मंगलवार, 24 मार्च 2009

यह सांस्कृतिक सन्नाटा चिंताजनक है--दो

मुम्बई पर हुए आतंकी हमले के बाद बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों की इस तरह की चुप्पी के चलते अब उन सारे लोगों व समूहों को भी, जो साध्वी-प्रज्ञा तथा पुरोहित प्रकरण के उजागर हो जाने से पहले कुंठाग्रस्त सकते में आ गये थे, यकायक एक ऐसा बड़ा मुद्दा मिल गया, जिससे उनकी सोच व उनके भीतर भरी-दबी जहरीली भॅड़ास खुलकर बाहर निकलने लगी। उनको लगा कि यही वह सुनहरा अवसर है, जब पाकिस्तान को पूरे विश्व समुदाय से काट कर पंगु बना दिया जाये। कई लोग तो सरकार पर दवाब भी डालने लगे कि वह तुरन्त पाकिस्तान पर हमला बोल दे।
परन्तु आज के अधिकांश कवि, लेखकों एंव संस्कृतिकर्मियों को इस से क्या ? वे तो इन तमाम कडुवी सच्चाईयों से आँख मूँद कर काल्पनिक घटनाओं और मध्यवर्गीय कुंठाओं को ही अपनी कृतियों में उकेर रहें हैं। वे भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के इन्द्रजाल में फँस कर और इंडिया शाइनिंग और भारत निर्माण की तर्ज पर सिर्फ और सिर्फ शहरी विकास, अमीरों की अमीरी और मध्यवर्ग या उच्च मध्यवर्ग की विलासिता एवं यौन-ग्रन्थियों को ही घुमा-फिरा कर बार-बार पाठकों और दर्शको के सामने परोस रहें है। गरीबों की गरीबी और वंचितों के दुःख दर्द पर उनकी निगाह जाती भी है तो सिर्फ़ भाववादी या कि यथास्थितिवादी दृष्टिकोण से ग्रस्त हो कर। जीवंत यथार्थ और सच्चाई पर आज एकदम खामोश है इनकी लेखनी और आवाज । यही नहीं, ऐसे लेखक-कवि और कलाकार संगठित रूप से हमेशा इस तरह की तिकड़में व साजिशें भी करते रहतें हैं कि सच्चे, समर्पित और ईमानदार प्रगतिशील एवं जनवादी संस्कृतिकर्मी को कभी भी साहित्य-संस्कृति में उचित स्थान और सम्मान न मिलने पाए।
ये कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिन पर आज बृद्धिजीवियों को मिल-बैठ कर विचार-विर्मश करना चाहिए। और सिर्फ विचार-विर्मश ही नहीं, समाज को बेहतर बनाने के लिए उनको कुछ मूर्त व सार्थक हल भी खोजना चाहिए। क्योंकि संकट की घड़ी में बुद्धिजीवियों को अक्सर दार्शनिक व सृजनकर्ता की भूमिका गंभीरता पूर्वक निभाते हुए आगे बढ़कर समाज-सुधारक व पथ-प्रदर्शक का दायित्व भी निभाना पड़ता है। पर आज का बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबका तो उलटा अपने में डूब कर ठीक नीरो की तरह अपना वायलिन बजा रहा है। और सतह पर उभर आयें हैं कुछ ऐसे कु-बुद्धिजीवी, जो समाज को धर्म या जाति या फिर क्षेत्र और भाषा की अपनी समझ की रोशनी में नए सिरे से परिभाषित कर के रचना-बुनना चाहतें हैं। उनका अंध-राष्ट्रवाद और घृणा-आधारित अस्मितावाद इस देश और समाज को फिर से अतीत के उस गहरे व अंधेरे गर्त में धकेल देना चाहता है, जहाँ तमाम सड़े-गले मूल्य पुनर्जीवित होकर जनसमुदाय को पुनः अपने बर्बर चंगुल में जकड़ लेगें। और तब हम निश्चित तौर पर इन्सान नहीं, जानवरों के झुंड में तब्दील हो जायेंगे।
