गुरुवार, 26 नवंबर 2009

कहानी

शायद अब वह नहीं आयेगा

उस दिन वह अचानक ही मुझसे टकरा गया था। मेरा स्कूटर अस्पताल के छोटे सँकरे गेट के अन्दर दाखिल हो रहा था और उसकी साइकिल तेजी से बाहर निकल रही थी। दोनों अपनी अपनी तेजी में थे। मोड़ पर आपस में भिड़ गये। हम दोनों ने एक दूसरे को चौंक कर देखा। उसनें हड़बड़ा कर नमस्ते की और मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा-'अरे, तुम ? यहां क्या कर रहे हो ?
'आप ही से मिलने आया था ।’ उसने अपनी साइकिल सम्हाली। मुझे रूकने को कहा और करीब आकर कहने लगा-'वाइफ की तबीयत खराब है, जरा किसी बढ़िया लेडी डाक्टर को दिखला दीजिए, प्रेगनेंसी का मामला है। बेचारी सुबह से दर्द से छटपटा रही है। प्लीज हेल्प मी, आई बेग...........।’
वह आदतन एकदम से रूआँसा हो गया। उसके बदहवास चेहरे और याचना के हाव भाव ने मुझे फिर से बाँध लिया। बाध्य होकर मैंने अपने हाँथ का ढाँढस उसके कंधे पर रखा-'जाओ वाइफ को ले आओ, मैं अच्छी तरह से चेकअप करवा दूँगा।’
'क्या कुछ दवाइयाँ भी मिल जाएंगी ? इधर पैसों की बड़ी तंगी है।’
'देखूगाँ, पहले उसे लेकर तो आओ।’
वह उछल कर साइकिल पर सवार हो गया। उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि मुझसे अचानक मिली इस मदद ने उसके भीतर फिर से नया जोश भर दिया है।
तीन साल.......हां, तीन साल पहले वह मुझसे मिला था। परवेज भाई के प्रेस पर। लेकिन तब उसकी शादी नहीं हुई थी। मुझे अच्छी तरह याद है, इस बारे में उसने कभी भी कुछ नहीं बताया था। परवेज भाई उन दिनों ’आफताब’ नामक साप्ताहिक अखबार निकालते थे। उस दिन मैं उसी के लिए एक लेख लेकर गया था। वह वहाँ पहले ही से बैठा हुआ था और चुपचाप शगिर्दों की भीड़ में धँसा गप्पबाजियाँ सुन रहा था। मुझे देखते ही परवेज भाई ने अपना इस्तकबालिया शेर दागा और अदा के साथ मेरी तारीफ के पुल बाँधने लगे। मेरे बैठते ही वह मेरी तरफ सरक आया-आप कहाँ रहते हैं, क्या काम करते हैं ? बहुत नाम सुना है ! वगैरह-वगैरह..............
परवेज भाई से निपटकर जब मैं उठा तो वह भी साथ हो लिया। पहली-पहली मुलाकात में अगर कोई आपके साथ चलने, तो न चाहते हुए भी आप उससे बातचीत कीजियेगा ही। मैंने भी यूं ही उसका अता-पता पूछ लिया और बस, वह शुरू हो गया बिन रूके, एक साँस में।
........इन्टर के बाद वह आगे पढ़ नहीं पाया। ट्यूशन कर-कर के अपना खर्च निकाल रहा है। घर पर भी उसे बराबर पैसे देने पड़ते हैं। न दे तो घर से निकाल दिया जाएगा। परिवार की माली हालत ठीक नहीं है। बाप बूढ़ा, चिड़चिड़ा और सख्त दिल है। घर का खर्च उसकी रेलवे की तनख्वाह से चल नहीं पाता है। माँ अक्सर बीमार रहती है। दमा की मरीज ! तीन सयानी जवान बहने हैं। भाई दो हैं, छोटे और स्कूल में पढ़ने वाले। बाप ने उसकी पढ़ाई छुड़वाई। बहनों को चार-पाँच से आगे पढ़ाया नहीं और अब भाइयों की पढ़ाई छुड़वाना चाहते हैं। लेकिन भाई पढ़ना चाहते हैं। वह भी चाहता है कि दोनों भाई पढ़ें। पर बाप का कहना हैं कि कुछ हाथ का काम सीख कर काम धन्धा ढूंढे। मेरा पिण्ड छोड़ें। खुद कमायें, खुद खाएं। साथ में घर भी चलायें।
इस बात को लेकर उसमें और बाप में बराबर तनी रहती है। बाप से उसका झगड़ा इस बात पर भी होता है कि बहनों की शादी वो जैसे-तैसे निपटा देना चाहते हैं। रोकने टोकने पर उखड़ जाते हैं। कहते है कि कुछ करता धरता है नहीं। मेरी खाता है और मुझे ही उपदेश देता हैं.......अब आप ही बताइये, अगर उन्होंने मुझे एम0ए0, बी0ए0 कराया होता, तो मुझे नौकरी क्यों नहीं मिलती! तब मैं सौ-सौ, दो-दो सौ रूपयों के लिये लोगों के तलवे नहीं चाटता। आखिर में उसने दरख्वास्त की कि मैं उसे परवेज भाई के अखबार में स्थानीय संवाददाता बनवा दूँ।
इसके बाद वह अक्सर ही मुझसे मिलने लगा। घर पर। प्रेस पर। चाय की दुकान पर। या कहीं रास्ते में। आते-जाते वक्त-बेवक्त टकराने लगा। शुरू-शुरू में तो मैं यूं ही रहम खाकर उससे दो-चार मिनट बतिया लिया करता था, पर धीरे-धीरे वह मुझे बोर करने लगा। हमारे बीच की औपचारिकता सूखने लगी और मैं उससे कतराने लगा। अब परवेज भाई मेरे सगे तो थे नहीं और न ही मैं उनके लिये इतना भारी भरकम था कि मेरी सिफारिश पर वे उसे अपना संवाददाता बना लेते। और फिर था ही क्या उसके पास ऐसा चमकदार, जो अगर मैं दिखा देता तो परवेज भाई लपक कर पकड़ लेते। एक आम बेरोजगार। सूखा सिकुड़ा नौजवान। एक अदना-सा बूढ़ा नजर आने वाला। हड्डियों का ढांचा। बेकार और बुझा हुआ। चेहरे पर हर वक्त बेचैनी और उलझन का एहसास। आंखे गड्ढों में धँसी हुई। अगल-बगल से बेखबर। अपनी ही फिक्रों के जाल में कैद! वह बातें करता तो उसके पीले-पीले बेतरतीव, ऊबड़-खाबड़ पायरियाग्रस्त दातों और मुंह से लगातार छूटती हुई थूक की फुलझड़ियों से किसी को भी उबकाई आ जाए।
तकरीबन एक घन्टे बाद वह बीवी को लाद कर ले आया। मैनें उसे ले जाकर लेडी डाक्टर के हवाले कर दिया। और बॉस के पास चला गया। बॉस के केबिन से जब मैं बापस आया तो देखा, वह मेरे कमरे में जमा हुआ है। लेकिन अकेले।
'अरे तुम्हारी बीवी कहाँ हैं ?’
'घर भेज दिया ।’
'अकेले ?’
'नहीं भाई आया था उसी के साथ....।’ और लेडी डाक्टर का पर्चा सामने कर दिया-‘ये दवाइयाँ लिखी हैं।‘ मैंने देखा टानिक वगैरह लिखा था। टिटनस की एक सुई। और पेट ठीक रखने के लिये एक दवा। कुल सौ रूपये का खर्च था। किसी डाक्टर के पास इनमें से एकाध का ’सैम्पुल’ भले ही मिल जाए। सभी दवाइयाँ तो मुश्किल हैं यहाँ कि मिलें। फिर भी पर्ची छोड़ जाओ, देखता हूँ नहीं होगा तो सामने की दुकान से ’रिजनेबल रेट’ पर दिलवा दंूगा।’
'लेकिन मेरे पास तो कुल पचास रूपये है। अच्छा छोड़िए दवा-फवा। डाॅक्टर साहिबा ने कहा कि सब कुछ नाॅरमल है। कल थोड़ा सोने में इधर-उधर हो गया था बस।'
'ये दवाइयां बहुत जरूरी हैं और ये टिटनेस कि सुई तो बहुत ही जरूरी है।’
'लेकिन वह तो बोल रही थी कि यह सुई अगले महीने और उसके अगले महीने फिर लगवानी पड़ेगी।’
'हाँ लेकिन ये तो बहुत सस्ती आती है।'
'तब इसी सूई को लगवा दे रहा हूँ। पैसे होंगे, तो दूसरी दवाइयाँ आयेंगी।' वह पर्चा लेकर उठा खड़ा हुआ।
मैंने पर्चा छीन लिया और कहां 'फिक्र मत करो, जाओ वाइफ को आराम करने दो। और थोड़ी-थोड़ी देर पर नींबू का पानी पिलाते रहना। और शाम को चार और पाँच के बीच आ जाना। दवाइयों का बन्दोबस्त कर दूंगा।’ वह कुछ आश्वस्त हुआ। और मुझे देखकर मुस्कराया। वे ही पीले-पीले गंदे दांत। और चला गया........
दोपहर को चपरासी भेज कर मैंने दूकान से उसकी दवाइयाँ मँगवा ली। शाम को जब वह आया, तो देख कर बहुत खुश हुआ। मैंने चाय की प्यालियों के साथ अपने ढेरों सवाल उसके सामने रख दिये। मसलन शादी कब की ? नौकरी मिली कि नहीं ? अब घर के हालात कैसे हैं ? जवाब मैं उसने जो कुछ बताया उससे पता चला कि पहले तो वह घर में अकेले ही झेलता था, अब मियाँ बीवी दोनों झेलते हैं। नौकरी उसे अभी तक नहीं मिली। किसी तरह ट्यूशन कर-कर के दिन गुजार रहा हैं.......। ‘पिछली गर्मियों में ही शादी हुई है। पर छः महीने के अन्दर ही अच्छे खाते पीते घर की हाई स्कूल पास लड़की के सौ करम हो चुके है। जिस महीने वह घर पैसे नहीं दे पाता, उस महीने खूब थूकम फजीहत होती है। अब आप ही बताइये, ट्यूशन का क्या भरोसा ? सिर्फ साल में छः-सात महीने ही तो पाँच-छः सौ पाता हूँ। उसमें से सौ रूपये अपने पास रख सब घर पर दे देता हूँ। क्या सौ रूपये भी खुद पर और अपनी वाईफ पर न खर्च करूँ ?'
'जब से शादी हुई है किसी ने एक चप्पल भी खरीद कर नहीं दिया। सब मैं ही करता हूँ। चाहे पिक्चर ले जाना हो या कुछ खरीद कर लाऊं। और तो और पिक्चर भी अकेले कहाँ जा पाता हूँ ? सब साथ लग लेते हैं। भाईसाहब, आलम यह है कि हम बेफिक्र होकर प्यार भी नहीं कर पाते।' बताते-बताते वह भावुक हो गया 'अब इधर चूंकि गर्मियाँ चल रही हैं, इसलिए हाथ में एक ही ट्यूशन हैं। अब सौ रूपयों में क्या दूँ ? और क्या बचाऊँ ? लेकिन किसको कौन समझायें ? वाइफ तो रात-रात भर रोती रहती है। प्रेग्नेंट है, तो इतना भी नहीं सोचते कि उसे थोड़ा आराम करने दें। खुश रहने दें। काम करा-करा कर मार डालते हैं।'
यकायक वह चुप होकर कहीं खो गया। कुछ पल तक यूँ ही खामोश रहने के बाद उसने धीरे-धीरे बोलना शुरू किया-'बहनें और दोनों छोटे भाई भी उसी रंग में रंग गए हैं। कोई सीधे मुंह बात ही नहीं करता। पहले इन्ही के लिए जान छिड़कता था। बाबूजी के मनमाने रवैये से इनको बचाता था। पर अब तो इनसे भी चिढ़ होने लगी है। हर झगड़े और हर तनाव में ये आँख मूँद कर माँ और बाबू जी के साथ हो लेते हैं। और मुझे जोरू का गुलाम समझ कर ताने मारते हैं। कभी-कभी तो सोचता हूँ, वाइफ को लेकर घर द्वार छोड़ दूँ। रहने लगूँ अलग। घर छोड़ दूंगा, तभी पता चलेगा आटे दाल का भाव। बाबूजी जब एक एक करके रगड़ेगे तब समझ में आएगा।’ हताशा लिए दर्द का सूनापन उसकी आंखो में तैरने लगा और वह उदास हो गया।
इसके बाद वह अक्सर आने लगा। पहले तो अधिकतर दवाइयाँ लेने। पर फिर वाइफ के बारे में ’कम्पलेन्ट्स’ लेकर। मैं सैम्पुल वगरैह दिलवां देता। सूई-वूई लगवा देता। उसकी बीवी की हालत अन्जानें ही मेरी चिन्ता बन गयी थी। कहाँ आ फँसी बेचारी ?
एक दिन वह अपने सारे प्रमाण-पत्र लेता आया। और अस्पताल में नौकरी दिलवाने की जिद करने लगा। कोई भी, कैसी भी नौकरी। मैंने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि यहाँ नौकरी दिलवाना मेरे वश में नहीं है। एक तो मैंनेजमेंट से मेरी पटती नहीं है, दूसरे इस प्राइवेट अस्पताल का मैं ख़ुद एक अदना-सा कर्मचारी हूँ। और फिर, न मैं कभी इतना बड़ा था और आज भी मेरी हैसियत ऐसी नहीं है कि किसी को नौकरी-वौकरी दिलवा सकूँ। पर उसे लगा कि शायद मैं उसे टाल रहा हूँ। अतः जिद्द पर अड़ा गिड़गिड़ाता रहा। हार कर मैंने उसे मुख्य प्रबंधक के पास पहुँचा दिया।
पर इसके बाद उसका आना कम होते-होते एकदम से बन्द हो गया। कुछ दिनों तक तो उसके बारे में मेरी चिन्ता यूँ ही बनी रही। पर धीरे-धीरे काम की व्यस्तता और खुद की चिन्ताओं के गर्दों गुबार ने उसे चिन्ताओं को परिधि से बाहर दूर धकेल दिया। धीरे-धीरे और बहुत दूर।
लेकिन एक दिन अचानक अलस्सुबह ही उस ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दे दी। परेशान। बाल बिखरे। कपड़े अस्त व्यस्त। आँखें लाल सूजी हुई। थकान से चूर- 'जरा, थाने चलिये।’
'थाने किसलिये ?’ मैं चैंका ।
’वे लोग उसका पोस्टमार्टम करना चाहते हैं।’
'किसका पोस्टमार्टम ? साफ साफ बताओ क्या बात है ? पहेलियाँ मत बुझाओ।'
'जरा पानी पिलवा दीजिये । प्लींज बड़ी प्यास लगी है।’
मुझे लगा वह गश खाकर गिर जायेगा। इसलिए पकड़ कर अन्दर कमरे में बैठा दिया। दो गिलास पानी पीने के बाद वह सोफे से पीठ टिका कर लुढ़क गया। और छत की तरफ चेहरा करके आँखे बन्द कर लीं। एक पल, दो पल, तीन पल। मेरी बेसब्री उछल कर बाहर आ गयी। और उसके कंधे पर सवार होकर झकझोरने लगी-'बताओ क्या बात है ?‘
‘मेरी वाइफ अब इस दुनिया में नहीं है। कल रात चुपके से उसने कुछ खा लिया। मुझे कुछ बताया तक नहीं। साथ ही खाया। साथ ही सोयी। पर........उसके पपड़ी जमे होंठ थरथाने लगे। उसने उन्हें रोका। आँसुओं को बाहर निकलने नहीं दिया। जबरन। सुबह तीन बजे के करीब जब मेरी नींद खुली तो देखा वह गों गों करके ऐंठ रही है। पानी से निकाली हुई मछली की तरह छटपटा रही है। मैं घबरा गया। दौड़कर माँ और बाबूजी को जगाया। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जब तक वे आये वह जा चुकी थी।’
उसकी आँखों में आँसू भर आये। वह रोने लगा। पर तुरन्त ही सम्हला। और चुप हो गया। 'इधर किस्मत के मारे हम सब रो रहे थे। उधर मुहल्ले के कुछ लोग जा कर थाने पर सेंक आये। अब पुलिस वाले परेशान कर रहे हैं कि मामला दहेज हत्या का बन रहा है। मुकदमा दर्ज होगा। पोस्टमार्टम होगा। इसके मायके वालों को बुलाया जाएगा। इन्क्वायरी होगी। भाई साहब, प्लीज आप थाने पर चलकर कह दीजिये कि मामला दहेज हत्या का नहीं है।’
मैं यकायक सकपका गया - ‘लेकिन यह मैं कैसे कह सकता हूँ ?‘ उसने मेरे घुटने पर अपनी याचना का ठंडा हाथ रख दिया-’सच मानिये भाईसाहब, इसके पीछे कोई साजिश-वाजिश नहीं है। लोग ख्वामख्वाह ही हम लोगों को फँसाना चाहते है।‘
’पर परिस्थितियाँ तो तुम लोगों के एकदम खिलाफ हैं। और चूँकि यह नेचुरल डेथ नहीं है, इसीलिये.........।’
‘यह तो होना ही था। अपेक्षित। मैंने लाख कोशिश की। पर वह तंग आ चुकी थी। बेचारी।’
'पोस्टमार्टम तो होगा ही। और अगर कोई कम्पलेंट हुई तो इन्क्वायरी भी होगी। मुकदमा भी चलेगा। हो सकता है, तुम लोगों को...........।’
उसने सूनी-सूनी आँखो से मुझे देखा और एक लम्बी साँस ली-'तो आप भी मेरी मदद नहीं करेंगे। मैं जानता था।.....उफ मैं भी कितना बदनसीब हूँ।’ और पता नहीं वह क्या-क्या बुदबुदाया। और फिर एक झटके से उठ कर चला गया। शायद फिर कभी न आने के लिये।.......

