूब माथा पच्ची हुयी। और चूहों के इस नए तेवर के खिलाफ बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ दिया गया---समूल नष्ट करो अभियान। 
फैसला किया गया कि इस अभियान के प्रथम चरण में पहले उनके निवास स्थान को तोड़ा और नष्ट किया जाएगा। और फिर उनके खिलाफ सैनिक करवाई की जायेगी। फ़ौरन ही उनके बिलों की खुदाई शुरू कर दी गयी। एक दिन नहीं। दो दिन नहीं। यह खुदाई हफ़्तों तक चली। हालाँकि इस खुदाई के शुरूं में कुछ परेशानियाँ ज़रूर आयीं। पर बाहरी लोगों की मदद से उन्हें जल्दी ही सुलझा लिया गया।  
पहली और सबसे बड़ी परेशानी थी मजदूरों की। उनका न मिलना। शहर का कोना कोना छान मारा गया। पर कहीं कोई भी मजदूर नहीं मिला। पता चला कि पिछले दिनों शहर की सफाई वाले अभियान में मजदूरों और गरीबों की सारी मलिन बस्तियां तो उन्होंने खुद ही उजड़वा दी थीं। झुग्गियों-झोपड़ियों को हटा कर सड़कों को चौड़ा किया गया था और आलीशान इमारतें बनीं थीं, यह तो उन्हें याद था। पर उन उजड़े हुए लोगों का क्या हुआ? वे कहाँ गए? वे जिंदा भी हैं या मर गए। उन्हें इस बावत कुछ भी नहीं मालूम था। वे अब कहाँ रह रहे हैं? कहाँ जा कर बसे हैं? किस हाल में हैं? इसकी कोई खबर, कोई रिपोर्ट उनके पास उपलब्द्ध नहीं थी। अपनी इस भूल और अदूरदर्शिता का उन्हें काफी अफ़सोस हुआ। झुंझलाहट भी हुयी। पर अब उस बावत कुछ भी नहीं किया जा सकता था। और अब ज्यादा कुछ सोचने का समय भी नहीं था। ठेके पर तुरंत बाहरी मदद ले ली गयी। और फिर, पैसों से क्या कुछ नहीं हो सकता? सब कुछ किया गया। और खुदाई का कार्य सफलता पूर्वक संपन्न हुआ।  
खुदाई करने पर पता चला कि वे बिल नहीं एक मोटी सुरंग के अलग-अलग रास्ते थे। वह सुरंग धीरे-धीरे चौड़ी और अंधेरी होती गयी थी। काफी खुदाई के बाद जाकर उसमें प्रकाश नज़र आया। पर आश्चर्य! उसका अंत एक घने जंगल में था, जहां वे चूहे हजारों-लाखों की तादाद में मोर्चेबंदी के साथ डटे हुए थे। इतने चूहों को एक साथ, इस तरह से देख कर वे इतना डर गए कि बदहवासी में उनको सिर पर पैर रख कर वापस भागना पड़ा---बाहर से शीघ्र सैनिक मदद लेने के लिए।
---अरविन्द कुमार 
(यह मेरी एक पुरानी और बहु-चर्चित कहानी है और इसे "नोवलोक टाइम्स" ने अभी हाल में ही फिर छापा है)          
     

                                                                      

शनिवार, 17 मई 2014

कहानी---


व्यक्त अव्यक्त      

