रविवार, 16 अक्तूबर 2011

मेरे जीवन की तीन कहानियां

स्टीव जॉब्स सिर्फ मेरे ही नहीं, दुनिया के लाखों करोड़ो लोगों के प्रेरणा स्रोत रहे हैंऔर आगे भी रहेंगे. ज़मीन से उठ कर आसमान की बुलंदियों तक को छूने का उनका सफ़र उनके सपने, उनकी दृष्टि, उनकी सतत कर्मठता और अपने काम के प्रति उनके अटूट प्रेम की जीती-जगती मिसाल है...आज मैं यहाँ पर कैलिफोर्निया के स्टानफोर्ड यूनिवर्सिटी में दिए गए उनके व्याख्यान को "रविवार" से साभार लेकर प्रस्तुत कर रहा हूँ.
---अरविन्द कुमार
मेरे जीवन की तीन कहानियाँ---स्टीव जॉब्स

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

चलो आखिर इरोम शर्मीला की सुध तो आयी...

इस देश में कितना अजीब और खतरनाक सा चलन चल पड़ा है कि उसी अनशन को अनशन माना जाता है जिसके सिर पर मीडिया खास करके इलेक्ट्रानिक मीडिया अपना वरदहस्त रख देता है ? वरना वह सत्याग्रह नहीं दुराग्रह या आत्महत्या की कोशिश है मीडिया ने जहाँ अन्ना हजारे को रातों-रात पूरे देश के लिए एक आंधी बना कर गांधी या भगत सिंह बना दिया और अंततः सरकार को काफी हद तक झुकने के लिए मज़बूर कर दिया कारोबारी बाबा रामदेव को भी एक महान संत, भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाने वाला सन्यासी और क्रांतिकारी बना कर अन्ना के कद को काफी हद तक छोटा करने की पुरजोर कोशिश की और उनके खाते पीते अघाए भक्तों को भ्रष्टाचार से लड़ने वाले कटिबद्ध लोगों के रूप में चित्रित करने का भरपूर प्रयास किया तथा उनके और उनके जमावड़े के खिलाफ की गयी पुलिसिया कार्यवाही को लोकतंत्र की हत्या तक की संज्ञा दे डाली। वहीं केवल बिकने वाली चीज़ों को दिखाने और पढ़ाने वाले समूचे मीडियातंत्र को न तो गंगा की पवित्रता के लिए खनन माफियाओं के खिलाफ निरंतर अनशन करने वाले संत निगमानंद की चिंता हुयी और न ही मणिपुर के सशस्त्र सेना विशेषाधिकार क़ानून के खिलाफ पिछले लगभग ग्यारह साल से लगातार अन्न व जल का त्याग किये बैठी इरोम शर्मीला कहीं से कोई खबर बन पायीं। जहाँ निगमानन्द ने लगातार ६८ दिनों के उपवास के बाद चुप-चाप अपने प्राण त्याग दिए वहीं इरोम की हालत भी कम नाजुक नहीं है। वर्ष २००६ से ही सरकार उनको इम्फाल के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में पुलिस हिरासत में एक अपराधी की तरह रख कर और जबरन नाक के ज़रिये तरल पदार्थ दे-दे कर किसी तरह जीवित रखे हुए है। देखने में दुबली पतली पर अपने लौह विचारो की ताकत से लैस इरोम का पूरी दुनिया के राजनीतिक विरोधों के इतिहास में कोई सानी नहीं है। वे पिछले ११ वर्षों से सत्याग्रह पर है। इसके चलते वे दो विश्व रिकार्ड बना चुकी हैं। सबसे अधिक दिनों तक भूख हड़ताल करने का और सबसे ज्यादा बार जेल जाकर रिहा होने का। अदालत उन्हें बार-बार रिहा कर देती है। पर रिहा होते ही वे फिर से अनशन पर बैठ जाती हैं।
मणिपुर व अधिकांश पूर्वोत्तर राज्यों में ११ सितम्बर १९५८ से थोपे गए सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के विरोध में इरोम ने ४ नवम्बर २००० को अपना सत्याग्रह शुरू किया था। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून ( ए ऍफ़ एस पी ए ) एक अति-अमानवीय कानून है। इससे अशांत घोषित क्षेत्रों में सशस्त्र बालों को विशेष शक्तियां प्राप्त होतीं हैं। इस एक्ट के आधार पर सेना केवल शक के आधार पर ही किसी भी व्यक्ति को, कि वह अपराध करने वाला है या अपराध कर चुका है, गिरफ्तार कर सकती है या बिना सवाल-जवाब किये गोली मार सकती है। इसी की आड़ में सुरक्षा बलों ने मणिपुर में अब तक हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। मानवाधिकार के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ २००९ में ही ३०० लोगों का क़त्ल कर दिया गया था। यही नहीं, इस कानून की आड़ में पूर्वोत्तर राज्यों में हत्या, बलात्कार, टार्चर, गायब कर देने और गलत गिरफ्तारियों की भरमार हो गयी है। जिससे प्रतिक्रिया स्वरुप वहां नित नए-नए उग्रवादी संगठनों के लिए ज़मीन तैयार हो रही है। इस कानून को लागू करते समय जहाँ मणिपुर में ४ उग्रवादी संगठन थे, वहीं अब ४० हो गए हैं।
इरोम का अनशन कहीं से भी राजनीतिक नहीं है। वे मूलतः एक कवि हैं और उनका यह सत्याग्रह पूरी तरह से मानवीय आधार पर है, जो कि अपने आसपास निरंतर होने वाले हिंसा व मौत के तांडव को देख-देख कर संवेदना की स्वाभाविक प्रतिक्रिया स्वरुप उपजा है। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि इस सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को मणिपुर से हटाया जाय। फिर भी राज्य और केंद्र की सारी शक्तियां इस आन्दोलन का दमन करने पर तुली हुयी और एकजुट हैं। ६ साल तक मणिपुर में अनशन करने के बाद इरोम शर्मीला को लगा कि दिल्ली में बैठे रहनुमाओं तक उनके मौन सत्याग्रह की आवाज़ शायद दूरी की वजह से नहीं पहुँच पा रही है। इसीलिये उन्होंने ३ अक्टूबर २००६ को दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना डेरा डाल दिया। लेकिन यहाँ पुलिस ने उनको आत्महत्या का प्रयास करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। और इम्फाल के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के एक गंदे से कमरे में दाल दिया। यहाँ अब वे एक कैदी की तरह बंद हैं। यहाँ उनके भाई के अलावा और किसी को भी उनसे मिलने की इज़ाज़त नहीं है। माँ तो अब उनसे मिलने इसलिए भी नहीं आतीं कि मिलने से भावुकता बढ़ेगी। और इरोम कमज़ोर पड़ जायेंगी।
२००४ में प्रधानमंत्री की ओर से इस कानून की समीक्षा के लिए गठित जस्टिस रेड्डी समिति ने इस एक्ट को ख़त्म करने की सिफारिश की थी। स्वं प्रधानमंत्री इस कानून को बदल कर इसे मानवीय स्वरुप देना चाहते हैं। पर तब तत्कालीन रक्षामंत्री प्रणव मुखर्जी ने इसे सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब सुना है कि सरकार इस कानून पर दुबारा विचार करने को तैयार हो गयी है। और बात-चीत के ज़रिये इरोम की भूख हड़ताल तुडवाने की दिशा में सार्थक पहल कर रही है।
शायद इसे अन्ना हजारे के आन्दोलन का असर ही कहा जायेगा। वैसे भी अन्ना के भ्रष्टाचार के खिलाफ के आन्दोलन में इरोम शर्मीला से जुड़े संगठन "जस्ट पीस फौन्डेशन" ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। उन्होंने शर्मिला की तरफ से अन्ना को मणिपुर आने का न्योता भी दिया है। और संगठन का कहना है कि अन्ना इस के लिए तैयार हो गए हैं। अब देखिये आगे क्या होता है, पर यह एक सच है कि मीडिया की उपेक्षा के कारण यह समूचा देश इरोम के इस सत्याग्रह का सम्मान करने में पूरी तरह से असफल रहा है। जबकि पूरी दुनिया में उनको सम्मान की निगाह से देखा जाता है। २००६ में नोबल पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान इरोम के सत्याग्रह को अपना पुरजोर नैतिक समर्थन दिया था। और कहा था कि अगर इरोम शर्मिला मरती हैं तो इसके लिए भारत सरकार पूरी तरह से ज़िम्मेदार होगीइरोम को और अधिक जानने के लिए देखें...
(चित्र डब्ल्यू-आई आर जी डोट ओ आर जी से साभार)