अरविन्द कुमार

बुधवार, 12 अगस्त 2009

आज बहुत दिन बाद फ़िर...

वाकई एक अरसा बीत गया। आज काफी दिनों के बाद आप सब से मुखतिब हो रहा हूँ।....तीस मार्च को पिता की अचानक मृत्यु ने मुझे इस कद्र तोड़ दिया था कि कुछ भी लिखने पढ़ने लायक नही रह गया था। गहरा आघात... स्तब्ध और पूर्णतया निशब्द। ...... ठीक होली के दिन वे अचानक बेहोश हो कर इस तरह से गिरे कि सत्रह दिन तक लगातार जीवन और मौत से संघर्ष करते हुए अंततः हार ही गए। ....सघन चिकित्सा,चिकित्सकों की कई-कई टीम, रात दिन एक करके किसी भी कीमत पर पिता को बचा लेने की पुरजोर कोशिश।.....कभी लगता यह मल्टीप्ले ओर्गोन फेल्योर का मामला है, तो कभी सेप्तिसमेया का ।बातें करते हुए मौत के आगोश में इस तरह समा गए कि शायद सोने चले गए हों।....पर वाकई वे गहरी नीद में सो ही तो गए हैं।अब वो पुल्मोनारी एम्बोलिस्म के कारण हुआ हो या अचानक हुए कर्दिअक अरेस्ट के कारण या किसी दवा या इंजेक्शन के ओवर डोज के कारण। सच तो खुदा ही जानता है, पर हमने उनको खो दिया।हम चाह कर भी उनको बचा नही पाए। मृत्यु के सच के आगे हम सब असहाय और नीरीह बने छात्पता कर रह गए।......हम में से किसी को भी सपने में भी अंदाजा नहीं था कि वे अचानक इस तरह से चले जायेंगे। ....मेरे लिए तो यह एक बगुत बड़ा आघात था। .... माँ की कैंसर से हुयी मृत्यु ने मुझको अन्दर से कमज़ोर तो किया था। पर पिता कि इस अचानक मृत्यु ने तो मुझे एक दम से तोड़ कर ही रख दिया है। .....आज भी तेरह मार्च से लेकर तीस मार्च तक की एक एक घटना और आई सी यू के बेड नंबर सत्रह पर घटा वो एक-एक पल मेरे मन मस्तिष्क में इस कदर गहराई में ज्वालामुखी की तरह धधक रहा है कि अभी भी अक्सर रातों को गहरी नीद से छटपटा कर उठ बैठता हूँ। पसीने से तर बतर। .....बहरहाल ज़िंदगी तो कभी थमती नहीं। ...आपकी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियाँ भी आपको जीने और आगे बढ़ने के लिए लगातार कोंचती रहती हैं। ....सो अब अन्तर-बाहर को मजबूत करके मै फ़िर से ज़िंदगी के साथ गतिशील होने की कोशिश कर रहा हूँ। पर यह सच है कि पिता ने इस तरह से अचानक जाकर मेरे जीवन में एक ऐसा शून्य उत्त्पन्न कर दिया है ,जिसको समय का एक लंबा अंतराल भी शायद ही कभी भर पाए। ...लेकिन मै तो माँ के बहुत करीब था। उनको बहुत प्यार करता था। लोग-बाग और यार-दोस्त मुझे मदर्स चाइल्ड कह-कह कर चिढाते थे। पिता से म्रेरे सम्बन्ध कभी भी सम नही थे। न तो वैचारिक स्तर पर और न ही व्यावहारिक स्तर पर। ....पर शायद...आज लगता है कि मन की गहराइयों में मै पिताजी को कहीं अधिक प्यार करता था।...वे शायद मेरे लिए एक ऐसे सुरक्षा कवच थे जो मुझे हर वक्त हर मुसीबत से बचाने के लिए तत्पर रहता था। ....पिता भी शायद मुझे बहुत प्यार करते थे। तभी तो माँ के न रहने पर वे हरवक्त के लिए हमारे ही पास रहने आ गए थे। पर हम दोनों कि ख़ुद की रची हुयी दीवारें या सीमायें ही ऐसी थी कि हम अंत तक एक दूसरे को "आई लव यूं" नही कह पाए। ...और आज अगर मै उनसे ऐसा कहता भी हूँ तो उससे फायदा? क्या दूर अनंत में जहाँ वे आज माँ के साथ चैन से रह रहे है मेरी काँपती और आंसुओं से भरी हुयी आवाज उन तक पहुँच पायेगी?...आज अपनी भावुकता से आप दोस्तों को दुखी करने का मेरा कोई इरादा नही है, पर शायद इससे मन का दुःख कुछ कम हो। ....