      दूर जेल की दीवारों के बीच से अभी-अभी कुछ घंटों की आवाज़ उभरी है और नीरव वातावरण के परदे पर बारह के अंक आकर टंग गए हैं रात काफी गहरी हो चुकी है और उसकी काली चादर के नीचे दुबक कर पूरी की पूरी कायनात बेसुध बेखबर सो रही है हवा भी मैं भी सोने की बहुत कोशिश कर रहा हूँ पर लाख कोशिशों के बावजूद आज की रात मुझे नींद नहीं आ रही लगातार इधर से उधर करवटें बदल रहा हूँ दिमाग में एक अंधड़ सा चल रहा है उस बवंडर से जूझते हुए जब गला सूख कर रेतीला हो जाता है, तो अचकचा कर उठ बैठता हूँ सिरहाने रखी सुराही से पानी निकल कर पीता हूँ और फिर से उन्हीं अंधड़ों से जूझने लगता हूँ गिट्टी बिछी हुयी सड़क पर से शायद अभी-अभी कोई रिक्शा गुज़रा है खड़-खड़ की आवाज़ से विचारों का सिलसिला बीच में ही टूट गया है और कांपते हुए होंठों से मैं मोती से चुने तुम्हारे अक्षरों और शीतल-सुवासित तुम्हारे शब्दों को पुनः दुहराने लगता हूँ दरिया के शांत पानी में मानों कोई कंकड़ गिर गया हो वृत्ताकार तरंगे धीरे-धीरे फ़ैलने लगती हैंरों तरफ और किसी तिनके की तरह इन लहरों पर हिचकोले खता हुआ मैं एक बार फिर से डूबने उतराने लगता हूँ   
हाँ, हाँथ में मुड़ा-तुड़ा तुम्हारा ही ख़त है शाम से ही जब से यह मुझे मिला है, मैं इसे न जाने कितनी बार चबा-चबा कर दुहरा चका हूँ प्रेम पत्र जो ठहरा और वह भी तुम्हारा प्रेम पत्र तुम्हारे लिखे हुए शब्द और उनके पीछे की छुपी हुयी भावनायें किसी के लिए भी बहुत आवश्यक हो सकत हैं मन माँगी मुराद की तरह मेरे लिए भी यह ज़िंदगी जीने के लिए एक संबल, ताकत और एक ज़रूरी मकसद हो सकता है  
आखिर इस दुनिया में ऐसा कौन होगा जिसको प्यार की ज़रुरत नहीं होगी? मैं स्वयं भी प्रेम पाने के लिए लगातार भटक रहा हूँ शायद बचपन से ही पर देखो न, जो मेरे लिए बहुत आवश्यक था, है और रहेगा, आज जब तुम वही सब कुछ मुझे देना चाहती हो, तो मैं अपने आपको असहाय, शिथिल, बुझा और जंजीरों से जकड़ा हुआ महसूस कर रहा हूँ आज वही सवाल, सवालों का वही जंगल और चमकता हुआ लम्बा-तपता हुआ रेगिस्तान, जो पहले भी मुझे अक्सर मेरी तन्हाइयों में परेशान किया करता था, आज फिर मेरे मानस से टकरा-टकरा कर मुझे नीम पागल कर देना चाहता है और असमर्थता की झाड़ियों में फंसा हुआ मैं मुट्ठी में तुम्हारे पत्र को कस कर, एक लम्बी सांस के बाद उसे बार-बार होंठो से लगाने लगता हूँ लक्ष्य के आस-पास, खुशियों के ढेर के पास बैठ कर ‘उफ़’ यह आंसुओं की झड़ी! यह कैसी विडम्बना है? तुम नहीं समझोगी और शायद मैं तुम्हे समझा भी नहीं सकता!  
अंता, तुमने कभी सितारों को टूटते हुए, टूट कर बिखरते हुए देखा है? नहीं, नहीं देखा होगा बंद एअर कंडीशंड कमरे में सोने वाली तुम सड़क, आसमान, हवा और तूफ़ान के बारे में क्या जानो? फिर भी ज़रा कल्पना करो, किसी अंधे व्यक्ति का चश्मा गिर कर टूट जाये और जब वह उसे खोजने-टटोलने की कोशिश करे, तो उसकी उँगलियों में चश्मे का टूटा हुआ कांच धंस ज कितनी पीड़ा होगी उसे? किस कदर छटपटायेगा वह? प्यार में जल्दी ही पड़ाव चुन कर रिश्तों की गाँठ बांधने वाली तुम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती यह मैं अच्छी तरह से जनता हूँ