सोमवार, 29 अगस्त 2011

क्या आप जने फोंडा को जानते हैं?

आज कल जने फोंडा एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं। पर इस बार अपने किसी बयान या विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं, अपनी सुन्दर, जवाँ और सेक्सी काया के कारण। अभी हाल में ही उनकी कुछ तस्वीरें जारी की गयी हैं। इन तस्वीरों को देख कर यह ज़रा भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि उनकी उम्र ७३ साल की है और वे दो प्रौढ़ व्यक्तियों की माँ हैं। इन तस्वीरों में दिखने वाली उनकी फीगर के हिसाब से वे हद से हद ३०-४० साल की महिला लग रही हैं, जिसको देख कर दुनिया का कोई भी पुरुष जहाँ झटके खा सकता है वहीं महिलायें ईर्ष्या से भर सकती है। और यह वाकई गौर करने वाली बात है। और सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि एक ज़माने की यह अमेरिकन एक्ट्रेस अपने उम्र के इस पड़ाव पर भी आज कल स्वास्थ्य एवं फैशन गुरु के रूप में काफी चर्चित एवं सक्रिय है।
जाने फोंडा का जन्म २१ दिसंबर १९३७ में हुआ था और उनका पूरा नाम लेडी जीने सेयमौर फोंडा है। अपने कर्रिएर की शुरुआत एक फैशन मोडल और फ़िल्मी एक्ट्रेस के रूप में करने वाली जने एक लेखक और राजनीतिक एक्टिविस्ट के रूप में भी काफी चर्चित रही हैं। एक एक्ट्रेस के रूप में उनको प्रसिद्धि लगभग १९६० के आस-पास मिलनी शुरू हुयी जब दर्शकों में उनकी "बर्बरेला"और "कैट बल्लोऊ" जैसी फ़िल्में हिट हो गयीं। जने को दो बार अकेडमी अवार्ड और कई एक फ़िल्मी अवार्ड मिल चुके हैं। और अपने ५० सालों के फ़िल्मी कर्रिएर में वे कई-कई बार पुरस्कारों के लिए नामांकित भी हो चुकी हैं। उनकी अन्य चर्चित फ़िल्में हैं "जूलिया" और "कमिंग होम"। १९९० के आसपास उन्होंने फिल्मों से लगभग सन्यास ले लिया। और सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने लगीं। १९८२ से १९९५ के बीच उन्होंने अपने कई स्वास्थ्य-वीडिओ रिलीज़ किये और कईयों में लीडिंग भूमिका भी निभायी। अपने पंद्रह वर्षों के फ़िल्मी सन्यास के बाद वे फिर से २००५ में "मोंस्टर इन ला " जैसी सशक्त फिल्म से वापस हुईं। और २००७ में "जॉर्जिया रूल" में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस बीच २००६ में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुयी, जो न सिर्फ एक चर्चित बल्कि एक विवादस्पद किताब भी साबित हुयी। और अभी पिछले साल २०१० में उनका एक नया स्वास्थ्य विडियो लॉन्च और खूब पसंद किया गया है
जने अपने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के लिए भी खूब जानी जाती हैं। खास कर के वियतनाम के खिलाफ युद्ध और ईराक के ऊपर किये गए हमलों का सक्रिय विरोध-प्रदर्शन करने के कारण। यही नहीं,पूरी दुनिया में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और हिंसा का वे पुरजोर विरोध करती हैं। और इसके लिए उन्होंने रोबिन मोर्गन और ग्लोरिया स्टेनेम के साथ मिलकर २००५ में "विमेंस मीडिया सेंटर "की स्थापना भी की है। वे अपने आपको लिबरल और फेमिनिस्ट मानती हैं। और आज काल स्वास्थ्य और फिटनेस गुरु के रूप में पूरी दुनिया को शिक्षित-प्रशिक्षित कर रही हैं। देखें उनका अपना ब्लॉग
(चित्र न्यूज़ सोर्स डोट काम से साभार)