मंगलवार, 24 मार्च 2009

यह सांस्कृतिक सन्नाटा चिंताजनक है--दो

मुम्बई पर हुए आतंकी हमले के बाद बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों की इस तरह की चुप्पी के चलते अब उन सारे लोगों व समूहों को भी, जो साध्वी-प्रज्ञा तथा पुरोहित प्रकरण के उजागर हो जाने से पहले कुंठाग्रस्त सकते में आ गये थे, यकायक एक ऐसा बड़ा मुद्दा मिल गया, जिससे उनकी सोच व उनके भीतर भरी-दबी जहरीली भॅड़ास खुलकर बाहर निकलने लगी। उनको लगा कि यही वह सुनहरा अवसर है, जब पाकिस्तान को पूरे विश्व समुदाय से काट कर पंगु बना दिया जाये। कई लोग तो सरकार पर दवाब भी डालने लगे कि वह तुरन्त पाकिस्तान पर हमला बोल दे।
परन्तु आज के अधिकांश कवि, लेखकों एंव संस्कृतिकर्मियों को इस से क्या ? वे तो इन तमाम कडुवी सच्चाईयों से आँख मूँद कर काल्पनिक घटनाओं और मध्यवर्गीय कुंठाओं को ही अपनी कृतियों में उकेर रहें हैं। वे भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के इन्द्रजाल में फँस कर और इंडिया शाइनिंग और भारत निर्माण की तर्ज पर सिर्फ और सिर्फ शहरी विकास, अमीरों की अमीरी और मध्यवर्ग या उच्च मध्यवर्ग की विलासिता एवं यौन-ग्रन्थियों को ही घुमा-फिरा कर बार-बार पाठकों और दर्शको के सामने परोस रहें है। गरीबों की गरीबी और वंचितों के दुःख दर्द पर उनकी निगाह जाती भी है तो सिर्फ़ भाववादी या कि यथास्थितिवादी दृष्टिकोण से ग्रस्त हो कर। जीवंत यथार्थ और सच्चाई पर आज एकदम खामोश है इनकी लेखनी और आवाज । यही नहीं, ऐसे लेखक-कवि और कलाकार संगठित रूप से हमेशा इस तरह की तिकड़में व साजिशें भी करते रहतें हैं कि सच्चे, समर्पित और ईमानदार प्रगतिशील एवं जनवादी संस्कृतिकर्मी को कभी भी साहित्य-संस्कृति में उचित स्थान और सम्मान न मिलने पाए।
ये कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिन पर आज बृद्धिजीवियों को मिल-बैठ कर विचार-विर्मश करना चाहिए। और सिर्फ विचार-विर्मश ही नहीं, समाज को बेहतर बनाने के लिए उनको कुछ मूर्त व सार्थक हल भी खोजना चाहिए। क्योंकि संकट की घड़ी में बुद्धिजीवियों को अक्सर दार्शनिक व सृजनकर्ता की भूमिका गंभीरता पूर्वक निभाते हुए आगे बढ़कर समाज-सुधारक व पथ-प्रदर्शक का दायित्व भी निभाना पड़ता है। पर आज का बहुसंख्यक बुद्धिजीवी तबका तो उलटा अपने में डूब कर ठीक नीरो की तरह अपना वायलिन बजा रहा है। और सतह पर उभर आयें हैं कुछ ऐसे कु-बुद्धिजीवी, जो समाज को धर्म या जाति या फिर क्षेत्र और भाषा की अपनी समझ की रोशनी में नए सिरे से परिभाषित कर के रचना-बुनना चाहतें हैं। उनका अंध-राष्ट्रवाद और घृणा-आधारित अस्मितावाद इस देश और समाज को फिर से अतीत के उस गहरे व अंधेरे गर्त में धकेल देना चाहता है, जहाँ तमाम सड़े-गले मूल्य पुनर्जीवित होकर जनसमुदाय को पुनः अपने बर्बर चंगुल में जकड़ लेगें। और तब हम निश्चित तौर पर इन्सान नहीं, जानवरों के झुंड में तब्दील हो जायेंगे।
आज इतिहास के नाम पर एक तरफ हमारे पास विवादस्पद वक्तव्यों का एक भींगा और भारी पुलिंदा है, तो दूसरी तरफ भविष्य के नाम पर सवालों का एक घना अंधेरा जंगल। और वर्तमान ?.....विरासत से मिले सभी सकारात्मक मूल्य आज एक-एक करके बिखर रहे हैं। और जो नए मूल्य बनते हुए दीख रहे हैं, उनकी शक्लों-सूरत तमाम पुरातन-पंथी विचारों, रूढियों, अंध-विश्वासों, कूप-मंडूकताओं, बर्बरता के कालेपन और पश्चिमी नंगी उपभोक्ता व भोगवादी संस्कृति की चमक-दमक के साथ इस कदर गड्ड-मड्ड है कि अगर वाकई आने वाले कल की नींव इन्हीं मूल्यों पर पड़ गई तो, जो भविष्य हमें मिलेगा वह निश्चित तौर पर बहुत ही विकृत, विषैला, व अमानवीय होगा।
दूसरो शब्दों में कहें तो तब हर तरफ, हर ताने बाने में बजबजाते हुये बहुआयामी भ्रष्टाचार, कमीशन खोरी और दलाली का राज होगा। समाज में अपराध, दंगा-फसाद, गिरोह-बंद गुंडागर्दी का बोलबाला होगा। समस्त राजनैतिक व सामाजिक नैतिक मूल्यों में असोचनीय गिरावट होगी। लोगों मे निराशा, हताशा, असंतोष और बेचैनी होगी। और इन सबके ऊपर नृत्य करेंगी, मुक्त बाजार की सर्वग्रासी नीतियाँ, पश्चिम से आयातित खालिस वासना व विलास की संस्कृति और भयावह तानाशाही और अंधे राष्ट्रªवाद की क्रूर आहटें, धार्मिक उन्माद, उग्रवाद व आतंकवाद की क्रूर व हत्यारी वारदातें! तब कहाँ होगा मनुष्य ? और कहाँ बचेगी मानवता ?......अगर सब कुछ इसी तरह से चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब सौंदर्य, दया, प्रेम, भाईचारा, एकता और सुख-शांति का हमारे समाज व जीवन से पूरी तरह से लोप हो जाएगा। तब न तो सत्य होगा और न शिव। विकृति ही विकृति होगी चरों तरफ। तब उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों के सृजन व उनको समाज में स्थापित करने की नैसर्गिक मानवीय जीजिविषा का क्या होगा ?
इसलिए आज के इस दौर में जबकि लोगों को पढ़ने-लिखने, सोचने-समझने आदि से विमुख करके पूरी तरह से यंत्र-मानवों या फ़िर जंगली जानवरों में तब्दील करने की कोशिशें की जा रही हैं और तर्कहीनता व विचार शून्यता के इस अंधे माहौल में, जब संचार माध्यमों खास करके इलेक्ट्रानिक माध्यमों द्वारा रचे जा रहे विचार व भोंडे सौंदर्यशास्त्र ने आम लोगों की ही नहीं बहुसंख्यक कवियों , लेखकों, पत्रकारों व संस्कृतिकर्मियों को भी पूरी तरह से अपने उपभोक्तावादी मकड़जाल में फँसा लिया है, सभी बुद्धिजीवियों को अपनी असल जिम्मेदारी समझनी होगी। सभी सोचने-समझने वालों को अपनी निद्राग्रस्त-सीमाओं को तोड़कर आगे आना होगा। वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक संकट की सम्यक जांच-पड़ताल व चीर-फाड़ करते हुए उसके मूल कारणों की तलाश करनी होगी। और समूचे माहौल को बदलने के लिए उन कारणों-कारकों पर विभिन्न स्तरों पर कारगर ढंग से हस्तक्षेप और उनके खिलाफ कमर कस कर संघर्ष भी करना होगा। तभी हो पायेगी समाज में बुद्धिजीवी समुदाय की पुनस्र्थापना। अन्यथा नाटक के उस पात्र की तरह वे भी एक दिन महज एक आम हास्यास्पद पात्र बनकर रह जायेंगे।

शनिवार, 21 मार्च 2009

यह सांस्कृतिक सन्नाटा चिंताजनक है--एक

पिछले दिनों मुझे एक नाटक देखने का अवसर मिला। नाटक तो खैर किसी और विषय पर एवं जैसा-तैसा था, पर उसमें एक पात्र था बुद्धिजीवी ! यद्यपि नाटक में उसे हास्य व व्यंग्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए रखा गया था, पर अनायास ही वह पात्र न सिर्फ आज की एक महत्वपूर्ण कड़ु़ई सच्चाई की ओर इशारा करता है, बल्कि जाने-अनजाने उस पर चोट भी करता है।
नाटक का वह पात्र किसी भी घटना के बाद एक चिंतक की भाँति मंच पर आता है और घटना से अपनी पूरी निर्लिप्तता दिखाते हुए अपना परिचय कुछ इस तरह से देता है-''मैं एक बुद्धिजीवी हूँ। मेरा काम है, सोचना और केवल सोचना। इसलिए मैं सोचता हूँ और खूब-खूब सोचता हूँ। बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचता हूँ। चाय पीने के पहले सोचता हूँ। चाय पीते हुए सिगरेट के धुएं के डूब कर सोचता हूँ। और खूब सोचता हूँ। मैं दिन भर नहाते-खाते-पीते और अपना काम धंधा करते (यानि की अपने और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ करते) हुए सोचता हूँ। रात को खाना खाने से पहले सोचता हूँ। खाना खाने के दौरान सोचता हूँ। बीवी व बच्चों के सवाल-जवाब पर हाँ-हूँ करते हुए सोचता हूँ। सोने से पहले भी मैं काफी देर तक सोचता हूँ। और सोचते-सोचते सो जाता हूँ। क्योंकि मैं एक बुद्धिजीवी हूँ और सोचना मेरा काम है। क्यों, क्या और कैसे से मुझे क्या मतलब ? मैं तो सोचता हूँ और खूब-खूब सोचता हूँ।’’
अगर गौर से देखा जाए तो यह वाकई सच है। आज हमारे बुद्धिजीवी समुदाय की कुल मिलाकर यही स्थिति है। वर्तमान समाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से पूरी तरह असम्पृक्त, उदासीन, अपने आप मैं ही कैद और संतुष्ट! यह आज के दौर की एक मुख्य प्रवृत्ति है। बल्कि यूँ कहें कि संकट के इस दौर का एक मुख्य कारण भी। क्योंकि आज हमारा पूरा समाज जहां हलचलों और ऊहापोह से भरे एक जटिल दौर से गुजर रहा है, वहीं अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग अपनी सार्थक भूमिका निभाने के बजाय खामोश है।
चाहे वह निठारी में मासूम बच्चों की हत्या का मामला हो, या अपनी माँगो को लेकर जगह-जगह आंदोलन करने वाले किसानों-मजदूरो पर चलायी गयी लाठियों-गोलियों की घटना हो या फिर मुक्त-बाजार की अन्यायपूर्ण नीतियों के चलते आत्महत्या करने को अभिशप्त किसानों का मसला, बुद्धिजीवी जगत को तो शायद इनसे कोई मतलब ही नहीं है । वे तो न जाने खयाली दुनिया के किस नीले और गुलाबी समन्दर में डूबते-उतराते रहते हैं ? बेरोजगारी, महॅगायी, भृष्टाचार, कन्या-भ्रूण हत्या, पुलिस-जुल्म और दहेज हत्या जैसी जन-समस्यायें तो अब इन के लिये पूरी तरह से असरहीन व रोजमर्रा की घटनाये हो गई हैं। ये तो इनकी संवेदना को तो छूती भी नहीं।
नई अर्थव्यवस्था की अंधी नीतियों के चलते पिछले पन्द्रह-बीस सालों में हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई पहले से काफी चौड़ी हुई है। गरीब और गरीब हुआ है और अमीर और अमीर। आज भी इस देश की अस्सी प्रतिशत आबादी की प्रति माह आमदनी केवल छः सौ रूपया महीना है। देश में करोड़ों लोग भूख और बीमारी से बेहाल हैं। कुछ क्षेत्रों में तो अभी भी लोग गरीबी से तंग आकर या तो अपने बच्चों को बेच देते हैं या फिर भूख से लड़ते हुए तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। किसानों की हालत तो दिन प्रतिदिन बद्तर होती जा रही है। अब तक हजारों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते और उसके असर से हमारे देश में भी बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। छोटे बडे़ न जाने कितने उद्योग धंधे उजड़ कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेट में चले गये हैं।और उजाड़ गए हैं। रातों-रात अमीर बनने के चक्कर मे मध्यवर्ग के लाखों लोग अपन करोड़ों रुपये शेयरों में डुबा चुके हैं और अब बैंकों के कर्ज तले दब कर छटपटा रहे हैं। महिलाओं पर आज भी मध्ययुगीन अत्याचार हो रहें हैं। घर और बाहर हर जगह उनका शारीरिक व मानसिक शोषण किया जाता है। और अभी भी उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक या फिर सिर्फ उपभोग की वस्तु समझा जाता है। वोट की गंदी व स्वार्थी राजनीति ने समाज के पूरे ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। अंधराष्ट्रवाद की कोख से पैदा हुए सम्प्रदायिकता, धार्मिक उन्माद, जातियता और क्षेत्रियतावाद के राक्षसों ने इंसानों के बीच की दूरी इतनी बढ़ा दी है कि अब इनको लेकर जगह-जगह हिंसात्मक वारदातें हो रही हैं। देश लगातार आंतकवाद की घटनाओं से लहूलुहान हो रहा है। और आये दिन न जाने कितने मासूम और निर्दोष इसकी क्रूर वेदी पर हलकान हो रहे हैं।
और तो और अभी पिछले नवम्बर में मुंबई में दुनिया की सबसे बड़ी आंतकी घटना हुई है। इससे मुम्बई ही नहीं, समूचा देश दहल गया। लोगों के सब्र का बाँध टूट गया। लाखों लोग बिना किसी खास राजनीतिक समझदारी के ही सिर्फ अपने डर, असुरक्षा और आक्रोश से उबल कर सड़कों पर उतर आये। मोमबत्तियाँ जलायीं व मानव श्रंखला बनाई। और उन्होंने राजनीतिक पार्टियों, राजनेताओं को इसका जिम्मेदार मानते हुए न सिर्फ लानत-मलामत करके उनका बायकाट करना शुरू कर दिया, बल्कि इस समूची राजनीतिक व्यवस्था का निषेध भी करने लगे। परन्तु व्यापक बुद्धिजीवी जगत में इन सबको लेकर न तो कहीं कोई ठोस व संगठित उद्वेलन हुआ। और न ही संस्कृतिकमिर्यों-लेखकों के किसी जन-संगठन या मंच ने आगे बढ़कर इस दिशा में कोई ठोस व कारगर पहल कदमी ली। वाकई यह संन्नाटा काफी खतरनाक और चिंताजनक है।
बाकी अगली बार -----
__अरविन्द कुमार