शायद एक सियार दौड़ता हुआ पास के बागीचे में घुस गया है उसकी गंध पाकर मोहल्ले के चौकस कुत्ते अचानक ही जाग कर भौंकने लगे हैं सामने अपनी छप्पर के नीचे बूटन बेखबर गुदड़ी में लिपटा हुआ सो रहा है पास ही मोटी-मोटी जंजीरों में बंधी हुयी उसकी भैंसे उंघते हुए मुंह चला रही हैं रह रह कर जंजीरें खनक उठती हैं एक भैंस का नवजात पड़ा भी उसी के पास सो रहा है, जिसे उसकी माँ जगने पर धीरे-धीरे चाटने लगती है माँ का दिल है न? कोई भी माँ अपने बच्चे को अपने सीने से अलग करना नहीं चाहती कर ही नहीं सकती पर कभी कभी माँ का दिल भी कितना सख्त, कितना क्रूर और कितना मजबूर हो जाता है उसके बच्चे को, उसके जिगर के टुकड़े को ग़ैर आकर छीन ले जाते हैं। और वह निरीह होकर सबकुछ चुप-चाप देखती रह जाती है स्वीकार कर लेती है कहते हैं कि उसे स्वीकार करना पड़ता है मजबूरन पर मेरी समझ से यह अन्याय है क्रूरता है ममता के प्रति बच्चे के प्रति
पड़ोस के ऊंचे मकन से निकलने वाली पीली रोशनी रोज़ की तरह सड़क पर लेट कर ऊंघ रही है बड़े आदमी हैं पानी व्यर्थ बह जाए बिजली का बिल धकधक बढ़ता चला जाये उन्हें क्या? पैसों की कोई कमी थोड़े ही है सुना है, विदेश से कोई नयी कार मंगवा रहे है मंगवायें अपनी माँ की सेवा से अधिक कार ज़रूरी है उनके लिए जानती हो, उनकी माँ को कैंसर है उनकी बीबी ने माँ का बिस्तर, बर्तन-बासन और खाना-पानी सब कुछ अलग कर दिया है, ताकि बाकी घर को कैंसर की छूत से बचाया जा सके पैसों और सामाजिक ओहदे को तरजीह देने वाली बीबी कैंसर को छुआ-छूत की बीमारी मानती है और घर के इस कूड़े को अलग कोने में डाल देना चाहती है, ताकि आँगन-घर पूरी तरह से साफ़-सुथरा, चमकता हुआ और कीटाणु रहित नज़र आये अगर अस्पताल में डाल देंगे, तो लोग-बाग़ क्या कहेंगे कि माँ का खयाल नही करते? इसलिए घर पर ही माँ को एक दाई के रहम-ओ-करम पर छोड़ दिया है
बहुत पहले का एक वाकया है एक हकीकत मेरी ज़िंदगी से जुड़ा हुआ मेरे मकन के ठीक सामने एक लडकी रहती थी बतौर किरायेदार अपनी बूढ़ी और विधवा माँ के साथ उम्र होगी यही कोई अट्ठाईस-तीस साल उसकी आँखे बड़ी और काफी खूबसूरत थीं देह गठी हुयी और भरपूर मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी लेकिन मुझे यह नहीं पता कि धीरे-धीरे मैं भी उसको अच्छा लगने लगा था पहले तो वह मुझे देख कर दूर ही दूर से मुस्कुराती थी फिर धीरे-धीरे वह घर पर भी आने-जाने लगी कभी कोई किताब माँगने कभी किताब लौटने और कभी वैसे ही वह अक्सर आकर मेरी चारपाई पर लेट जाती थी और लेटे-लेटे मुस्कराती रहती थी ऐसे में उसकी आँखों में न जाने ऐसा क्या होता था कि मैं उसकी ओर अनायास ही खिंचने लगता था पर यकीन मानों, मैं कभी भी उसके करीब नहीं गया बल्कि जा ही नहीं पाया और वह ही क्यों? जब भी कोई लडकी या कोई महिला मेरे पास यूं ही आकर खड़ी हो जाती है और अगर उसकी आँखों में उस समय एक पतली सी भी चुम्बकीय तरंग होती है, तो मैं अपने आप उससे कट कर दूर हो जाता हूँ ऐसे में, न जाने कहाँ से मेरी आँखों के आगे एक चमकीला तपता हुआ रेगिस्तान आकर फ़ैल जाता है...रेंग कर पार करने के लिए