सोमवार, 22 अगस्त 2011

कुल मिला कर "आरक्षण" एक बकवास फ़िल्म है

वैसे तो आज कल की हिंदी फिल्मों पर चर्चा करना और उन पर कुछ भी लिखना अपना समय बर्बाद करना है, पर न चाहते हुए भी "आरक्षण" फ़िल्म पर टिप्पणी करने से मैं अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूँ। पर इसकी वज़ह यह कत्तई नहीं है कि मैंने इस फ़िल्म से सामाजिक सरोकार की कोई बड़ी उम्मीद लगा रखी थी या कि मैं यह सोच रहा था कि शायद यह फ़िल्म अपने माध्यम से आज के युवा मनों में आरक्षण को लेकर चलने वाली तमाम उथल-पुथल को कोई तर्कसंगत दिशा देगी और जातिवाद की बढ़ती हुयी खाई को सामाजिक एवं राजनीतिक तौर पर पाटने के लिए अपनी सीमाओं में ही सही कोई सांकेतिक बौद्धिक हल सुझाएगी। और समाज में आरक्षण को लेकर नए सिरे से कोई वैज्ञानिक या जनपक्षीय बहस छिड़ जायेगी। आज की फिल्मों से इस तरह की कोई भी उम्मीद रखना कोरी बचपना ही नहीं बहुत बड़ी मूर्खता भी है यह मैं अच्छी तरह से जानता-समझता हूँ। अब चाहे उस फ़िल्म का निर्देशक प्रकाश झा ही क्यों न हो?
वैसे
भी, अब आज के प्रकाश झा पुराने "फोर्सेज आफ्टर दी स्टार्म" या "सोनल" जैसी डोकुमेंत्री या फिर "दामुल" जैसी फ़िल्म बनाने वाले प्रकाश झा तो हैं नहीं। अब वे भी इस मुक्त बाज़ार की गति व दिशा को अच्छी तरह से समझने वाले और दर्शकों को महज उपभोक्ता मान कर उनकी जेब से पैसा उगाहने वाले एक धुरंधर व्यवसायी बन गए हैं।आम मुम्बईया फिल्मों के आम निर्देशकों की तरह। आज के प्रकाश झा ने भी यह कला खूब अच्छी तरह से सीख ली है कि सामाजिक सरोकार के अति संवेदनशील मुद्दों को फिल्मों की विषयवस्तु बनाकर और उसे ग्लैमर की चासनी में लपेट कर बाज़ार में कैसे परोसा जाता है ? कैसे उसकी मार्केटिंग की जाती है ? कैसे दर्शकों के बीच फ़िल्म को एक बहुत बड़ी सनसनी के तौर पर प्रचारित किया जाता है? और कैसे उनको इस से तरह उद्वेलित और उकसाया जाता है कि वे हर हाल में फ़िल्म को देखने के लिए लालायित हो जाएँ?
आरक्षण के साथ तो उनहोंने हद ही कर दी। मीडिया के साथ मिलकर और अमिताभ बच्चन की छवि पर सवार होकर उन्होंने समाज में न सिर्फ एक ख्वामखाह की सनसनी खड़ी करने की कोशिश की, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक हर उन बिन्दुओं को भी इस तरह से उकसाने और भड़काने की कोशिश की जिससे जगह जगह "आरक्षण" का विरोध होने लगा और फ़िल्म को प्रतिबंधित किया जाने लगा। और प्रकाश झा बिलकुल यही चाहते थे। उनको पता है कि इस समाज में जो प्रतिबंधित होता है वह खूब बिकता है। अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जाकर उनकी यह फ़िल्म पूरे देश में प्रदर्शित हो पाई।पर न तो कही कोई हलचल हुयी और न ही कोई उथल पुथल।
जब दर्शकों ने फ़िल्म को देखा तो सब टाएँ-टाएँ फिस्स हो गया। नाम बड़े और दर्शन छोटे। फ़िल्म में नाम को छोड़ कर कहीं से भी आरक्षण का कोई मुद्दा नहीं था। न पक्ष में और ना ही विपक्ष में। और फ़िल्म की जो वास्तविक कथावस्तु थी और शिक्षा जगत में व्याप्त जिस समस्या पर वह गढ़ी-बुनी गयी थी उसका भी यथार्थ से कहीं भी दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था। पूरी की पूरी कोरी कल्पना। यही नहीं, मुझे तो इस फ़िल्म में कही भी किसी भी फ्रेम में निर्देशकीय कला कौशल बिलकुल नज़र नहीं आया। न भावना, न संवेदना। सब कुछ एकदम ढीला-ढाला, लचर और बेजान। मेहनत और दृष्टि की घोर कमी। लग ही नहीं रहा था कि हम एक मंझे हुए निर्देशक की कोई फ़िल्म देख रहे हैं। पूरी फ़िल्म में अमिताभ बच्चन को छोड़ कर और किसी को भी उभरने और अपने चरित्र को स्थापित करने का मौका ही नहीं दिया गया है। और अमिताभ बच्चन भी फ़िल्म में बहुत ही लाउड और यथार्थवादी पत्र के रूप में चित्रित किये गए हैं। काश प्रकाश झा ने मार्केटिंग की बजाय कथ्य,पटकथा और निर्देशन पर अधिक ध्यान दिया होता।
कुल मिला कर यह फ़िल्म एक औसत दर्जे की आम मुम्बईया फ़िल्म है , जिसको देखना समय और पैसे की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है।


