सोमवार, 2 मार्च 2009

यह न्याय है या....

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। पर लगती बिल्कुल फिल्मों जैसी है। अशोक राय उर्फ़ अमित नाम के एक तेज-तर्रार और मेधावी लड़के के पास एक लडकी ट्यूशन पढ़ने जाती थी। पढाते-पढाते उस शिक्षक युवक की नीयत ख़राब हो जाती है। और एक दिन धोखे से प्रसाद में नशीला पदार्थ मिलाकर वह उस लडकी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना लेता है। इतना ही नहीं, अशोक राय अब उस लडकी को शादी का झाँसा देकर लगातार उस के साथ महीनों बलात्कार करता है। अपने परिचितों के साथ सोने के लिए उस पर दबाव बनाता है। और जब लडकी गर्भवती हो जाती है, तो उसको माला-डी की गोलियां देकर उसका एबार्शन करने की कोशिश भी करता है। इस ज़लालत और घिन भरी ज़िंदगी से तंग होकर वह लडकी एक दिन आत्महत्या कर लेती है।
वर्ष
२००३ में राय के खिलाफ दिल्ली के कृष्णा नगर थाने में आई पी सी की धारा ३७६ और ३०६ के तहत बलात्कार व आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया जाता है। निचली अदालत अशोक राय को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है। और वह जेल भेज दिया जाता हैसब को लगता है की चलो, पीड़ित लडकी को न्याय मिल गया। उसकी मृत-आत्मा को शान्ति मिल गयी। बलात्कार करने और आत्महत्या के लिए उकसाने वाले को फाँसी न सही, कम से कम उम्रकैद की सज़ा तो मिली। अंत भला तो सब भला....
पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुयी। यह तो सिर्फ़ इंटरवल था। अशोक राय जेल में रहते हुए आई ए एस की परीक्षा पास कर लेता है। और उत्साहित हो कर उच्च न्यायलय में अपील करता है। उच्च न्यायलय में धारा ३७६ के तहत तो उसकी अपील खारिज कर दी गयी, पर जेल में उसके चाल-चलन और उसके आई ए एस की परीक्षा पास करने के कारण उसकी बलात्कार की उम्रकैद वाली सज़ा कम करके सिर्फ़ साढ़े पॉँच साल कर दी गयी। पर चूँकि वह अब तक इतनी सज़ा काट चुका था, इसलिये उसे रिहा कर दिया गया। लेकिन ३०६ के तहत राय पर लडकी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप कत्तई साबित न हो पाने के कारण उसे बाइज्जत बरी कर दिया गया। और अब वह बलात्कारी एक आई एस अधिकारी बनने की राह पर शान से बढ़ चला है।...
दिल्ली उच्च न्यायलय के इस चर्चित फैसले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी बलात्कारी की सज़ा को कम करने के लिए उसके अच्छे चाल-चलन का सबूत यह माना जाना चाहिए की उसने जेल में रह कर आई ए एस की लिखित परीक्षा पास कर ली है? क्या आई ए एस की परीक्षा पास कर लेना ही अच्छे व्यवहार का सबूत है ? क्या इसका मतलब यह निकाला जाए की अगर कोई आई ए एस अधिकारी या पढ़ा-लिखा व्यक्ति बलात्कार जैसा कोई जुर्म करे तो उसे कम से कम सज़ा मिलनी चाहिए ?
अशोक राय ने ये अपराध भूल वश नहीं, बल्कि अपनी विकृत मानसिकता के चलते बहुत ही सुनियोजित तरीके से ठंडे दिमाग से किए थे। माना की क़ानून और अदालत का काम सिर्फ़ सज़ा देना ही नहीं, सुधरे हुए कैदियों को समाज की मुख्या धारा में शामिल भी करना होता है। पर क्या अब राय वाकई सुधर गया है ? उसकी मानसिकता सच में बदल गयी है ? या क्या उसने मुरैना या भिंड के डान्कुओं की तरह कानून के सामने आत्म-समर्पण किया है और कसम खाई है की भविष्य में वह ऐसी हरकत दुबारा नही करेगा ? इस बात की क्या गारंटी है ? पर माननीय न्यायलय ने तो सिर्फ़ उसके आई ए एस की परीक्षा को पास करने को ही आधार माना है। तो फ़िर ?
राय ने जो किया है वह कानून की नज़र में एक अपराध है। एक संगीन अपराध। उसको इसकी सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए। ताकि दूसरे बलात्कारी डरें। न्यायलय के इस फैसले से समाज में यह संदेश जा सकता है की अदालतें अब बलात्कार की गंभीरता कम कर के देखने लगीं हैं।....अशोक राय तो शायद अब समाज की मुख्य धारा में शामिल हो जाए, पर उस लडकी के साथ जो हुआ और इसकी वज़ह से उसके परिवार को जो बदनामी व ज़लालत की ज़िंदगी झेलनी पडी, उसको असली न्याय कैसे और कब मिलेगा ? यहाँ ज़ुल्म राय के साथ नहीं, उस लडकी और उसके परिवार के साथ हुआ है। आशा है उच्चतम न्यायलय इन बिन्दुओं पर अवश्य ध्यान देगा। क्योंकि अंतिम फैसला तो अब उसी को करना है।वैसे, आप क्या सोचते हैं ?
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)
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