अंता, किसी भी खुले चमकते रेगिस्तान को पार कर पाना मेरे लिए कितना दूभर और असंभव हो जाता है, तुम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकती मुझे गलत मत समझो मैं अपने आप को आदर्श और नैतिक साबित करने या करवाने की कोशिश नहीं करता यह सब कुछ मेरे संस्कारों की वजह से भी नहीं होता मैं तुम्हे कैसे समझाऊँ? संस्कार और नैतिकता जैसी वाहियात और दकियानूसी बातों को मैं मानता भी नहीं ये सुन्दर और पालिशदार शब्द तो सिर्फ आम लोगों को भरमा कर बेवक़ूफ़ बनाने के लिए गढ़े गए हैं, ताकि उनको हर वक्त बंदिशों में बाँध कर रखा जा सके और यह सब कुछ ख़ास बड़े लोगों की चाल है और इस तरह के षड़यंत्र से मैंने अपने आप को हमेशा बचाने की कोशिश की है
पड़ोस की बूढ़ी माँ को जब भी मैं देखता हूँ, उसके झुर्रीदार चेहरे में, उसकी सूनी-सूनी आँखों में और उसके आस-पास की बीमार गंध में मुझे मेरी माँ नज़र आती है वह भी अंतिम समय में हरवक्त इसी तरह बिछावन पर पड़ी रहती थी दिन भर के दम घोंटू और हीन भावना वाले वातावरण से थक कर, चूर हो कर, लोगों की भेदती हुयी नज़रों को झेलते हुए ग्लानि और आक्रोश से भर कर मैं जब भी माँ के पास जाता था, मेरे पास ढेरों सवाल होते थे वे काँटों की तरह मेरे दिमाग में चुभ रहे होते थे मैं लोगों से अपनी तुलना करता और चीख-चीख कर माँ को हलकान कर देता था---क्यों पैदा किय है मुझे? आखिर क्यों? मैं माँ को झकझोर कर बेदम कर देता था
माँ की कमज़ोर सांसें उखड जातीं थीं पल भर के लिए वह मुझे घूरती, सांत्वना के लिए उसके सूखे होंठ फड़फड़ते और वह अपनी कांपती हंथेलियों को मेरे चेहरे, मेरे पसीने से लथपथ सिर की तरफ बढ़ा देती मुझे थोड़ी रहत मिलती पर ठीक अगले ही पल उसका चेहरा पीला-ज़र्द हो जाता और वह अपनी सूनी-सूनी मवादी आँखों से खिड़की के पार खड़े नीम के उस सूखे ठूंठ पेड़ को देखने लगती, जिसपर आज भी अलस्सुबह एक गिद्ध आकर बैठ जाता है माँ आखिर कब तक और कितने सवालों के जवाब देती? एक दिन चुपके से चली गयी मौन हो गयी और मैं हमेशा-हमेशा के लिए अकेला हो गया नितांत अकेला
तुम नहीं जानती कोई नहीं जनता सिर्फ मैं जनता हूँ एक बार व्यथाओं के उमस से भरी हुयी रात में माँ ने मुझे बताया था नाली के किनारे, एक बरसाती काली रात में कीचड के बीच मैं पैदा हुआ था प्रसव की पीड़ा को पीते हुए अपनी टांगों पर पड़े अपने कलंकी संतान को जब माँ ने अपने करीब खींचा, तो एक बूढ़ी कुतिया उसे चाट रही थी उसी हालत में माँ ने मुझे टटोला और चीख पड़ी---नहीं, नहीं...