मंगलवार, 16 अगस्त 2011

शेहला मसूद की हत्या एक शर्मनाक एवं कायर कृत्य है

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि हमारे देश में किसी सामाजिक कार्यकर्ता और खास करके किसी आर टी आई कार्यकर्ता पर जान लेवा हमला करके उसकी आवाज़ को जबरन दबाने का प्रयास किया गया हो। इतिहास हमें बताता है कि अन्याय, अत्याचार और शोषण पर आधारित हर देश और हर समाज में इस तरह की घटनाएँ आये दिन होती रहती हैं। पर शेहला मसूद की दिनदहाड़े की गयी हत्या कई मायनों में सिर्फ हमारे यहाँ की इस भ्रष्ट, मनुष्य विरोधी और अत्याचारी व्यवस्था के असली चरित्र को पूरी तरह से बेनकाब करती है, बल्कि उन तमाम लोगों की मुंदी हुयी आँखों को खोलने के लिए एक ज़बरदस्त झटका भी है, जिनको लगता है कि हमारा देश प्रगति कर रहा है, हमारी अर्थव्यवस्था कुछ ही दिनों में दुनिया में नंबर दो के पायदान पर पहुँच जायेगी और अब हम पूरी तरह से विकसित सभ्य हो गए हैं। शेहला मसूद की हत्या से बहुतों का यह भ्रम जाल तार-तार हो गया है।
इस कायरता पूर्ण घटना से पहली बात तो यह साबित होती है कि इस देश के आर्थिक,सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचे को चलाने वालों के पास सच को सुनने और उसको स्वीकार करने का साहस कत्तई नहीं है। वे अपने झूठ,लूट,फरेब और भ्रष्टाचार पर टिकी सत्ता को बचाने बरक़रार रखने के लिए बर्बरता की किसी भी हद तक जा सकते हैं। और दूसरी यह कि हमें आजादी या लोकतंत्र के नाम पर भले ही कई मौलिक अधिकार दे दिए गए हों, पर हकीकत में उन सभी पर इतनी बंदिशें और पाबंदियां लगी हुयी हैं कि हम चाह कर भी उन अधिकारों का बेधड़क स्वंत्रता पूर्वक पालन नहीं कर सकते। इस भ्रष्ट तंत्र ने आतंक, अपराध,गुंडागर्दी और दमन को इस तरह से अपनी ढाल या सुरक्षा कवच बना लिया है कि सच बोलना और सच के लिए लड़ना अब अपनी जान पर खेलने जैसा हो गया है।
शेहला मसूद को इसी बात की सज़ा मिली है। भाषा की खबर के अनुसार उनको मंगलवार (१६.०८.२०११) को उनके घर के ठीक बाहर गोली मार दी गई, जिसके चलते उनकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई। भोपाल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आदर्श कटियार ने यह स्पष्ट किया कि शेहला मसूद आज अपराह्न ११ बजे अपने कोहेफिजा स्थित अपने निवास से बाहर जाने के लिए कार में बैठ ही रही थीं कि तभी किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें गोली मार दी। उन्होंने यह भी बताया कि शेहला को गोली मारे जाने के कारणों के संबंध में सघन जांच की जा रही है तथा कातिल को पकडने के लिए चरों तरफ नाकेबंदी कर दी गई है। शेहला मसूद वन्यजीव संरक्षण के अलावा अन्य कई समाज सुधार संबंधी कामों से भी जुडी थीं। उन्हें राष्ट्रीय उद्यानों और टाइगर रिजर्ब्स में बाघों की मृत्यु संबंधी मुद्दे उठाने के लिए जाना जाता हैं। वह एक सक्रिय आर टी आई कार्यकर्ता थीं। और हाल ही में अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल पर भी बैठी थीं। उनकी हत्या के बाद पुलिस ने चारों तरफ नाके बंदी कर दी है, हत्यारों की बड़ी सरगर्मी से तलाश की जा रही है और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की मानें तो वे जल्दी ही पकड़ भी लिए जायेंगे।
पर क्या वाकई कभी वे पकडे जायेंगे ? पर क्या वाकई पुलिस या कानून के हाँथ कभी शेहला मसूद के उन वास्तविक दुश्मनों तक पहुँच पाएंगे जो उनके आर टी आई आन्दोलन के कारण या उनके वन्यजीव संरक्षण की मुहिम के चल्ते उनसे खुंदक रखते थे और उनके दुश्मन बन बैठे थे ?...और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या इस तरह की छिटपुट कायरतापूर्ण दमनात्मक कृत्यों के बल पर सच या हक की आवाज को हमेशा-हमेशा के लिए कुचला जा सकता है ? पूरे विश्व के मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यह बताता है कि सच और हक की आवाज जब व्यापक जनता की आवाज बन जाती है तो बड़े से बड़े अत्याचारी अन्यायी लाखों जतन कर के भी उस आवाज का गला नहीं घोंट पाते बल्कि उस के शोर की आँधीं में खुद घुट जातें हैं ?
(चित्र स्क्रैच माई सोल डाट काम से साभार)

बुधवार, 20 जुलाई 2011

हाँ, सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान से जीने का हक मिलना चाहिये