आज इतिहास के नाम पर एक तरफ हमारे पास विवादस्पद वक्तव्यों का एक भींगा और भारी पुलिंदा है, तो दूसरी तरफ भविष्य के नाम पर सवालों का एक घना अंधेरा जंगल। और वर्तमान ?.....विरासत से मिले सभी सकारात्मक मूल्य आज एक-एक करके बिखर रहे हैं। और जो नए मूल्य बनते हुए दीख रहे हैं, उनकी शक्लों-सूरत तमाम पुरातन-पंथी विचारों, रूढियों, अंध-विश्वासों, कूप-मंडूकताओं, बर्बरता के कालेपन और पश्चिमी नंगी उपभोक्ता व भोगवादी संस्कृति की चमक-दमक के साथ इस कदर गड्ड-मड्ड है कि अगर वाकई आने वाले कल की नींव इन्हीं मूल्यों पर पड़ गई तो, जो भविष्य हमें मिलेगा वह निश्चित तौर पर बहुत ही विकृत, विषैला, व अमानवीय होगा।
दूसरो शब्दों में कहें तो तब हर तरफ, हर ताने बाने में बजबजाते हुये बहुआयामी भ्रष्टाचार, कमीशन खोरी और दलाली का राज होगा। समाज में अपराध, दंगा-फसाद, गिरोह-बंद गुंडागर्दी का बोलबाला होगा। समस्त राजनैतिक व सामाजिक नैतिक मूल्यों में असोचनीय गिरावट होगी। लोगों मे निराशा, हताशा, असंतोष और बेचैनी होगी। और इन सबके ऊपर नृत्य करेंगी, मुक्त बाजार की सर्वग्रासी नीतियाँ, पश्चिम से आयातित खालिस वासना व विलास की संस्कृति और भयावह तानाशाही और अंधे राष्ट्रªवाद की क्रूर आहटें, धार्मिक उन्माद, उग्रवाद व आतंकवाद की क्रूर व हत्यारी वारदातें! तब कहाँ होगा मनुष्य ? और कहाँ बचेगी मानवता ?......अगर सब कुछ इसी तरह से चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब सौंदर्य, दया, प्रेम, भाईचारा, एकता और सुख-शांति का हमारे समाज व जीवन से पूरी तरह से लोप हो जाएगा। तब न तो सत्य होगा और न शिव। विकृति ही विकृति होगी चरों तरफ। तब उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों के सृजन व उनको समाज में स्थापित करने की नैसर्गिक मानवीय जीजिविषा का क्या होगा ?
इसलिए आज के इस दौर में जबकि लोगों को पढ़ने-लिखने, सोचने-समझने आदि से विमुख करके पूरी तरह से यंत्र-मानवों या फ़िर जंगली जानवरों में तब्दील करने की कोशिशें की जा रही हैं और तर्कहीनता व विचार शून्यता के इस अंधे माहौल में, जब संचार माध्यमों खास करके इलेक्ट्रानिक माध्यमों द्वारा रचे जा रहे विचार व भोंडे सौंदर्यशास्त्र ने आम लोगों की ही नहीं बहुसंख्यक कवियों , लेखकों, पत्रकारों व संस्कृतिकर्मियों को भी पूरी तरह से अपने उपभोक्तावादी मकड़जाल में फँसा लिया है, सभी बुद्धिजीवियों को अपनी असल जिम्मेदारी समझनी होगी। सभी सोचने-समझने वालों को अपनी निद्राग्रस्त-सीमाओं को तोड़कर आगे आना होगा। वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक संकट की सम्यक जांच-पड़ताल व चीर-फाड़ करते हुए उसके मूल कारणों की तलाश करनी होगी। और समूचे माहौल को बदलने के लिए उन कारणों-कारकों पर विभिन्न स्तरों पर कारगर ढंग से हस्तक्षेप और उनके खिलाफ कमर कस कर संघर्ष भी करना होगा। तभी हो पायेगी समाज में बुद्धिजीवी समुदाय की पुनस्र्थापना। अन्यथा नाटक के उस पात्र की तरह वे भी एक दिन महज एक आम हास्यास्पद पात्र बनकर रह जायेंगे।
एक टिप्पणी भेजें