शनिवार, 14 मार्च 2009

अशिक्षा के अँधियारे के विरुद्ध

आजकल से बीसेक साल पहले जब मैं स्कूल और कालेज में पढ़ा करता था, तब इम्तहान में नकल करने की पंरपरा नहीं थी। नकलचियों की संख्या कम हुआ करती थी। और छात्र-नौजवान ईमानदारी से अपनी अकल के आधार पर इम्तहान देने में विश्वास करते थे। और नकल करने वालों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा एवं उन्हें जलील किया किया जाता था। पर तब स्कूलों-कालेजों में पढ़ाई होती थी। अध्यापकगण कक्षाओं में पढ़ा-पढ़ा कर कचूमर निकाल देते थे। ट्यूशनों का इतना चलन नहीं था। अध्ययन-मनन-चिंतन का माहौल था। घर पर भी पढ़ाई को लेकर अक्सर पिटाई हो जाती थी। और हर वक्त यह हिदायतें दी जाती थीं, कि चाहे कुछ भी हो जाएं, फेल क्यों न हों, पर नकल कभी मत करना। तब न कहीं नकल विरोधी अध्यादेश था, न नकल रोकने के लिए उड़ाका दल थे। कक्ष निरीक्षक और प्रधानाचार्य का भय ही हमारे लिए काफी हुआ करता था। लेकिन तब विद्यालय वाकई विद्या मंदिर हुआ करते थे। अध्यापक गुरू थे। और शिक्षा ने व्यवसाय का रूप कत्तई नहीं अख्तियार किया था ।
पर अब परीक्षाओं में की प्रथा-सी चल पड़ी है। नकलचियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। नकल कराने के लिए एजेंसिया खुल गई हैं, जो ठेका लेकर नकल करवाती हैं। अभिभावक और अध्यापक नकल रोकना या रोकने की चेष्टा करना तो दूर, खुद नकल करवाने में संलग्न हो गए हैं। अब नकल न करने वाला एवं पठन-पाठन और चिंतन-मनन की बातें करने वाला हेय दृष्टि से देखा जाता है। तथा बेवकूफ, कप-मंडूक एवं ठस-बुद्धि का कहकर जलील किया जाता है। आजकल के अध्यापक भी पढ़ाने-लिखाने में कम, बल्कि ट्यूशन पढ़ाने, प्रैक्टिकल में नम्बर दिलवाने आदि की ठेकेदारी करने लगे हैं। संक्षेप में कहें, तो अब के अध्यापक न तो गुरू रह गये हैं न ही छात्र सही अर्थो में छात्र। विद्यालय में गुंडागर्दी, अराजकता, अशिक्षा, अश्लीलता और नशा-खोरी बढ़ती जा रही हैं। अब के विद्यालय, विद्यालय या मंदिर नहीं, दूकान या कि मंडी बन गये हैं। और यह हालत सरकार व गैर-सरकारी हर प्रकार के विद्यालयों की है।, बेसिक से लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों तक।
आखिर शिक्षा का स्तर इतना गिर क्यों गया हैं ? क्यों पढ़ना और पढ़ाना अब मिशन जैसा नहीं रह गया है ? और क्यों इसको सुधारने की चिंता किसी को नहीं है ?
वैसे, कहने को तो यह कहा जा सकता हैं कि शिक्षा का प्रसार हो रहा है। पढ़ने-लिखने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। कोचिंग, इंस्टीट्यूटों, पत्राचार, पाठ्यक्रमों और स्कूलो-कालेजों की संख्या में दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। ’सबके लिए शिक्षा’ का अभियान चालाय जा रहा है। पर फिर भी, आज विचार शून्यता की स्थिति है। और सोचने-समझने वालों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। क्यों ? तर्क दिया जा सकता है कि आज जब समूचा समाज विकृत हो चला है, तो स्कूल और कालेज क्यों न होंगे ? आखिर समाज के विभिन्न हिस्सों से ही तो पढ़ने के लिए छात्रगण आते हैं। और चूंकि प्रदूषण बाहर चारों तरफ फैला हुआ है, इसलिए आज स्कूल और कालेज भी प्रदूषित हैं।
पर यह पूरा सच नहीं है, क्योंकि आज समाज में ढ़ेर सारी गड़बड़ियां जो दिखायी पड़ रही हैं, उनके पीछे एक मुख्य कारण शिक्षा के स्तर में गिरावट का होना है। अर्थात् आज चूंकि शिक्षा जगत का माहौल प्रदूषित हैं, इसलिए समाज भी प्रदूषित है। क्योंकि सिद्धान्तः विद्यायल होते इसलिए हैं कि वहां पढ़ने वाले कायदे से शिक्षित-ज्ञानशील और विचारवान होकर अच्छे नागरिक बनें और अपनी प्रतिभा व सोच-समझ से समाज को सही दिशा दें। इस लिहाज में देंखें तो शिक्षकों के ऊपर और विद्यालयों पर एक बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी होती हैं, जिसका निर्वाह करने में अगर जरा भी चूक हुई तो समाज की सुख-शांति और ताना-बाना ही नहीं, आने वाले कल की तस्वरी भी पूरी तरह से चैपट हो जाएगी। और यही आज कल हो रहा है।
आज न तो शिक्षक और न ही स्कूल कालेज अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को ठीक ढंग से निभा पा रहे हैं। इसलिए तो दिन पर दिन अमीर-गरीब के बीच की खाई चैड़ी होती जा रही है। इसी देश में दो तरह के नागरिक पैदा हो रहे हैं। श्रम और श्रमिकों को हेय दृष्टि से देखा जा रहा है। सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता की बातें करने वालों को आज बेककूफ और न जाने क्या-क्या समझा जाता है। सभी उच्च मानवीय मूल्यों का ह्नास हो रहा है। और पतनशील संस्कृति जीवन के हर क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन हावी होती जा रही हैं।
दरअसल, जब समाज में पैसे का वर्चस्व हो, उपभोक्ता वाद का बोलबाला हो और समाज की संचालक शक्तियां येन-केन-प्रकारेण मुनाफा और सिर्फ मुनाफा कमाने में जुटी हों, तब उनके लिये बहुत जरूरी होता है कि वे समाज में विचार-निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह से नष्ट-भ्रष्ट कर दें। और यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक कि स्कूलों-कालेजों को पूरी तरह से तहस-नहस करके शिक्षा जगत को पूरी तरह से प्रदूषित न कर दिया जाए। क्योंकि इसी से तो समाज के भविष्य का निर्माण होता है। अगर विचारों की जन्मस्थली को ही भ्रष्ट कर दिया जाए, तो बृहत्तर समाज को विचार-शून्य बनाकर आसानी से किसी भी प्रकार की चाकरी में लगाया जा सकता है।
यही कारण है कि आज सबके अधिक सोचनीय हालत शिक्षा के क्षेत्र की है। अब चूंकि विद्यालय, शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रमों के साथ-साथ पढ़ने और पढ़ाने वाले दूषित माहौल से ग्रस्त हैं, इसलिए भोगवादी और मुनाफाखोर शक्तियां आसानी से समाज को अपने पंजो में जकड़ कर दूषित-प्रदूषित कर रही हैं। ऊपर से समाज के भविष्य बच्चों और युवाओं को बरगला कर भटकाने के लिए टी0वी0, केबल, अश्लील सामग्री, फिल्में, इंटरनेट, माइकल जैक्सन, मैडोना और ब्रिटनी स्पीयर्स हैं ही।
इसलिए आज इस बात की जरूरत आन पड़ी है कि इन स्कूलों-कालेजों के पाठ्क्रम, पद्धति और वातावरण को सुधारा जाए। अध्यापकों को पढ़ाने के लिए प्रेरित या बाध्य किया जाये और छात्रों को पढ़ने के लिए। ट्यूशनों का चलन बंद करना होगा। नकल प्रथा को रोकना होगा। और यह सब सिर्फ कानून बनाने से नहीं होगा। होगा तो सिर्फ और सिर्फ वैचारिक अभियान या कि सशक्त आंदोलन चलाने से। और इसके लिए जागरूक व ईमानदार शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, अध्यापकों, छात्रों और अभिभावकों को आगे आना होगा। तथा एक सशक्त शिक्षा आंदोलन चलना होगा, ताकि यह घटाटोप अंधेरा छंटे और विद्यालय विद्या का मंदिर होकर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निष्ठापूर्वक निभाएं।
--अरविन्द कुमार
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार )

मंगलवार, 10 मार्च 2009

आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--तीन

आज भी हकीकत यही है कि दंगे हों तो कहर महिलाओं पर टूटता है। जातीय संघर्ष हो तो महिलाओं को भुगतना पड़ता हैं। आतंकवादियों का जुल्म बरसता है तो महिलाओं पर। पुलिस और सेना भी जब वहशी होती हैं तो भुगतती हैं महिलाएं। प्रेम प्रसंगों में भी प्रताड़ित महिलाएं ही होती है। यही नहीं, जब भारतीय संस्कृति के स्वयभू ठेकेदार अपनी तथाकथित संस्कृति की रक्षा में नैतिक पुलिस बन कर हिंसक होते हैं, तो सब से ज्यादे शिकार महिलायें ही होतीं हैं। चाहे वह हिन्दू धर्म हो या मुस्लिम, ईसाई हो या कि सिख धर्म, या चाहे कोई भी जाति हो या वर्ण हर जगह महिलाओं को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। सारे नियम कानून और ढेरों पाबंदियाँ महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं। पुरूष हर जगह उनसे ऊपर और आजाद होता है।
दूसरी तरफ बाजार में जब खुलापन आता है, तो भी धड़ल्ले से महिलाएं और उनका शरीर ही बेचा और खरीदा जाता है। गरज यह कि सामंती मध्ययुगीन संस्कृति का बोलबाला हो या पश्चिमी अत्याधुनिक भोगवादी संस्कृति का वर्चस्व, शिकार महिलाओं को ही बनाया जाता हैं। चाहे दबाकर जोर जबर्दस्ती से या फिर फुसलाकर और चकाचैंध से भरी जिंदगी का लालच देकर। और हमारे देश में सामंती संस्कृति की छत्रछाया में ही तो फलफूल रही है यह मुनाफा आधारित पश्चिमी भोगवादी संस्कृति, मुक्त बाजार की अपसंस्कृति, विज्ञापनों, फिल्मों, टीवी सीरियलों और ब्यूटी कान्टेस्टों में महिला-शरीर का भोंड़ा इस्तेमाल और प्रदर्शन मात्र पुरूषों की दमित इच्छाओं की पूर्ति का साधन नहीं तो और क्या हैं ? पुरूष सत्तात्मक समाज में पुरूषों के हितों को ध्यान में रखकर अपना शरीर दिखा-दिखा कर तालियाँ पुरस्कार और पैसे पाने की मजबूरी।
कुल मिलाकर आज भी हमारे समाज की महिलाओं की स्थिति दयनीय और सोचनीय है। हालांकि उनकी स्थिति को बेहतर बनाने क कई एक कोशिशें हुई हैं। भारतीय दंड संहिता की धाराओं में कई सकारात्मक संशोधन हुए है। महिला शिक्षा, महिला को आरक्षण की सुविधा एवं महिला संगठनों व महिला मंचो के जरिए समय-समय पर कुछेक जेनुइन मुद्दों पर आंदोलन कर महिला-चेतना का विकास भी हुआ है, पर सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से किसी सार्थक आंदोलन या जागरण के आभाव में उनकी कुल स्थिति में कोई अधिक या अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। हालांकि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों खास करके अब अक उनके लिए वर्जित माने गए क्षेत्रों में उनकी भागीदारी या घुसपैठ बढ़ी है। और वहां उन्होंने अपनी योग्यताएं साबित भी की हैं, पर समग्रता में देखें तो आज भी गुणात्मक रूप से उन्हें कुछ भी ठोस हासिल नहीं हुआ हैं। महिलाओं की कुल आबादी का लगभग 76 प्रतिशत गाँवों में रहता है। आँकड़े बताते हैं कि इनमें से लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं आज भी अशिक्षित है। और प्रसव के दौरान हर 7 मिनट पर एक महिला की मृत्यु हो जाती है। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े ये तथ्य आजादी के 60 सालों के बाद भी उनकी दयनीय स्थिति को दर्शाते हैं।
पर सवाज यह उठता है कि आखिर महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा कैसे ? कैसे मिलेगा उन्हें सामाजिक न्याय ? बराबरी का वास्तविक दर्जा ? ताकि वे भी समाज के सम्यक विकास में अपना सार्थक योगदान कर सकें। कानून की अपनी सीमाएं जग जाहिर हैं। और खास करके उस देश में जहां भ्रष्टाचार का चहुँ ओर बोलबाला हो तथा पैसे, जोर और रूतबे से न्याय को भी न्यायपूर्ण न रहने दिया जाता हो, वहाँ कानून की सीमाएं यूँ ही बरकरार रहेंगी । वरना दहेज हत्याओं मे इस तरह की वृद्धि कभी नहीं होती। यही हाल छेड़खानी और बलात्कार के खिलाफ खड़े तमाम कानूनों का है। इन सबका माखौल उड़ाते हुए इनकी घटनाएं हर साल बढ़ती ही जा रही हैं। तब फिर ?
आज निश्चित तौर पर इस बात की जरूरत है कि समाज में महिलाओं के प्रति मौजूदा दृष्टिकोण में बदलाव लाया जाए और इसके लिए जरूरी है कि पहले खुद महिलाएं ही अपने हित के प्रति सचेत हों तथा आगे आएं। महिलाओं को इस प्रकार शिक्षित प्रशिक्षित किया जाये कि उनकी चेतना का विकास सम्यक ढंग से और उचित दिशा में हो सके तथा पुरूष सत्तात्मक सोच-समझ पर कारगर दबाव व चोट पड़ सके।
पर विडंबना यह है कि महिलाओं से जुड़े तमाम संगठन आज दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। एक तो धुर महिलावादी विचार दृष्टिकोण को मानने वाले हैं तथा दूसरे प्रगतिशील, जनवादी और क्रांतिकारी सिद्धांतो व विचारों को तहत काम करने वाले। एक उच्च वर्ग और उच्च मध्य वर्ग की महिलाओं के बीच काम करते हैं, तो दूसरे निम्न मध्य वर्ग की कामकाजी महिलाओं और खेत-मजदूर श्रमिक महिलाओं के बीच सक्रिय हैं। पर इन दोनों के अतिवादी व आमतौर पर अव्यावहारिक एवं यान्त्रिक तौर-तरीकों के कारण इन दोनों तरह के संगठनो के साथ व्यापक महिलाओं की भागीदारी कम ही हो पाती है। सच तो यह है अधिकांश प्रगतिशील, जनवादी व क्रान्तिकारी संगठन और पार्टियों अन्दर भी काफी हद तक पुरूषवादी मानसिंकता हावी है। इस पर भी कारगर चोट करने की जरूरत है।
इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि व्यपाक महिलाओं को उनसे जुड़ी तमाम समस्याओं के इर्द-गिर्द एकजुट-गोलबंद करते हुए कुछ इस तरह से जागरूक और शिक्षित किया जाए, ताकि अपनी दोहरी गुलामी के विरूद्ध नुक्ता-दर-नुक्ता संघर्ष करते हुए वे अपनी मुक्ति की सही मंजिल की और बढ़ सकें। पर इसके लिए स्वयं महिलाओं को ही पहल लेनी होगी। और इन दो ध्रुओं पर खड़े महिला संगठनों के बीच या शायद दोनों को मिलाकर एक व्यापक आधार वाले मंच या मोर्चे का निर्माण करना होगा, ताकि वहाँ से वे अपनी लड़ाई को मुकम्मिल अंजाम दे सकें। पहले तो उन्हें हर स्तर पर पुरूषवादी सोच व संस्कृति के विरूद्ध जूझना-लड़ना होगा, फिर दूसरे दौर में पुरूषों के साथ मिलकर हम-कदम होकर इस अन्यायी, भ्रष्ट व अराजक समाज-व्यवस्था को बदलने के लिए इसके विरूद्ध चलने वाले तमाम संघर्षो में सक्रिय हिस्सेदारी निभानी होगी, तभी हो पाएगी उनकी बेहतरी और सही मान्य में उनकी मुक्ति। अन्यथा मानसिक रूप से विकलांग महिलाओं का गर्भाशय यूँ ही निकाला जाता रहेगा, उच्चतम न्यायलय गवाहों और सबूतों के आभाव में यूँ ही बलात्कार की सजा सात साल पहले घटाकर तीन साल करता रहेगा, डायन और चुड़ैल कहकर यूँ ही पत्थरों से पीट-पीटकर मारी जाती रहेंगी महिलाएं, शिवपति व ऊषा धीमान को यूँ ही नंगा करके सरे बाजार घुमाया जाता रहेगा, रूपकँवर यूँ ही जलाई जाती रहेंगी, रोशनी, शाहबानों व इमराना की आवाज यूँ ही नक्कार खाने में तूती की तरह अनसुनी गूँजती रहेगी। और यूँ ही उमड़ता-घुमड़ता रहेगा आधी आबादी की आंखों में दर्द का समंदर आने वाले समय में भी।
अंत में मैं क्रांतिकारी कवि गोरख पांडे की एक कविता के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ-
ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समुन्दर
इस दुनिया को
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए
--अरविन्द कुमार
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)

सोमवार, 9 मार्च 2009

आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--दो

आज हम एक संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। चारो तरफ तीव्र हलचल, उठा-पटक, बहस-मुबाहिसा, संघर्ष और धुव्रीकरण का माहौल है। अभी कल तक जो था, वह आज नहीं है और आज जो है कि वह कल निश्चित ही नहीं रहेगा। घटनाएं इतनी तेजी से घट रही हैं, दृश्य-परिदृश्य इतनी तेजी से बदलता जा रहा है कि आने वाले कल के बारे में अनुमान करना कतई मुश्किल हो गया है। कंप्यूटर, अत्याधुनिक, तक्नालाजी , मुक्त बाजार, आयातित पश्चिमी पूँजी व संस्कृति और अब यह आर्थिक मंदी का भँवर और गोल और गहरा होता जा रहा है। मूल्य और मान्यताएं रोज-ब-रोज बदलती जा रही है। समय के इस नाजुक मोड़ पर कहाँ खड़े है हम ? कहाँ खड़ी हैं हमारी महिलाएं ? भारतीय नारी ? इसकी जाँच पड़ताल करने और इस संदर्भ में निणर्यात्मक बहुत कुछ ठोस करने की जरूरत आन पड़ी हैं। क्योंकि जब तक इस आधी आबादी से जुड़ी समस्याओं व त्रासदियों को हल नहीं कर लिया जाता, समाज की शक्लो सूरत को कतई नहीं बदला जा सकता। इधर-उधर से पैबंद लगाकर इसे सुधारने की लाख कोशिशें क्यों न कर ली जायें।
अपने चारों तरफ आज हम निगाहें दौड़ाते हैं, तो पाते है कि हमारे यहाँ महिलाएं आज भी कमोबोश मध्ययुगीन सोव व संस्कृति तथा पतनशील, मुनाफाखोर, पूँजीवादी उपभोक्ता मूल्यों के पाटों में दबी पड़ी छटपटा रही हैं। शहरी अत्याधुनिक उच्च वर्ग की महिलाओं से लेकर दूर-दरार की गँवई-गाँव की महिलाएं तक पितृ-सत्तात्मक समाज-व्यवस्था के अंतर्विरोधों और दंशो को हर पल-हर दिन झेल रही हैं। कहीं वे यौन-उत्पीड़न की शिकार हैं, तो कहीं घर की चारदीवारी में कैद। पति को शारीरिक सुख देते हुए बच्चे पैदा करने की मशीन बनी, पति और बच्चों की देखभाल करने के तथाकथित फर्ज के बोझ तले पिस रही हैं। कहीं उन पर यौन-उन्मुक्तता की कुंठाएँ हावी हैं, तो कहीं वे कैरियर और अस्तित्व के लिए जूझती हुई मर-खप रही हैं या फिर मुनाफाखौर बाजार की माँगो के अनुसार खुले बाजार में वस्तु की तरह बिक रही हैं। उपेक्षा, उत्पीड़न, शोषण, दोहन, दमन और क्रय-विक्रय। यही कुछ आज भी उनकी नियति बनी हुई है।
बराबरी का हक, समानता का दर्जा, संवैधानिक अधिकार, महिला जागृति, महिला मंच, संगठन, महिला आंदोलन और महिलाओं के लिए राष्ट्रीय कमीशन आदि की चर्चाएँ तो खूब होती हैं, पर आज भी महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा बूढ़ी मान्यताओं, अनर्गल रूढ़ियों और अंधविश्वासों के घने दलदली जंगल में फंसा हुआ है। आज भी अपनी पहचान के लिए उसे हर स्तर पर जूझना पड़ता हैं, वरना बाप, भाई, पति और बेटे से ही आज भी उसकी पहचा है। अभी भी वह लगभग दोयम दर्जे की नागरिक है। शिक्षा, नौकरी, पद, प्रतिष्ठा और आर्थिक आजादी भी उसकी सामाजिक व घरेलू हैसियत में कोई खास फर्क नहीं ला पाये हैं, क्योंकि वहाँ भी उसे पति या किसी पुरूष की इच्छानुसार चलना, काम करना और निर्णय लेना पड़ता है। वह घर चलाने और पति को सहयोग देने के लिए नौकरी तो करती है, परन्तु उसे अपने कमाये हुए पैसों को खर्च करने तक की आजादी नहीं है। ऐसी महिलाओं की संख्या आज भी काफी हैं, जो पति से अधिक तन्ख्वाह पाने के बावजूद उनकी मर्जी की ही गुलाम हैं और यदा-कदा उनसे पिटती भी रहती हैं। यही नहीं, निम्न आय वर्ग की श्रमिक महिलाएं तो अधिक श्रम करने के बावजूद अपने सहकर्मी पुरूष श्रमिकों से कम मजदूरी पाती हैं। और अपने निकम्मे व शराबी पति से पिटने के लिए अभिशप्त हैं। यौन-शोषण तो खैर दोनों जगहों पर बराबर मात्रा में है।
महिलाओं के साथ छेड़खानी, दहेज-हत्या, विधवा-हत्या (सतीप्रथा) बेइज्जती और बलात्कार की घटनाएं दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही हैं। इधर महिलाओं को नंगा करके घुमाए जाने या उनके माथे पर गोदना गोदवाए जाने या थाने मे उनके साथ सामूहिक बलात्कार करने की घटनाओं में जो अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसे भी महिला उत्पीड़न के इसी परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा चाहिए, जहाँ गर्भ में लिंग निर्धारित होते ही उनकी हत्या कर दी जाती है। आज भी यह धारणा आम है कि महिलाओं को दया, प्रेम, क्षमा, शर्म और हया की प्रतिमूर्ति बनकर घर की चार-दीवारी या पर्दें के भीतर ही रहना चाहिए। आज भी उन्हें पुरूषों की तुलना में कमजोर, हेय और दोयम दर्जे का मानकर मात्र भोग्या माना और समझा जाता है तथा उनकी बुद्धि, प्रतिभा, एकाग्रता, लगन, निष्ठा, जीजिविषा और कर्तव्यपरायणता की तुलना में (उनको नकार कर) अनके शरीर की खूबसूरती, मादकता, फीगर और सेक्स को ही महत्व दिया जाता हैं।
शेष फिर कभी--
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)

शनिवार, 7 मार्च 2009

आज कहाँ खड़ी हैं महिलायें--एक

हिन्द सुप्रसिद्ध लेखिक डॉक्टर प्रभ खेतान हम उनक रचनाओ "आआ पेप घर चले ", "पील आंध ", "छिन्नमस्त " , "अपरिचित उजाल ", "उपनिवेश मे स्त्र " और विश्व विख्यात अस्तित्ववाद चिंतक लेखक ज्या पाल सार्त्र पर लिख उनक पुस्तको जानते है किन प्रभ सबस ज्याद ख्याति फ्रांसीस रचनाकार सिमोन बोउव पुस्तकि सेकेंड सेक्स अनुवादस्त्र उपेक्षित मिली। आज अंतर्राष्ट्रीय महिल दिवस अवसर पर मै इस पुस्तक लिए लिख गई उनक भूमिक अंश यहा प्रस्तुत कर रह हू 1949 मे लिख गई ' सैकेण्ड सेक्स ' सन्दर्भ मे भारतीय स्त्रियो लेकर 1989 मे लिख गय प्रभ खेतान विचारआज प्रसंगिक हैं।