बहुत लोगों को यह् बात बहुत नागवार लग सकती है.वो नाक भौं सिकोडते हुये पागलपन की हद तक आग बबूला हो सकते है.यह भी हो सकता है कि भारतीय संस्क्रिति के कुछ स्वम्भू ठेकेदार इस बात पर इतना भड़क उठें कि सडकों पर उतर कर तोड़-फोड़ करने लगें. और शायद यह भी हो जाये कि देश के किसी दूर-दराज़ के गाँव की किसी पन्चायत में आनन फ़ानन में इस के खिलाफ़ कोई फ़तवा भी जारी कर दिया जाये. पर हमारे संविधान के अनुसार इस देश के हर इन्सान को सम्मान से जीने का अधिकार है.फ़िर सेक्स वर्कर्स को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिये?...
यह् बात मैं नहीं इस देश का सर्वोच्च न्ययालय कह रहा है. जी हां, सुप्रीम कोर्ट सेक्स वर्कर्स को सम्मान के साथ उन्हें अपना पेशा चलाने के लिए 'माकूल हालात' पैदा करने की तैयारी में है. आ ई बी एन 7 की ताज़ा खबर के अनुसार---सुप्रीम कोर्ट मनाता है कि सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान से जीने का हक मिलना चाहिये.
परन्तु जिस देश मे लडकियों को गर्भ में ही मार दिया जाता हो,उनके साथ हर कदम पर भेदभाव किया जाता हो,उनको या तो गुलाम या भोग्या या बिकाऊ जिंस समझा जाता हो, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता हो और दहेज के नाम पर या झूठे सम्मान के नाम पर जिनको ज़िन्दा जला दिया जाता हो उस देश में क्या वाकयी यह कानून आसानी से बन पायेगा या बनने दिया जयेगा?..संसद और विधानसभा में महिलाओं की बराबर की भागीदारी का कानून तो अभी तक अधर में ही लटका हुआ है.पता नहीं कभी बन भी पयेगा या नहीं? सामंती,रूढीवादी,पिछडी हुई...पुनर्रुत्थान वादी और बाज़ार की ताकतें क्या कभी इस कानून को बनने देंगी? क्या उनके गले से यह बात कभी नीचे उतर पायेगी कि महिलायें इस देश में सिर्फ़ अपनी बदौलत स्वतन्त्रतापूर्वक सम्मान के साथ जी सकें. और उनकी देह पर सिर्फ सिर्फ उनका अधिकार हो.
( चित्र 'साइट्स डाट गूगल डाट कोम' से साभार )