ऐसा नहीं हो सकता पर ऐसा हुआ था न चाहते हुए भी, ऐसा हुआ था और तभी माँ को प्रतीत हुआ था कि कुछ खूंखार काले हाँथ लगातार मेरी तरफ बढ़ रहे हैं उसे फ़ौरन समझ में आ गया कि वे लोग मुझे लेने आये हैं और वे उसके जीवन के इस इकलौते सहारे को छीन कर के ही मानेंगे फिर क्या था, उसी पल, उसी हालत में, मुझको सीने से चिपका कर माँ वहां से भाग खड़ी हुयी थी और इस अनजान शहर में आकर उसकी भीड़ में छुप गयी थी उस समय यहाँ न तो वह किसी को जानती थी और न ही कोई उसे पहचानता था और तब यहाँ न तो मुझे कोई उससे छीनने वाला था और न ही उस पर कोई हंसने वाला था
आसमान में काले बादल छ गए हैं हवा चलनी बिलकुल बंद हो गयी है दूर मेंड़ों के पास से उठने वाली मेंढकों की टर्र-टर्र साफ़ सुनायी पड़ रही है झींगुरों की आवाज़ भी इस पूरे वातावरण को संगीत मय बना रही है मैं तुम्हारे पत्र को फिर से पढता हूँ उद्द्वेलित होता हूँ और याद आती है तुमसे हुयी वह पहली मुलाकात
---हेलो हैंडसम, हाउ स्वीट! कितनी दिलकश है तुम्हारी आवाज़...गिव मी योर आटोग्राफ प्लीज़ और तुमने अपनी खूबसूरत नर्म हथेली को मेरे सामने फैला दिया था
मैं हिचकिचाया था और झिझक कर अलग हो गया था मैं हर बार की तरह कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद भीड़-भाड़ से बचते हुए फ़ौरन वहां से निकल जाना चाहता था पर तुम तो जैसे पहले से ही कुछ तय कर के आयी थी तुमने फ़ौरन ही अपनी बड़ी बड़ी आँखों को नचा कर मेरे कंधे पर अपना हाँथ रख दिया था---गिव मी आटोग्राफ, प्लीज़ और तुमने फिर से अपनी हंथेली सामने कर दी थी और तब मुझे मजबूरन तुम्हारी हंथेली पर अपना नाम लिखना पड़ा था
 लेकिन तुम इतने भर से कहाँ मानने वाली थी---दट्स लाइक ए गुड ब्वाय आओ चलो, कहीं बैठ कर तुम्हारी कामयाबी को सेलिब्रेट करते हैं...चलो कॉफ़ी हाऊस चलते हैं और इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, तुम मुझे खींचते घसीटते हुए कॉफ़ी हाऊस में लेकर आ गयी थी मैंने देखा कि मेरी निकटता पाकर तुम उस दिन हवा की लहरों पर सवार होकर नाच रही थी और शायद न चाहते हुए मैं भी और वाकई उस समय हमारे बीच कोई भी ऐसा वैसा रेगिस्तान नहीं पसरा हुआ था   
पहली मुलाकात के बाद की कुछ और छोटी-मोटी मुलाकातें और आज यह पत्र मैं जनता था तुम्हें आश्चर्य भी होगा पर यकीन मानों, जिस दिन तुम मेरे संपर्क में आयी थी, ठीक उसी दिन मैं जान गया था कि एक न एक दिन तुम मुझ गरीब भिखारी के आगे अपने दोनों हाँथ ज़रूर फैला दोगी क्योंकि जहाँ तक मैं तुमको जान पाया हूँ, तुम अपने सपनों, आकांक्षाओं और इच्छाओं की दुनिया को हर हाल में फ़ौरन साकार कर लेना चाहती हो। जैसे कि अब तुम मुझे पूरी तरह से पाना और अपने प्यार को रिश्ते की एक डोर से बाँध लेना चाहती हो।   