"हमें बड़ी उदारता से सामान्य स्त्री और उसके परिवेश के बारे में सोचना होगा। सीमोन ने उन्हीं के लिये इस पुस्तक में लिखा है और उन्हीं से उनका संवाद हैविशिष्टों या अपवादों से नहीं।"
प्रभा खेतान

"स्त्री पैदा नहीं होती उसे बना दिया जाता है "— सीमोन बोउवार

(प्रभा खेतान द्वारा लिखित 'स्त्री उपेक्षिता' की भूमिका का एक छोटा अंश)

" इस पुस्तक का अनुवाद करने के दौरान कभी – कभी मन में एक बात उठती रही है। क्या इसकी ज़रूरत है? शायद किसी की धरोहर मेरे पास है‚ जो मुझे लौटानी है। यह किताब जहां तक बन पड़ा मैं ने सरल और सुबोध बनाने की कोशिश की। मेरी चाह बस इतनी है कि यह अधिक से अधिक हाथों में पहुंचे। इसकी हर पंक्ति में मुझे अपने आस – पास के न जाने कितने चेहरे झांकते नज़र आए। मूक और आंसू भरे। यदि कोई इससे प्रेरणा पा सके‚ औरत की नियति को हारराई से समझ सके‚ तो मैं अपनी मेहनत बेकार नहीं समझूंगी। हांलाकि जो इसे पढ़ेगा‚ वह अकेले पढ़ेगा‚ लेकिन वह सबकी कहानी होगी। हाँ‚ इसका भावनात्मक प्रभाव अलग – अलग होगा।"
" आज यदि कोई सीमोन को पढ़े‚ तो कोई खास चौंकाने वाली बात नहीं भी लग सकती है। आज स्त्री के विभिन्न पक्षों पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है‚ लेकिन मैं यह सोचती हूँ कि यह पुस्तक हमारे देश में आज भी बहस का मुद्दा हो सकती है। हम भारतीय कई तहों में जीते हैं। यदि हम मन की सलवटों को समझते हैं‚ तो ज़रूर यह स्वीकारेंगे कि औरत का मानवीय रूप सहोदरा कही जाने के बावज़ूद स्वीकृत नहीं है। हमारे देश में औरत यदि पढ़ी – लिखी है और काम करती है‚ तो उससे समाज और परिवार की उम्मीदें अधिक होती हैं। लोग चाहते हैं कि वह सारी भूमिकाओं को बिना किसी शिकायत के निभाए। वह कमा कर भी लाए और घर में अकेले खाना भी बनाए‚ बूढ़े सास – ससुर की सेवा भी करे और बच्चों का भरन – पोषण भी। उसकी पड़ोसन अगर फूहड़ है तो उससे फूहड़ विषयों पर ही बातें करे‚ वह पति के ड्राईंगरूम की शोभा भी बने और पलंग की मखमली बिछावन भी। चूँकि वह पढ़ी – लिखी है‚ इसलिये तेज – तर्रार समझी जाती है‚ सीधी तो मानी ही नहीं जा सकती। स्पष्टवादिता उसका गुनाह माना जाता है। वह घर निभाने की सोचे‚ घर बिगाड़ने की नहीं। सब कुछ तो उसी पर निर्भर करता है? समाज ने इतनी स्वतन्त्रता दी‚ परिवार ने उसे काम करने की इजाज़त दी है‚ यही क्या कम रहमदिली है! फिर शिकायत क्या?"
" यह पुस्तक न मनु संहिता है और न गीता न रामायण। हिन्दी में इस पुस्तक को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ यह है कि विभिन्न भूमिकाओं में जूझती हुई‚ नगरों – महानगरों की स्त्रियां इसे पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया मुझे लिख कर भेजें। यह सच है कि स्त्री के बारे में इतना प्रामाणिक विश्लेषण एक स्त्री ही दे सकती है। बहुधा कोई पाठिका जब अपने बारे में पुरुष के विचार और भावनाएं पढ़ती है‚ तब उसे लेखक की नीयत पर कहीं संदेह नहीं होता। ' अन्ना कैरेनिना ' पढ़ते हुए या शरत चन्द्र का 'शेष प्रश्न ' पढ़ते हुए हम बिलकुल भूल जाते हैं कि इस स्त्री – चरित्र को पुरुष गढ़ रहा है‚ और यदि लेखक याद भी आता है तो श्रद्धा से मस्तक नत हो जाता है। पर यह बात भी मन में आती है कि यदि 'अन्ना' का चरित्र किसी स्त्री ने लिखा होता‚ तो क्या वह 'अन्ना' को रेल के नीचे कटकर मरने देती? यदि देवदास की ' पारो' को स्त्री ने गढ़ा होता‚ तो क्या वह यूँ घुट – घुट कर मरती?"
" फ्रांस की जो स्थिति 1949 में थी‚ पश्चिमी समाज उन दिनों जिस आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था‚ वह शायद हमारा आज का भारतीय समाज है‚ उसका मध्यमवर्ग है‚ नगरों और महानगरों में बिखरी हुई स्त्रियां हैं‚ जो संक्रमण के दौर से गुज़र रही हैं।"
" आज 1989 में हो सकता है कि सीमोन के विचारों से हम पूरी तरह सहमत न हों‚ हो सकता है कि हमारे पास अन्य बहुत सी सूचनायें ऐसी हों‚ जो इन विचारों की कमजोरियों को साबित करें‚ फिर भी बहुत सी स्त्रियाँ विचारों में अपना चेहरा पा सकती हैं। कुछ आधुनिकाएँ यह कह कर मखौल उड़ा सकती हैं कि हम तो लड़के – लड़की के भेद में पले ही नहीं। सीमोन के इन विचारों में मैं देश तथा विदेश में अनेक महिलाओं से बातें करती रही हूँ। हर औरत की अपनी कहानी होती है‚ अपना अनुभव होता है‚ पर अनुभवों का आधार सामाजिक संरचना तथा स्थिति होते हैं। परिस्थितियां व्यक्ति की नियंता होती हैं। अलगाव में जीती हुई स्त्रियों की भी सामूहिक आवाज़ तो होती ही है। आज से बीस साल पहले औसत मध्यवर्गीय घरों में स्वतन्त्रता की बात करना मानो अपने ऊपर कलंक का टीका लगवाना था। मैं यहां पर उन स्त्रियों का ज़िक्र नहीं कर रही‚ जो भाग्य से सुविधासम्पन्न विशिष्ट वर्ग की हैं तथा जिन्हें कॉन्वेन्ट की शिक्षा मिली है। मैं उस औसत स्त्री की बात कर रही हूँ‚ जो गाय की तरह किसी घर के दरवाजे पर रंभाती है और बछड़े के बदले घास का पुतला थनों से सटाए कातर होकर दूध देती है।
हममें से बहुतों ने पश्चिमी शिक्षा पाई है‚ पश्चिमी पुस्तकों का गहरा अध्ययन किया है‚ पर सारी पढ़ाई के बाद मैं ने यही अनुबव किया कि भारतीय औरत की परिस्थिति 1980 के आधुनिक पश्चिमी मूल्यों से नहीं आँकी जा सकती। कभी ठण्डी साँसों के साथ मुँह से यही निकला‚ ' काश! हम भी इस घर में बेटा हो कर जन्म लेते! ' लेकिन जब पारम्परिक समाज की घुटन में रहते हुए और यह सोचते हुए कि पश्चिम की औरतें कितनी भाग्यशाली हैं‚ कितनी स्वतन्त्र एवं सुविधा सम्पन्न हैं और तब सीमोन का यह आलोचनात्मक साहित्य सामने आया‚ तो मैं चौंक उठी। सारे वायवीय सपने टूट गए। न पारम्परिक समाज में पीछे लौटा जा सकता है और न ही आधुनिक कहलाने वाले पश्चिमी समाज के पीछे झाँकता हुआ असली चेहरा स्वीकार करने योग्य था। सीमोन ने उन्हीं आदर्शों को चुनौती दी‚ जिनका प्रतिनिधित्व वे कर रही थीं। औरत होने की जिस नियति को उन्होंने महसूस किया उसे ही लिखा भी। उन्होंने पश्चिम के कृत्रिम मिथकों का पर्दाफाश किया। पश्चिम में भी औरत देवी है‚ शक्तिरूपा है‚ लेकिन व्यवहार में औरत की क्या हस्ती है?"
" सीमोन को पढ़ते हुए औरत की सही और ईमानदार तस्वीर आँखों में तैरती है। यह समझ में आता है कि हम अकेले औरत होने का दर्द एवं त्रासदी को नहीं झेल रहीं। यह भी लगा कि हमारे देश की ज़मीन अलग है। वह कहीं – कहीं बहुत उपजाऊ है तो कहीं – कहीं बिलकुल बंजर। कहीं जलता हुआ रेगिस्तान है‚ तो कहीं फैली हुई हरियाली‚ जहां औरत के नाम से वंश चलता है। साथ ही यह भी लगा कि सीमोन स्वयं एक उदग्र प्रतिभा थीं और उनकी चेतना को ताकत दी सात्रर् ने‚ जो इस सदी के महानतम दार्शनिकों में से एक हैं। क्या सात्रर् की सहायता के बिना सीमोन इतना सोच पातीं? हमारी संस्कृति का ढांचा अलग है। सीमोन औरत के जिन भ्रमों एवं व्यामोहों का ज़िक्र करती हैं‚ हो सकता है वे हमारे लिये आज भी ज़रूरी हों।"
" पुस्तक लिखते हुए स्त्री की स्थिति का उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के विश्लेषण किया। उन्होंने कहाः " स्त्री कहीं झुण्ड बना कर नहीं रहती। वह पूरी मानवता का हिस्सा होते हुए भी पूरी एक जाति नहीं। गुलाम अपनी गुलामी से परिचित हैं और एक काला आदमी अपने रंग से‚ पर स्त्री घरों‚ अलग – अलग वर्गों एवं भिन्न – भिन्न जातियों में बिखरी हुई है। उसमें क्रान्ति की चेतना नहीं‚ क्योंकि अपनी स्थिति के लिये वह स्वयं ज़िम्मेदार है। वह पुरुष की सहअपराधिनी है। अतः समाजवाद की स्थापना मात्र से स्त्री मुक्त नहीं हो जायेगी। समाजवाद भी पुरुष की सर्वोपरिता की ही विजय बन जाएगा। — सीमोन द बोउवार( द सैकेण्ड सेक्स) "
" नारीत्व का मिथक आखिर है क्या ? क्यों स्त्री को धर्म‚ समाज‚ रूढ़ियां और साहित्य – शाश्वत नारीत्व के मिथक के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। सीमोन विश्व की प्रत्येक संस्कृति में पाती हैं कि या तो स्त्री को देवी के रूप में रखा गया है या गुलाम की स्थिति में। अपनी इन स्थितियों को स्त्री ने सहर्ष स्वीकार किया‚ बल्कि बहुत सी जगहों पर सहअपराधिनी भी रही। आत्महत्या का यह भाव स्त्री में न केवल अपने लिये रहा‚ बल्कि वह अपनी बेटी‚ बहू या अन्य स्त्रियों के प्रति भी आत्मपीड़ाजनित द्वेष रखती आई है। परिणामस्वरूप स्त्री की अधीन्स्थता और बढ़ती गई।"

(समकालीन जनमत से साभार)

सोमवार, 2 मार्च 2009

यह न्याय है या....

यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। पर लगती बिल्कुल फिल्मों जैसी है। अशोक राय उर्फ़ अमित नाम के एक तेज-तर्रार और मेधावी लड़के के पास एक लडकी ट्यूशन पढ़ने जाती थी। पढाते-पढाते उस शिक्षक युवक की नीयत ख़राब हो जाती है। और एक दिन धोखे से प्रसाद में नशीला पदार्थ मिलाकर वह उस लडकी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना लेता है। इतना ही नहीं, अशोक राय अब उस लडकी को शादी का झाँसा देकर लगातार उस के साथ महीनों बलात्कार करता है। अपने परिचितों के साथ सोने के लिए उस पर दबाव बनाता है। और जब लडकी गर्भवती हो जाती है, तो उसको माला-डी की गोलियां देकर उसका एबार्शन करने की कोशिश भी करता है। इस ज़लालत और घिन भरी ज़िंदगी से तंग होकर वह लडकी एक दिन आत्महत्या कर लेती है।
वर्ष
२००३ में राय के खिलाफ दिल्ली के कृष्णा नगर थाने में आई पी सी की धारा ३७६ और ३०६ के तहत बलात्कार व आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया जाता है। निचली अदालत अशोक राय को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है। और वह जेल भेज दिया जाता हैसब को लगता है की चलो, पीड़ित लडकी को न्याय मिल गया। उसकी मृत-आत्मा को शान्ति मिल गयी। बलात्कार करने और आत्महत्या के लिए उकसाने वाले को फाँसी न सही, कम से कम उम्रकैद की सज़ा तो मिली। अंत भला तो सब भला....
पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं हुयी। यह तो सिर्फ़ इंटरवल था। अशोक राय जेल में रहते हुए आई ए एस की परीक्षा पास कर लेता है। और उत्साहित हो कर उच्च न्यायलय में अपील करता है। उच्च न्यायलय में धारा ३७६ के तहत तो उसकी अपील खारिज कर दी गयी, पर जेल में उसके चाल-चलन और उसके आई ए एस की परीक्षा पास करने के कारण उसकी बलात्कार की उम्रकैद वाली सज़ा कम करके सिर्फ़ साढ़े पॉँच साल कर दी गयी। पर चूँकि वह अब तक इतनी सज़ा काट चुका था, इसलिये उसे रिहा कर दिया गया। लेकिन ३०६ के तहत राय पर लडकी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप कत्तई साबित न हो पाने के कारण उसे बाइज्जत बरी कर दिया गया। और अब वह बलात्कारी एक आई एस अधिकारी बनने की राह पर शान से बढ़ चला है।...
दिल्ली उच्च न्यायलय के इस चर्चित फैसले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या किसी बलात्कारी की सज़ा को कम करने के लिए उसके अच्छे चाल-चलन का सबूत यह माना जाना चाहिए की उसने जेल में रह कर आई ए एस की लिखित परीक्षा पास कर ली है? क्या आई ए एस की परीक्षा पास कर लेना ही अच्छे व्यवहार का सबूत है ? क्या इसका मतलब यह निकाला जाए की अगर कोई आई ए एस अधिकारी या पढ़ा-लिखा व्यक्ति बलात्कार जैसा कोई जुर्म करे तो उसे कम से कम सज़ा मिलनी चाहिए ?
अशोक राय ने ये अपराध भूल वश नहीं, बल्कि अपनी विकृत मानसिकता के चलते बहुत ही सुनियोजित तरीके से ठंडे दिमाग से किए थे। माना की क़ानून और अदालत का काम सिर्फ़ सज़ा देना ही नहीं, सुधरे हुए कैदियों को समाज की मुख्या धारा में शामिल भी करना होता है। पर क्या अब राय वाकई सुधर गया है ? उसकी मानसिकता सच में बदल गयी है ? या क्या उसने मुरैना या भिंड के डान्कुओं की तरह कानून के सामने आत्म-समर्पण किया है और कसम खाई है की भविष्य में वह ऐसी हरकत दुबारा नही करेगा ? इस बात की क्या गारंटी है ? पर माननीय न्यायलय ने तो सिर्फ़ उसके आई ए एस की परीक्षा को पास करने को ही आधार माना है। तो फ़िर ?
राय ने जो किया है वह कानून की नज़र में एक अपराध है। एक संगीन अपराध। उसको इसकी सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए। ताकि दूसरे बलात्कारी डरें। न्यायलय के इस फैसले से समाज में यह संदेश जा सकता है की अदालतें अब बलात्कार की गंभीरता कम कर के देखने लगीं हैं।....अशोक राय तो शायद अब समाज की मुख्य धारा में शामिल हो जाए, पर उस लडकी के साथ जो हुआ और इसकी वज़ह से उसके परिवार को जो बदनामी व ज़लालत की ज़िंदगी झेलनी पडी, उसको असली न्याय कैसे और कब मिलेगा ? यहाँ ज़ुल्म राय के साथ नहीं, उस लडकी और उसके परिवार के साथ हुआ है। आशा है उच्चतम न्यायलय इन बिन्दुओं पर अवश्य ध्यान देगा। क्योंकि अंतिम फैसला तो अब उसी को करना है।वैसे, आप क्या सोचते हैं ?
(चित्र गूगल इमेज सर्च से साभार)

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

काहे की जय हो ?

आज कल पूरा देश जय हो-जय हो की जय-जय कार में मदमस्त होकर पागलों की तरह झूम रहा है और ऑस्कर मिलने की खुशी में लोग-बाग़ फूल कर इतना कुप्पा हो रहे हैं कि सच की तरफ़ न तो ख़ुद देखना चाहतें हैं और दूसरों को देखने-सुनने दे रहे हैं। जश्न मनाने का शोर भाई लोगों ने इतना कनफोरवा कर रखा है कि जब तक कोई कुछ सोच-समझ पाए, तब तक स्लमडॉग मिलिनिअर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक अपना बिजनेस कर के खूब सारा पैसा यहाँ से बटोर लें जायें। और उनका यह कम खूब असं कर रहे हैं उदार पूंजीवाद और वैश्वीकरण की समर्थक इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया। जी हाँ, यह है बाजारवाद का नया रूप जो अबकी ऑस्कर की शक्ल में हमारे यहाँ आया है। चाहे वह स्लमडॉग मिलिनिअर को हांथों-हाथ उठाने का मसला हो या इस्माईल पिंकी को पुरस्कृत करने की बात हो।
इसमें कोई शक नहीं कि ए0 आर0 रहमान एक उच्चकोटि के संगीतकार हैं और गुलजार एक महान गीतकार। उनकी पहचान, प्रतिभा और कला किसी मठ, मंच व कुछ तथाकथित कला-पारखियों की स्वीकृति या प्रमाण-पत्र की मोहताज बिल्कुल नहीं है। उन्होंने दुनिया को अब तक एक से बढकर एक उत्कृष्ट फिल्मी और गैर फिल्मी रचनायें दी हैं। पर उनकी तरफ आज तक किसी पश्चिमी ज्ञानी-विशेषज्ञ का ध्यान क्यों नहीं गया था ? और उनको अब जिस गाने व धुन के लिए सम्मानित किया गया है, क्या वह वाकई उनकी एक सर्वश्रेष्ठ कृति है ? ऐसा तो शायद वे खुद भी नहीं मानते होंगे।
हमें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि उनको दिया गया यह सम्मान और उनकी प्रशंसा में गोरों द्वारा गाए गये ये तमाम गान यूँ ही स्वाभाविक या निस्वार्थ नहीं है। यह ढ़हते हुए विश्व-बाजार की मुनाफा आधारित उस स्वार्थी रणनीति का नतीजा है, जिसके तहत कभी सुस्मिता सेन या ऐशवर्या राय को दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की बनाकर भारत को एक बड़े बाजार और भारतीयों को शक्तिशाली उपभोक्ता समूह में बदलने की चालाक प्रक्रिया शुरू की गयी थी। इन सब से अन्जान हम तब भी गदगद हो कर कुलाँचे भरने लगे थे कि देखो आखिर दुनिया ने भारतीय सौंदर्य का लोहा मान ही लिया। हलाँकि ये दोनों (सुस्मिता और ऐशवर्या) वास्तविक भारतीय सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति और बहुत खूबसूरत हैं। पर कई बार बाजार अकूत मुनाफा कमाने की लालसा में कुछ मिडियाकर चेहरों को भी आसमान पर बिठा देता है। जैसा कि बाद के सालों में किया भी गया था। स्लमडॉग मिलिनियर के अति प्रचार-प्रसार के पीछे भी इसी धूर्तता का हाथ है। लेकिन हम यह सोच-सोच कर हवा में कुलांचे मार रहें हैं कि देखो आखिर उनको हमारे यहाँ की प्रतिभावों की सुध आ ही गयी। पर इसबार फर्क सिर्फ इतना है कि ऐशवर्या और सुस्मिता को सिर आँखो पर तब बैठाया गया था जब वैश्वीकरण और उदार पूँजी अपने उठान पर थी। और अब रहमान व गुलजार को हाथों हाथ इसलिए लिया जा रहा है, क्योंकि इस समय विश्व-बाजार बिलकुल मरने की कगार पर है।
अन्य तमाम उद्योगों की तरह हॉलीवुड का फिल्म उद्योग भी मृतप्राय है। और इसको तत्काल ऐसे ही किसी ऑक्सीजन की जरूरत है। जाहिर सी बात है कि रहमान, गुलजार व अनिल कपूर की सक्रिय भागीदारी से और भारत की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म को मिले हुए अवार्ड और आस्कर के लिए हुए नामिनेशन ने इसको इतनी चर्चा तो दिला ही दी है कि लाखों लोग खास करके भारतीय दशर्क फिल्म की तरफ अपने आप खिचें चले आयेंगे। और इसके गीत गानो की सीडी, डीवीडी और कैसेटस पूरी दुनिया में (भारत मे सबसे अधिक) आसानी से बिक जायेगें। इसमें कोई शक नहीं कि सलामडॉग मिलिनियर फिल्म का मुख्य उददेश्य सिर्फ और सिर्फ व्यापार करना है न कि उत्कृष्ट कलात्मक फिल्मों की कड़ी में एक और कृति जोड़ना। इस लिहाज से देखें तो डेनी बायल (निर्देशक) और क्रिश्चियन काल्सन (निर्माता) का मकसद आसानी से पूरा हो रहा है। यह एक कम बजट की कम लागत से बनी फिल्म है, जिसमें कथा लेखक से लेकर कलाकार और लोकेशन तक सब कुछ भारतीय है। और काफी सस्ता भी। दूसरे शब्दों में कहें तो कच्चा माल हमारा, कल-कारखाने व कामगार हमारे और उपभोक्ता भी हम और हमारा देश। क्या अब हालीवुड के फिल्म-उद्योग में इस तरह से आउट सोर्सिंग की शुरूआत नहीं है ? चर्चा तो इस बात की भी खूब हो रही है कि फिल्म के निर्माता और निर्देशक ने स्लम्स में रहने वाले बच्चों से मुफ्त मे काम कराकर उनका भरपूर आर्थिक शोषण किया है। अब अनिल कपूर और इरफान खान को उन के रेट के मुताबिक पारिश्रमिक दिया गया या नहीं, पर इस फिल्म में काम कर के वे अपने आपको काफी धन्य महसूस कर रहे है। और यही उनके लिए बहुत है।
भाई लोगों को खुशी इस बात की भी बहुत ज्यादे है कि भारतीयों को विदेश का कोई बड़ा पुरस्कार मिला है। और यह बड़े गर्व की बात है। यह हमारी मानसिकता को दर्शाता है। दरअसल हम आजाद तो हो गये है और हमारी आजादी ने साठ साल का लम्बा सफर भी पूरा कर लिया है, परन्तु हमारी मानसिकता अभी भी पूरी तरह से गुलाम बनी हुई है। इसी कारण हम मौका मिलते ही अंग्रेजी और अंग्रेजो के आगे न सिर्फ नतमस्तक हो जाते हैं, बल्कि इसमें अपनी शान भी समझते हैं। जब तक हमें कोई विदेशी स्वीकृति, पुरस्कार या सम्मान नहीं मिलता, हमें अपना जीवन या तमाम रचनात्मक उपलब्धियाँ अधूरी लगती हैं। और जब यह हमें मिलता है, तो हम अपने आप को रायबहादुर या जागीरदार जैसे खिताबों से पुनः नवाजा हुआ मानकर गर्व से सीना चौडा करने लगते, जैसा कि इस समय कर रहें हैं।
यह कोई जरूरी नहीं है कि किसी गोरी चमड़ी द्वारा बनायी गयी फिल्म या रचा हुआ साहित्य शानदार और अद्वितीय ही हो। हम जानतें हैं कि विदेशों में भी हर साल सैकड़ों कूडा फिल्में बनती हैं या बकवास साहित्य रचा जाता है। और अगर हॉलीवुड की फिल्मों के तकनीकी पक्ष को छोड़ दिया जाये, तो उनके फिल्मी लेखकों, निर्देशकों व कलाकारों की तुलना में हमारे यहाँ के कलाकार कहीं अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। बल्कि हमारे यहाँ की सोच, समझ और दृष्टि का स्तर इन विदेशियों से अधिक ऊँचा और मानवीय होता है। खासकर के इस देश की मिट्टी के दुख-दर्द को समझने और रचनाओं में उकेरने के संदर्भ में हमारी संवेदना अधिक सहज और तीव्र होती है। यदि इसी स्लमडॉग मिलिनियर फिल्म को किसी कुशल भारतीय निर्माता-निर्देशक ने बनाया होता, तो वह अधिक जीवंत व प्रभावशाली होती। पर क्या तब भी इस को इतनी ही तवज्जो दी जाती ? और तब भी क्या इसके लिए ऑस्कर में इतना ही धूम-धडाका किया जाता ?
अंत में मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस्माईलपिंकी को मिले ऑस्कर को भी इसी लिहाज से देखने और समझाने की जरूरत है। यह दोकुमेंट्री तो सीधे-सीधे स्माईल ट्रेन का प्रचार कर ने वाली फ़िल्म है। यह स्वयं सेवी संस्था भारत सहित कई विकासशील देशों में कटे-फटे होंठों-तालू का ऑपरेशन करवाती है। और अच्छे-अच्छे प्लास्टिक सर्जन्स का अपने तरीके से इस्तेमाल करती है। इस के कारण कई प्लास्टिक सर्जन तो अपनी सरकारी नौकरी को छोड़ कर इस्माईल ट्रेन पर सवार हो रहें हैं, क्योंकि यहाँ से उनको खूब सारा नाम और पैसा मिल रहा है। यह चिकित्सा के क्षेत्र का घातक बाजारवाद है।
अच्छा एक बात बताइए, हमें सम्मान मिल गया, पुरस्कार झटक लिया, प्रचार हो गया, हम गदगद हो लिए और हमारा जीवन धन्य हो गया, पर क्या इससे असल जिन्दगी के ज़मालों या की पिंकियों जिन्दगी बदल पायेगी ? ये स्लम्स और कटे-फटे तालू-होंठ जिन सामाजिक व आर्थिक कारणों से होतें हैं वे परिस्थितयां क्या बदल जायेंगी ?
(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