रविवार, 17 जुलाई 2011

बाबा व्यापार करने के साथ सत्ता में हिस्सेदारी भी चाहते हैं...दो

लेकिन बाज़ार पर कब्ज़ा करने और सत्ता में हिस्सेदारी के लिये जिन ज़रूरी अवयवों की ज़रूरत होती है वह सब कुछ बाबा के पास बिल्कुल नहीं है. बल्कि सिरे से गायब है. आज के प्रतिस्पर्धा से भरपूर समय में बाज़ार में वही अपनी सही जगह बनाकर टिक पाता है जिसके उत्पाद गुणवत्ता और परिणाम दोनों में उत्तम होते हैं....और इस मामले में बाबा का हाँथ कत्तई तंग है.शुरू से ही उनके उत्पादों के बनाने के तौर तरीकों और उनमें मिलाये जाने वाले तत्वों पर सवाल खडे किये जाते रहे हैं. और सम्भवतः इन्हीं सब कारणों की वजह से एवं "गुड मैनुफ़ैक्चरिन्ग प्रैक्टिसेज" के अभाव से उनके उत्पाद अमेरिका सहित कई देशों में प्रतिबन्धित हैं.हमारे देश में भी उनके उत्पादों के दावों की कलई पूरी तरह से खुल चुकी है.
बाबा
दावा करते हैं कि उनके सिखाये योग और उनकी दवाइयों के नियमित सेवन से डायबिटीज, कैन्सर और हार्ट डिजीज जैसे असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं.परन्तु आँकडे बताते हैं कि बाबा की वजह से ना तो आज तक किसी का डायबिटीज ठीक हुआ है कैन्सर और ही किसी को उसके हार्ट डिजीज में कोई विशेष लाभ पहुँचा है.अपने हर योग शिविर में बाबा बडे उत्साह् से यह कहा करते हैं कि योग एवं उनकी तथाकथित जडी-बूटियों के सेवन से हर आदमी कम से कम सौ-डेढ सौ साल तक आसानी से जीवित रह सकता है.परन्तु अपने अनशन के चार-पाँच दिनों के अन्दर ही बाबा खुद लुढक गये और अपनी जान बचाने के लिये उनको उसी अस्पताल और उसी पद्धति की शरण में जाना पडा जिसकी वे हमेशा ही खिल्ली उडाया करते हैं. इस अनशन और उनके इतनी जल्दी अस्वस्थ होकर धाराशाई हो जाने के करण बाबा के योग,उनकी दवाईयों और उनके दावों पर एक गहरा धब्बा लग गया है,जिसको धोने में बाबा को अब वर्षों लग जयेंगे .
इसी