पर अंता, भावनाओं की जगह कुछ ठोस-सच्चे रिश्तों की ज़रुरत होती है मैं जनता हूँ...हाँ, कुछ ठोस सच्चे रिश्ते! पर....तुम्हें नहीं मालूम तुमने कभी गौर भी नहीं किया तुमको तो बस प्यार चाहिए था प्यार का रूमानी संसार चाहिए था और चाहिए था प्रेमी के रूप में मेरे जैसा खूबसूरत और स्मार्ट दिखने वाला कोई युवक तुमने पाया भी पर गैलरी में, सडकों पर, बागीचे में, पार्क में, हर जगह और हर वक़्त मैंने यही कोशिश की कि मैं कभी भी तुम्हारे सामने अकेला-नंगा न होने पाऊँ कहीं कुछ खुल न जाये क्योंकि एकांत में हर प्रेमी जोड़ा सिर्फ नर और मादा होता है और घूम फिर कर उनकी बातें शरीर पर आ जाती हैं प्यार पर देह भरी पड़ने लगता है और मैं...!! मैंने तुम्हें बताया न, जब भी कोई लडकी मेरे करीब आकर खड़ी हो जाती है, मैं न चाहते हुए भी उससे कट कर दूर हो जाता हूँ बहुत दूर इसीलिये मैं जान बूझ कर कभी भी तुम्हारे पास निपट अकेला नहीं रहा तुम्हें याद होगा, हमारे बीच कोई न कोई बहस पड़ी रहती थी और पहरेदार के रूप में हरवक्त खड़ी रहतीं थीं ढेरों बातें। दुनिया ज़हन की ढेरों खबरे और जीवन, समाज और राजनीति से जुड़े हुए ढेरों मसले
जब मैंने पहली बार अपने आप को गौर से देखा था, समझा था, मेरी मुट्ठियाँ कस गयी थीं और कांपते हुए जबड़े भिंच कर कड़े हो गए थे आक्रोश में मैं, कुछ भी न कर पाने की वजह से, बदहवास बडबड़ाने लगा था भारी-भारी लाल हथौड़े सिर पर बजने-घनघनाने लगे थे होंठों पर सफ़ेद फेन की परतें चढ़ने-उतरने लगी थीं और तब पहली बार जी में आया था कि माँ का, बिछावन पर पड़ी उस बूढ़ी असहाय औरत का गला घोंट दूं और चीखते हुए सडकों पर दौड़ पडूं माँ का निरीह चेहरा मेरे आगे सिसक रहा था वह रो-रो कर मुझे कुछ समझाने की बेइंतहा कोशिश कर रही थी मैं आवेश में उठा था मैंने उसे गौर से देखा था और काफी देर तक देखता रहा था लेकिन अंत में हार कर उससे चिपट गया था हमारी हिचकियाँ और टूटती हुयी साँसें एक दूसरे में गुंथ सी गयी थीं और नीम का पुराना ठूंठ पेड़ खड़खड़ा कर हिलने लगा था और उस पर बैठा हुआ गिद्ध उड़ गया था
आज भी कभी कभी जी में आता है कि काट दूं या जला कर राख कर दूं उस पेड़ को या पत्थर मर-मर कर उन दोस्तों और आसपास खड़े-बिखरे उन तमाम हवसी-तमाशाई लोगों को खूनम-खून कर दूं, जिन्होंने मुझे बहुत जल्दी ही देह की परिधि में डाल दिया था पर सवालों की भूमि पर निरंतर सवाल उपजते रहते हैं और मैं भी माँ की सूनी आँखों की तरह थक हार कर चुपचाप इस सूखे पेड़ को बस देखता रहता हूँ शायद आदमी जब बहुत थक जाता है, तब उसकी आँखें टिकने के लिए कोई न कोई बिंदु, कोई न कोई अवलंब तलाश कर ही लेती हैं
माँ की सलाह पर और खुद सोच-समझ कर मैंने नियमित व्यायाम और निरंतर रियाज़ करना शुरू कर दिया था सेहत सुधरी थी और आवाज़ का जादू दिन पर दिन असरदार होने लगा था सुदृढ़ काया और सुडौल मांसपेशियों को देख कर ही मास्टर साहब ने कहा था---तुम मिलिट्री में क्यों नहीं चले जाते?