जी हाँ, नुकसान पहुँचा सकता है मोबाइल फोन

मोबाइल फोन आज हर आदमी की जरूरत बन गये हैं । बड़े-बूढे, जवान और बच्चे सभी इसका इस्तेमाल धड़ल्ले सेकर रहे हैं । एक अनुमान के अनुसार आज दुनिया भर में पचास करोड़ से ज्यादा लोग मोबाइल फोन के नियमितउपभोक्ता हैं। स्वाभाविक भी हैं इन्फार्मेशन तकनालोजी और दूर-संचार के इस दौर में यह आज की एक बड़ीआवश्यकता बन गयी हैं । इसके फायदे भी बहुत हैं। तुरत-फरत किसी को भी फोन करने सुनने की सुविधा। संदेशभेजने-पाने की सहूलियत। मनचाही आडियो-वीडियो रिकार्डिग। इन्टरनेट, सर्फिग और एफ0 एम0 रेडियो ! परहमें पता होना चाहिए की यह उच्च तकनीक वाला सुविधाजनक व उपयोगी मोबाइल फोन हमें काफी नुकसान भीपहुँचा सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना हैं कि मोबाइल फोन का अत्याधिक और लम्बे-लम्बे समय तक उपयोग स्वास्थय के लिए काफी हानिकारक हो सकता हैं । हाल ही में हुए कई शोधों से यह बात साबित हुई है कि कम उम्र के बच्चों और युवाओं द्वारा मोबाइल फोन के अंधाधुंध इस्तेमाल से उनको भविष्य में मिरगी, ह्रदय रोग, ब्रेन ट्यूमर, नपुंसकता, कैंसर और अल्झेमर जैसी कई खतरनाक बीमारियाँ हो सकती हैं। दरअसल, मोबाइल फोन से ''नॉन-आयोनाइजिंग'' विकिरण उत्सर्जित होता है, जिसे ''मोइक्रोवेब रेडियशन'' कहा जाता हैं । आज दुनिया भर के वैज्ञानिक और विकिरण विशेषज्ञ इस बात से पूरी तरह से सहमत हैं कि इस ''नॉन-आयोनाइजिंग रेडियशन'' की अधिक और लगातार खुराक से मानव-शरीर की कोशिकाओं को काफी हद तक नुकसान पहुँचा सकती है।
अमेरिका वैज्ञानिकों डा0 हेनरी लेई और उनके सहयोगियों ने अपने कई अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकाला कि कम मात्रा का ''माइक्रोवेव रेडियशन'' भी चूहों के मस्तिष्क की कोशिकाओं के ''डी0 एन0 ए0'' अणुओं को विभाजित कर देता हैं । आज यह बात वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो चुकी है कि मस्तिष्क की कोशिकाओं के डी0 एन0 ए0 का इस तरह से विभाजन ''अल्झेमर'', ''पार्किन्सन'' और ''कैन्सर'' जैसी खतरनाक बीमारियाँ उत्पन्न कर सकता हैं ।
ब्रीस्टल रोयल इन्फर्मरी के डा0 एलेन प्रीस ने अपने लम्बे समय के अध्ययनों से यह पाया कि मोबाइल फोन से निकलने वाला विकिरण हमारे मस्तिष्क के कार्य करने की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित कर देता है। स्वीडन के नेशनल इन्स्तितुते ऑफ़ वर्किंग लाइफ के वैज्ञानिक डा0 जेल हेन्सन माइल्ड ने अपने वैज्ञानिक अनुसंधानो से यह निष्कर्ष निकाला कि मोबाइल फोन के नियमित उपभोक्ताओं को कुछ समय बाद सिरदर्द की शिकायत होने लगती है। उनकी शारीरिक थकान बढ़ जाती है। और कभी-कभी उनकी त्वचा में जलन और खुजली की शिकायत भी होने लगती हैं। यही नहीं आस्ट्रेलिया के डा0 माइकल रेपचोली, जो कि एडीलेड के रोंयल हॉस्पिटल के वरिष्ठ वैज्ञानिक चिकित्सक हैं, के अनुसार अगर मोबाइल फोन से निकलने वाले विकिरण की मात्रा चूहों को प्रतिदिन एक घंटे तक दी जाये तो उनको कैंसर उत्पन्न हो सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ मोबाइल फोन कम्पनियाँ इन दुष्प्रभावों को एक सिरे से नकार रही हैं। अभी हाल ही में जनरल ऑफ़ अमेरिकन मेडिकल एसोशियेशन और न्यू इंगलैंड जनरल ऑफ़ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली विकिरण के ब्रेन ट्यूमर और कैंन्सर नहीं होता हैं। पर ध्यान देने वाली बात यह है कि कई बार ब्रेन ट्यूमर धीरे-धीरे बढ़ता है। उपरोक्त रिपोर्ट को तैयार करते समय 1982 से 1995 के अध्ययनों को आधार बनाया गया है । और तब की अवधि में मोबाइल फोन का इस्तेमाल इतना अधिक नहीं होता था तथा मोबाइल फोन इतने भारी और साथ रखने के लिहाज से काफी असुविधाजनक होते थे, इसलिए लोग इनका प्रयोग आज की तुलना में बहुत कम ही करते थे।
कहीं ऐसा तो नहीं कि इस रिपोर्ट का आधार कोई ऐसा अध्ययन हो, जिसे मोबाइल कम्पनियों ने ही ''स्पाॅन्सर'' किया हो ? दुनिया भर के वैज्ञानिक और चिकित्सा विशेषयज्ञों के गले से यह रिपोर्ट नीचे नहीं उतर रही है। उनका कहना है कि इसी तरह अतीत में सिगरेट बनाने वाली कम्पनियां भी अपने कुछ वैज्ञानिकों के माध्यम से यह दावे करवाती रहीं है कि सिगरेट पीने और तम्बाकू के सेवन से कोई नुकसान नहीं होता है। परन्तु आज यह पूरी तरह से साबित हो गया है कि सिगरेट पीन से न सिर्फ स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है, बल्कि कैंसर रोग और हृदय रोग भी हो सकता हैं। कहीं मोबाइल फोन को लेकर भी यही सब कुछ तो नहीं किया जा रहा हैं ।
प्रोफेसर रोस एन्डे जैसे जीवविज्ञानी, जिन्होंने विकिरण के दुष्प्रभावों पर काफी अध्ययन किया है और ब्रिस्टन यूनिवर्सिटी के डा0 रोज़र कागहिल जैसे वैज्ञानिकों द्वारा निकाले गये निष्कर्षो के अनुसार मोबाइल फोन से निकलने वाली माइक्रोवेब विकिरण की मात्रा से मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रर्याप्त ऊष्मा की खुराक मिलती है, जिससे उनमें रक्त संचार बढ़ जाता है। और उनकी प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया पर फर्क पड़ता हैं। इसके अलावा यह विकिरण मानव शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को भी नुकसान पहुंचता है। मस्तिष्क की एकाग्रता और चैंकन्नेपर को बाधित करता है तथा स्मरण शक्ति को प्रभावित करता है। और अगर मस्तिष्क की कोशिकाओं को इस विकिरण की लगातार और अधिक मात्रा मिलती रही तो ब्रेन ट्यूमर भी हो सकता है।
इन निष्कर्षो को ध्यान में रखते हुए डा0 कागहिल कहते हैं कि अगर मोबाइल फोन से निकलने वाली विकिरण की खुराक पन्द्रह से बीस मिनट प्रतिदिन ही सीमित रहती है, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अगर यही खुराक आधे घंटे से लेकर सात-आठ घंटे रोज मिलती है, तो कनपटी के नीचे तेज दर्द, टीसने वाला सिर दर्द, थकान, रक्तकणों व शरीर की प्रतिरोधक शक्ति में गिरावट और मस्तिष्क की कार्य क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो सकती है। यही नहीं, मोबाइल फोन का घंटो इस्तेमाल करते रहने से मिरगी, ब्लडप्रेशर और नपुंसकता जैसी बीमारियों के होने की संभावना भी बढ़ जाती है। हाल ही में हुए कुछ नवीनतम शोधों के अनुसार अत्याधिक प्रयोग करने वाले ऐसे पुरूष मोबाइल धारको, जो मोबाइल फोन को अपनी कमर से लटकाकर रखते है, के शुक्राणुओं में चैंकाने वाली कमी पाई गयी, जो कि आठ से दस वर्षो के बाद स्थायी नपुंसकता में बदल जाती है।
हाँलाकि ''नेशनल रेडियेशन प्रोटेक्शन बोर्ड'' और इन्टरनेशनल फॉर रेडियेशन प्रोटेक्शन (नॉन आयोनाइजिंग) ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मोबाइल फोन की डिजाइन, बनावट और इनको बाजार में उतारने से पहले उनकी गुणवत्ता-परीक्षण आदि के लिए कई मानदंड व दिशा-निर्देश निर्धारित किये हैं । परन्तु दिन-प्रतिदिन पूरे विश्व में मोबाइल फोन की बढ़ती हुई संख्या और उनकी व्यवसायिक माँग को देखते हुए क्या सभी मोबाइल कम्पनियाँ वाकई इन मानकों का पालन करती होगी ? दुनिया भर के वैज्ञानिक तो अब यह भी माँग करने लगे है कि मोबाइल फोन पर भी सिगरेट के पैकेट की तरह स्वास्थ्य संबन्धी वैज्ञानिक चेतावनी लिखी जानी चाहिए, ताकि मोबाइल फोन धारक सोच-समझ कर इनका इस्तेमाल कर सकें।
मोबाइल फोन के दुष्प्रभाव सम्बन्धी तर्क-विर्तक चालू हैं । और आगे भी इसके पक्ष और विपक्ष में दलीलें दी जाती रहेंगी । फिर भी, इतना तो तय है कि हमें मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते समय कुद सावधनियां अवश्य बरतनी चाहिये । हमें मोबाइल फोन का अधिक और लगातार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ''माइक्रोशील्ड्स'' का प्रयोग करना चाहिये। फोन को सिर के कुछ सेन्टीमीटर दूर रखना चाहिए और जहां तक सम्भव हो सके ''हैन्ड फ्री यूनिटस'' का इस्तेमाल करना चाहिये। बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मोबाइल फोन के इस्तेमाल से बचना चाहिये, क्योंकि यह विकिरण और गर्भस्थ शिशु को अत्याधिक नुकसान पहुॅचाता है। ''ईयर पीस'' आदि का प्रयोग तो और भी नुकसानदायक होता है, क्योंकि यह विकिरण को सीधे मिस्तिष्क में पहुंचता है। जहां तक संभव हो सके अच्छी क्वालिटी का मोबाइल फोन ही इस्तेमाल करना चाहिए।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अगर हम समझदारी के साथ और सावधानी पूर्वक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करें, तो इसके संभावित दुष्प्रभावों से बच सकते हैं ।
(तस्वीर गूगल इमेज सर्च से साभार)