तरह सत्ता में हिस्सेदारी या राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिये जिन मूलभूत अवयवों की अवश्यकता होती है, बाबा उनमें भी पूरी तरह से शून्य हैं.उनके पास तो कोई संगठन है और ही कोई स्पष्ट विचारधारा.और ही उनके पास आन्दोलनों को चलाने या आन्दोलनों में शामिल होने कोई ठोस विशाल अनुभव है. हाँ,उनके पास शोहरत है और उनके पीछे है उनको चाहने वलों की एक लम्बी भीड.पर आखिर ये लोग हैं कौन ? थके-हारे,बीमार,अपने खोये हुये स्वास्थ्य को पुनः पाने के लिये जूझते लोग और कुछ छोटे-मोटे व्यापारी, अन्धी हिन्दूवादी विचारधारा के कुछ् छुटभैया नेता,सत्ता के कुछ दलाल और इस देश समाज को चलाने की गलतफ़हमी में जीने तथा अपने दोनों हाँथों से पैसा कमाने में जुटे कुछ चैनल्स और अखबार. लेकिन क्या इतने भर से सत्ता में हिस्सेदारी हो सकती है? या सत्ता पर कोई कारगर दबाव बनाया जा सकता है?...इसीलिये बाबा को मुहँ की खानी पडी. भ्रष्टाचार के बहाने सरकार के खिलाफ़ रणभेरी बजाने वाले बाबा रामदेव को अन्ततः महिलाओं के लिबास में रणछोड देव बनना पडा....
हाँ
, रामलीला मैदान में सरकार ने जो कुछ भी किया वह कत्तई गलत और अलोकतान्त्रिक था. और इसकी घोर निन्दा की जानी चाहिये. परन्तु कमजोर बिखरे विपक़्छ के कारण सरकार की कम और बाबा की किरकिरी अधिक हो गयी. और वे पूरे देश के सामने पूरी तरह से एक़्सपोज हो गये. अब तो उन पर और उनके सहयोगी सहित उनके ट्रष्ट पर खुद कई-एक आर्थिक घोटालों गैर कानूनी क्रित्यों में शामिल होने के आरोप लगने लगे हैं तथा सरकार को उनके ऊपर कानूनी शिकन्जा कसने का भरपूर मौका मिल रहा है. और उनकी अब तक की अर्जित सारी प्रतिश्ठा पर ग्रहण लगता जा रहा है.
बाबा
की नीयत अगर साफ़ होती तो वे भ्रष्टाचार के खिलाफ़ की लडाई में आन्ना हज़ारे के साथ होते. अलग से अपनी दूकान नहीं चलाते. बाबा अभी भी हुँकारे भर रहे हैं. और उनके पीछे दौडने वाले चैनल्स उनको फ़िर से जोश दिलाना चाह रहे हैं.पर बाबा की आवाज़ में वो लरज गरज नही दिखाई पड रही ,जो पहले हुआ करती थी.और ही उनके पास इसका कोई जबाब है कि वे अन्ना से अलग रहकर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ क्यों लडना चाहते हैं? और लडेंगे भी तो किस तरह से?...खैर बाबा इस समय थके-हारे और पस्त हैं. ऊलजलूल बयान बाजियाँ करके अपनी भडास निकालते फ़िर रहे हैं. क्योंकि आज तक की तारीख में उनको तो माया मिली है राम.
(चित्र रिडिफ़ डाट काम से साभार)