तब पड़ोसी मुल्क से युद्ध चल रहा था देश को गायक, सितार वादक, मास्टर और वकील से अधिक एक सैनिक की आवश्यकता थी पर एक सैनिक और सिपाही के लिए अच्छी सेहत की नहीं, अच्छे निशाने की नहीं, अच्छी और पाक देशभक्ति की नहीं, मेडिकल चेकअप में चुने हुए एक परिपूर्ण मर्द की ज़रुरत होती है मास्टर साहब को तब मैं कोई ज़वाब नहीं दे पाया था देता भी क्या? और कैसे? मास्टर साहब की आश्चर्य से फटी हुयी आँखें और यार-दोस्तों की खिलखिलहटें शायद मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता मन मसोस कर रह गया माँ भी चाहती थी कि मैं या तो मास्टर बनूँ या फिर वकील इसलिए बाद में सोच कर तय किया कि सैनिक, सिपाही या मास्टर नहीं वकील बनूँगा क़ानून से अपने लिए हक मांगूंगा मन की शांति और शौक के लिए गायक बनूँगा और रविशंकर जी की तरह सितारवादक बनूँगा और धन कम कर गरीबी के नरक से छुटकारा पाऊंगा
वैसे, हक माँगा नहीं छीना जाता है मैं जनता हूँ और हक़ छीनने के लिए संगठित-एक जुट होना पड़ता है यह भी मुझे पता है लेकिन मैं कमज़ोर था असहाय अपनी असलियत से डरा सहमा लाज्जित और फिर मैं किस को संगठित करता? उनको, जिनके बीच मैं आज तक नहीं गया? या उनको जिनके बीच रहते हुए भी मैं आज भी अजनबी और पराया हूँ इसीलिये मैंने एक दूसरा ही रास्ता चुन लिया सोचा, एक दरिन्दे समूह से, कुछ वहशी लोगों के गिरोह से अकेले लड़ने-जूझने और हरने के बजाय पहले उनके बीच शामिल हो जाओ उन्हीं की तरह रहो उन्हीं की तरह बातें करों उनकी हाँ में हाँ मिलाओ उनकी ख़ुफ़िया गिरी करो एक एक करके उनकी कमजोरियों का पता लगाओ धीरे-धीरे उनके लोगों को अपनी बातें समझाओ उनको उकसाओ और मौका देख कर वहां विद्रोह के बीज बो दो यही सब सोच कर मैं खामोश रह गया और सितार के तारों में डूब कर तुम्हारी दुनिया का न होने के बावजूद तुम्हारी दुनिया में पूरी तरह से रच बस गया हूँ
आज उसी सितार के सारे तार टूट गए हैं मुझे नींद नहीं आ रही है मेरे चरों तरफ सिगरेट के टोंटे बिखरे पड़े हैं और कसैले धुंए की गंध के बीच मैं अपने आप को छिपाने की अथक कोशिश कर रहा हूँ पर बड़े बड़े नाखूनों वाले पंजे लगातार मेरी तरफ बढ़ रहे हैं कहीं ये मुझे दबोच न लें यकायक मौसम बहुत गरम हो गया है
पहले मैं सिगरेट नहीं पीता था पीता भी कैसे? सिगरेट पीना बुरा होता है स्वस्थ्य के लिए हानिकारक होता है ऐसा पढ़ा था सुना था मोहल्ले के लोगों और माँ ने भी यही सीख दी थी माँ को तो सिगरेट से वैसे भी सख्त नफरत थी
उस दिन दोस्तों की महफ़िल जमी हुयी थी चाय की गर्म चुस्कियों और रसयुक्त बातों के बीच सिगरेट का धुंआ उठ रहा था पर मैं उनकी बातों से कटा दूर चुपचाप चाय पीने में व्यस्त था उनकी बातचीत का विषय, लहजा और मानसिकता मुझे कहीं से भी बांध नहीं पा रही थी एक तरह से मुझे उनके ऊपर तरस आ रहा था मैं उठ कर जाने की सोच ही रहा था कि एक दोस्त ने आग्रह किया----तुम भी लो एकाध कश!
---नहीं, मैं सिगरेट नहीं पीता मैंने साफ़ मना कर दिया था  
---लो फूंको यार, क्या हिंजड़ों जैसी बाते करते हो?
