गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

आज बाबा डार्विन की दो सौवीं सालगिरह है

आज से दो सौ साल पहले यानि कि12 फरवरी १८०९ को "विकासवाद" एवं "योग्यतम की उत्तरजीविता" के सिद्धांत के जनक चार्ल्स डार्विन का जन्म हुआ था। डार्विन की इन क्रांतिकारी स्थापनाओं ने न तब धर्म आधारित तमाम मान्यतायों या आस्थाओं को खंड-खंड किया था, बल्कि धर्म द्वारा संचालित राजसत्ता के समक्ष कई कठिन चुनौतियाँ भी खडी कर दी थीं। डार्विन को तब धर्म विरोधी और नास्तिक कह कर काफी आलोचना की गयी थी।

हालाँकि डार्विन के सिद्धांत “योग्यतम की उत्तरजीविता ” का विचार कुछ विवादस्पद है और वो भी शायद इसलिए कि यह कहता है कि धरती पर अंततः वही बचेगा जो शक्तिशाली होगा। सामाजिक,आर्थिक व राजनितिक सन्दर्भों में लागू करते हैं, तो यह नस्लवाद, जातिवाद, पंथवाद यानि कि संक्षेप में कहें तो साम्राज्यवादी विचारों को बल देता हुआ प्रतीत होता है। और डार्विन साम्राज्यवाद के समर्थक लगते हैं। मार्क्स और एंजेल्स बहुत ही सटीक और परिमार्जित तरीके से डार्विन के इस प्रस्थापनाओं को सामाजिक व राजनितिक सन्दर्भों से जोड़ने का काम किया है । बहरहाल----

इसमें कोई शक नहीं कि आज का पूरा विज्ञानं जगत डार्विन और उनके सिद्धांतों का ऋणी है. क्योंकि इन्ही सिद्धांतों की रोशनी में जीवों की उत्तपत्ति और प्राणियों के विकास को समझने में मदद मिलती है। ऐसे महान व क्रांतिकारी वैज्ञानिक को आज शत-शत नमन।

आज जहाँ पूरी दुनिया बाबा डार्विन की २०० वां जन्मदिन मना रहा है, वहीं नेपाल में जन क्रांति की १४वी वर्षगांठ मनाई जा रही है। आज ही के दिन नेपाल की माओवादी पार्टी ने वहाँ की जनविरोधी राजशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष का शुभारम्भ किया था। आज ही वहाँ की माओवादी पार्टी अपनी पीपुल्स आर्मी की ८वी सालगिरह भी मना रही है।

नेपाल अब बदल रहा है। वहां राजशाही ख़त्म हो चुकी है । सदिओं से जनता पर अपना अन्यायपूर्ण शासन करने वाले राजा आज महल से निकाले जा चुके है। अब नेपाल एक एकीकृत हिंदू राष्ट्र नही, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बन गया है । अब वहां जनता का नया सविधान लिखा जा रहा है । अगला चुनाव इसी संविधान की रोशनी में लड़ा जाएगा। हालाँकि नेपाल को अभी एक लंबा रास्ता तय करना है । पर शायद जल्दी ही वह दुनिया के नक्शे पर एक नया समाजवादी देश बन कर उभरेगा। ऐसा लगता है।

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