और धुएं के बादलों के साथ जोरदार ठहाके हवा में फ़ैल गए थे मुझे लगा था, मानों किसी ने मेरे ऊपर खलता हुआ तेल फेंक दिया हो मैंने अपने पूरे शरीर पर फफोलों की जलन महसूस की थी अगले ही पल मेरी कांपती उँगलियों और फड़फड़ते हुए होंठों के बीच सिगरेट थी और मुंह-नाक में ढेरों धुंआ उस दिन सरे दोस्तों को आश्चर्य में डालता हुआ मैं एक पर एक कई सिगरेट पीता चला गया था काफी देर बाद मैं थरथराते हुए उठा था चाय-समोसे का पैसा काउंटर पर ही अदा किया था रोज की तरह कहकहे वाली मेज़ पर बिल मगा कर हंसते हुए नहीं रास्ते की छोटी सी दूरी काफी देर में तय कर के घर आया था अकेला खामोश घर रोज़ की तरह मेरी प्रतीक्षा में खड़ा था पर मैं उसे देख कर मुस्कराया नहीं एक ही झटके में खुल जाने वाले ताले को खोलने में मुझे उस दिन काफी देर लगी थी
कमरे के अन्दर आकर और दरवाज़ा बंद करके मैंने पहले तो देर तक स्विच को ऑन-ऑफ किया फिर घुप्प अँधेरा करके अपने सारे कपड़े उतार कर परे फेंक दिया अब मैं पूरी तरह से वस्त्रहीन था मैंने नंगेपन को छू कर देखा और सूखे खुरदुरे स्पर्श को महसूस करके बेचैनी से पलंग पर लेट गया खुरदुरी ज़मीन पर हंथेली घूमने लगी लगातार तेज़ और तेज़ साँसे फूल कर अपने चरम पर पहुँचने गयीं पर व्यर्थ अस्पष्ट निराकार खाली खोखला हताशा से भरा हुआ और सिर्फ फूलती हुयी साँसें मेरा पूरा शरीर पसीने से भींग कर तरबतर हो गया था पर तभी अचानक मैं अन्दर तक काँप उठा था सिहर कर हाँथ-पाँव ढीले पड़ गए थे और तनी हुयी हड्डियों में डर की एक लहर दौड़ गयी थी अंधेरे कमरे में रोशनदान के ज़रिये रोशनी की एक पतली किरण पलंग पर पड़ रही थी और माँ की तस्वीर एकटक मुझे घूर रही थी मैंने देखा कि माँ की आँखों से आंसू टपक रहे हैं और वह जार-जार रो रही है उस दिन मैं पूरी रात सितार बजता रहा था उंगलियाँ कट कर खूनम खून हो गयी थीं
तुम्हारा पत्र मैं एक बार फिर से पढता हूँ प्यार और भावुकता में डूबी हुईं तुम्हारी रूमानी बातें मुझे बहुत ही प्यारी लग रही हैं जी करता है कि पढता ही रहूँ तुम्हारी दैहिक खुशबू भी मैं इस समय साफ-साफ़ महसूस कर रहा हूँ अंता, तुम्हारी तरह मैंने भी हरवक्त यही चाह है कि तुम मेरे पास यूं ही सिकुड़ी सिमटी हुयी बैठी रहो मैं तुम्हारे बालों को सहलाता रहूँ और तुम मेरी आँखों के सूने पन में अपने प्यार का सतरंगी इन्द्रधनुष भर दो तमाम नियम और रिश्तों की बंदिशों को तोड़ कर तुम मेरी हो जाओ और मैं तुम्हारा मैं भी तुम्हें प्यार करता हूँ बेइंतहा प्यार! पर हर बार यूं ही कुछ आकर खट से गले में फंस जाता है और मैं अपने सारे सपनों, सारे अरमानों को परे झटक देता हूँ हर बार ताजमहल बनने से पहले यूं ही एक महायुद्ध सा छिड़ जाता है और मेरे न चाहते हुए भी आँखों के सामने एक चमकीला तपता हुआ रेगिस्तान आकर पसर जाता है...रेंग-रेंग कर पार करने के लिए
सामने वाले ताड़ के पेड़ से चीखता हुआ एक चमगादड़ उडता है और बिजली के नंगे तारों से जाकर चिपक जाता है चिंगारियां निकलती हैं कुछ देर तक वह छटपटाता है चीखता है और शांत हो जाता है मैं भी तड़पकर तुम्हारे पत्र को मुट्ठी में बंद करता हूँ और होंठों से लगा लेता हूँ
---हाँ...अंता, यह सच है कि देह, द्रव्य और दीवारों की बंदिशों से घिरे इन आड़े-तिरछे सामाजिक रिश्तों के बीच मैं किसी का कुछ भी नहीं हो सकता...हाँ, रिश्तों की कुछ नयी परिभाषाएं मैं ज़रूर गढ़ना चाहता हूँ पर उफ़! निपट अकेला मैं और बिजली का यह नगा तार!...मेरी सोच इस समय भी लकवाग्रस्त हो रही है और वाकई मुझे दूर-दूर तक कहीं कुछ भी नज़र नहीं आ रहा...क्या तुम सहस करके मुझे कोई ऐसा सही रास्ता सुझा सकती हो, जिस पर चल कर हम दोनों प्यार की भरपूर ज़िंदगी जी सकें?  
@अरविन्द कुमार
(यह कहानी "सुजाता" के मई अंक में प्रकाशित हुयी है)